शनिवार, 5 नवंबर 2022
गुरुवार, 3 नवंबर 2022
पड़ोस में लोकतंत्र से खूनी खिलवाड़
पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान पर जानलेवा हमले का होना बताता है कि हमारे पडोसी देश में लोकतंत्र के साथ किस तरह से खिलवाड़ किया जा रहा है. इस हमले में उनकी जान तो बच गई है किंतु हमले में घायल होने के कारण वे अस्पताल में हैं. यह हमला वज़ीराबाद की रैली के दौरान एक स्वचालित हथियार से किया गया. हमलावर को गिरफ्तार भी कर लिया गया है. हमले के पीछे किसका हाथ है शायद यह कभी सामने नही आ पायेगा किंतु पाकिस्तान की राजनीति की समझ रखने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए यह समझना बिल्कुल कठिन नहीं है कि इसमें सेना और आईएसआई का हाथ होगा. जिस प्रकार से इमरान खान को सेना के विरोध के कारण सत्ता से बेदखल किया गया और शहबाज़ शरीफ को पाकिस्तान का प्रधानमंत्री बनाया गया है वह सीधा संकेत देता है कि पाकिस्तान की राजनीति पर सेना की पकड़ को चुनौती नहीं दी जा सकती. जो भी ऐसा प्रयास करेगा उसे परिणाम भुगतना होगा.
पाकिस्तानी सेना ने कभी भी पाकिस्तान में सरकार को अपने से ताकतवर स्थिति में स्वीकार नहीं किया है. ताकतवर प्रधानमंत्रियों को तख्तापलट द्वारा सत्ता से बाहर किया गया है और यहाँ तक कि उनकी हत्याएं भी करवाई गई हैं. अब पाकिस्तानी सेना सॉफ्ट क्रू की रणनीति पर काम करती है, जहाँ वह सीधे-सीधे सैनिक तख्तापलट तो नहीं कर रही किंतु खुद के नियंत्रण से बाहर जाने वाले को सत्ता से बेदखल अवश्य कर रही है. इमरान का उदय भी पाकिस्तानी सेना के इशारे पर हुआ था और अबके घटनाक्रम भी उसी के इशारे पर हो रहे हैं. वर्तमान घटनाक्रम ने 27 दिसम्बर 2007 को बेनज़ीर भुट्टो की हत्या की याद दिला दी. इसी प्रकार रावलपिंडी की एक रैली में उन पर पहले गोलियां चलाई गईं, बाद में ब्लास्ट कर दिया गया. उस हमले में उनकी जान चली गई थी. उस हमले को पाकिस्तानी सेना के इशारे पर अलकायदा और तालिबानी आतंकी संगठनों ने अंजाम दिया था.
सन 1979 में जुल्फिकार अली भुट्टो की राजनीतिक हत्या भी सेना के इशारे पर हुई थी. उन्हें सैनिक तख्तापलट के बाद फांसी दे दी गई थी. इससे पहले सन 1951 में वहां के पहले प्रधानमंत्री लियाकत अली खान की भी राजनीतिक हत्या की गई थी. राजनीति पर अपना नियंत्रण बनाये रखने हेतु पाकिस्तान की सेना किसी भी राजनीतिज्ञ का कद बड़ा नहीं होने देगी. इसके लिए वो कोई भी विकल्प खुला रखती है. लोकतंत्र की जड़ें पाकिस्तान में कभी जम ही नहीं पाई. लोकतांत्रिक नेतृत्व बस एक मुखौटा है, जो दुनिया की आँख में धूल झोंकने का काम करता है. पाकिस्तानी राजनीति मूलरूप से सेना और आतंकवाद का गठजोड़ है, जो दुनिया को दिखाने के लिए एक कठपुतली सरकार रखता है. सत्तर के दशक से ही सेना ने पाकिस्तानी हुक्मरानों पर अपना नियंत्रण स्थापित करने के प्रयास आरम्भ कर दिए थे. सैनिक तानाशाही के कई दौर इस मुल्क ने झेले हैं. सुनियोजित तरीके से प्रेस की आज़ादी को खत्म कर दिया गया, संस्थानात्मक ढांचे को कमज़ोर कर दिया गया है. सैनिक अधिकारियों ने बेहिसाब लूट मचाई. जनता की आवाज को हाशिये पर धकेला गया. दुर्भाग्य से इस मुल्क के राजनेता भी इससे लड़ने का साहस नहीं जुटा सके. सेना का समर्थन पाने हेतु वे अपने नैतिक दायित्व से पीछे हटते रहे. भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी राजनीति और सैनिक दखल इस मुल्क की सच्चाई है. सत्ता की चाभी सेना के पास है, इस कारण वह कभी प्रत्यक्ष तो कभी राजनीतिक नेतृत्व के मुखौटे के पीछे से शासन करती है.
सिंध और बलूचिस्तान में जिस तरह से मानवाधिकारों का बर्बर दमन सेना द्वारा किया जा रहा है, कश्मीर का एक झूठा मुद्दा जिस तरह से जिंदा रखा गया है, अर्थव्यवस्था की जो बदहाल स्थिति है वो सब पाकिस्तान के भविष्य के लिए अच्छा नहीं है. आज सेना किसी भी प्रकार सत्ता से दूर नहीं हो सकती क्योंकि कोई भी सशक्त राजनीतिक नेतृत्व का उदय पहले उनके कर्मों का हिसाब करेगा. इमरान खान टूट की कगार पर खड़े पाकिस्तान को आइना दिखाने की कोशिश कर रहे हैं. देश का युवा भी समझने लगा है कि चीन और आतंकियों के दम पर कश्मीर की स्थिति बदली नहीं जा सकेगी. वो भारत के समान एक दृढ़ राजनीतिक नेतृत्व अपने देश मे चाहता है. वो लोकतंत्र की दृढ़ता और देश की उन्नति के सपने देखता है. लेकिन वर्तमान परिदृश्य में यह होना संभव नहीं है.
अभी अमेरिका द्वारा पाकिस्तान को 3600 करोड़ के F16 फाइटर जेट्स दिए गए हैं, जिसे वहाँ की कठपुतली सरकार अपनी अंतर्राष्ट्रीय स्वीकार्यता के रूप में प्रचारित कर रही है. आर्थिक बदहाली और बढ़ती हुई कीमतों से परेशान जनता को F16 क्या दे पाएंगे ये देखने योग्य होगा. हमारे लिए पड़ोस की यह स्थिति बेहद चिंताजनक है. मानवाधिकारों पर भाषण देने वाले देश किस प्रकार बलूचिस्तान के मुद्दे पर चुप हैं और हत्यारों को F16 से सजा रहे हैं, यह भी ध्यान देने योग्य है. फिलहाल इमरान खान पाकिस्तान की झूठी राजनीति में क्या परिवर्तन ला पाएंगे स्पष्ट नहीं है किंतु उन्हे मिल रहे जनता के समर्थन से जनता की आकांक्षाओं को अवश्य समझा जा सकता है. एक पड़ोसी मुल्क होने के नाते हम यही आशा करेंगे कि लोकतंत्र की वास्ताविक विजय का मार्ग प्रशस्त हो.

