शनिवार, 7 मार्च 2026

दिशाहीन होती भारतीय विदेश नीति

 क्या भारतीय विदेश नीति दिशाहीन हो चुकी है?

 एक बहुत लंबे समय से भारत खुद को क्षेत्रीय शक्ति और ग्लोबल साउथ की आवाज़ मानता आया है, भारत का भूगोल उसके इस दावे को नैसर्गिक आधार प्रदान करता रहा है। स्वतंत्रता के पश्चात हमने भूराजनीतिक समीकरणों एवं शीत युद्ध की कड़वाहट से अपने हितों की रक्षा के लिए गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाई। दोनों गुटों के साथ सहयोग एवं समन्वय की नीति। एक संतुलकारी कि भूमिका। इस नीति की कई मुद्दों पर आलोचना की जा सकती है किंतु यह भारत के सम्यक हितों को लंबे समय तक साधने में कामयाब रही। अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में कुछ भी स्थायी नहीं होता,न दोस्त और न ही दुश्मन, स्थायी होतें हैं मात्र राष्ट्रीय हित। इसी के अनुरूप जब आवश्यक समझा गया भारत ने सोवियत संघ से संधि करने में भी गुरेज नहीं किया, कोरिया, इराक सहित तमाम मुद्दों पर अमरीका की खुली आलोचना भी की। इसी स्वतंत्र नीति पर चलते हुए रूस के साथ मैत्री में रहते हुए भी अमरीका से सन्धिया की और भारत के हितों को प्रधानता दी।

जब हम एक कमजोर, गरीब देश थे तब भी हमारी विदेश नीति स्वतंत्र पहचान रखती थी। बेशक कई मुद्दों पर भारी असफलताएं मिली लेकिन वो हमारे अपने निर्णयों का परिणाम थी, कोई और देश खुलेआम हमारे स्वभिमान और सम्प्रभुता की ऐसी धज्जियां उड़ाता रहे और हम आपत्ति के दो शब्द भी दर्ज न करा सकें तो इसे क्या कहा जाए? ताकतवर देश की डरपोक, बेशर्म नीति?

ट्रम्प और अमरीका क्या भारत के स्वाभिमान को यूँ ही लज्जित करते रहेंगे और हम चुप रहेंगे। ट्रम्प को तो राजनीतिक,राजनयिक शिष्टाचार नहीं है यह हम जेलेन्सकी से उनकी बातचीत के तरीके और अन्य कई मौकों पर देख चुके हैं पर क्या भारत की विदेश नीति में इतनी भी सामर्थ्य नहीं बची कि वह राष्ट्रीय प्रतिष्ठा की रक्षा कर सके?

ये बेशर्म मौन हमारे क्षेत्रीय शक्ति और ग्लोबल साउथ की आवाज़ होने के दावे को खत्म कर देगा और इसकी कोई भरपाई नहीं हो सकती।

ये मौन एक ऐसी जगह ले जा रहा है भारत की छवि को जहाँ सिर्फ अंधकार ही अंधकार दिख रहा है।


इति

07.03.26

गुरुवार, 5 मार्च 2026

अमरीकी दोस्ती और दुश्मनी

 क्या अमरीका की दोस्ती और दुश्मनी दोनों ही खतरनाक है????


यदि विगत दो बड़े युद्धों रूस-यूक्रेन एवं वर्तमान ईरान के साथ हो रहे युद्ध मे अमरीकी नीति का मूल्यांकन किया जाए तो यह स्पष्ट दिखता है कि अमरीकी दोस्ती और दुश्मनी दोनों ही आत्मघाती है। अमरीका का प्रत्येक कदम मात्र अमरीकी हितों की पूर्ति के लिए उठाया जाता है। इसके लिए अमरीका अनैतिकता की पराकाष्ठा तक जा कर,सभी अंतर्राष्ट्रीय कानून और संधियों की धज्जियां उड़ाने में भी संकोच नही करता। पूरी दुनिया को मानवाधिकारों पर भाषण देने वाले,अमरीकी नागरिकों के अतिरिक्त किसी को मनुष्य नहीं समझते। किसी अन्य राष्ट्र की सम्प्रभुता उनके लिए कोई मायने ही नहीं रखती। यूक्रेन को अमरीका की दोस्ती और मदद ने एक ऐसी स्थिति में फंसा दिया जहाँ पूरा देश खंडहर और मलबे में बदल गया पर न युद्ध रुका और न ही यूक्रेन की समस्याओं का कोई अंत हुआ। इससे तो बेहतर था कि यूक्रेन नाटो में जाने की जिद छोड़ रूस से ही कोई तर्क संगत संधि कर लेता। लेकिन अमरीकियों ने जेलेन्सकी का ऐसा ब्रेनवाश किया कि उन्हें लगा कि वे नाटो में शामिल होकर रूस को असहज कर सकते हैं।नाटो और अमरीका रूस को साध लेंगे। जेलेन्सकी ये नहीं समझ सके कि अमरीकी दोस्ती असल मे दोस्ती नही थी, अमेरिकन्स रूस पर निशाना साध रहे थे यूक्रेन की कीमत पर। यदि नाटो की सहायता पाकर यूक्रेन रूस को उलझाए रखे तो  उसकी शक्ति को नियंत्रित किया जा सकता है। रूस जितनी भी तबाही करेगा वो यूक्रेन की ज़मीन पर होगी,मरने वाले यूक्रेन के नागरिक होंगे। यदि किसी स्थिति में रूस दबाव में आकर यूक्रेन पर परमाणु बम का प्रयोग कर देता तो ये विनाश भी अमरीका से बहुत दूर यूक्रेन की ज़मीन पर होता और इसके परिणाम खुद रूसियों को भी भुगतने पड़तें और तो और अमरीका तथा नाटो के देशों को रूस पर परमाणु बम गिराने का लाइसेंस मिल जाता।खैर रूस ने सयंम दिखाते हुए ये स्थिति उत्पन्न नहीं होने दी। अब जबकि यूक्रेन बर्बाद हो चुका है तो भी अमरीकी कंपनियों की कमाई या कहिये लूट के लिए खुली तिजोरी बन चुका है। युद्ध मे सहायता के नाम पर अमरीका ने जितना रुपिया खर्च किया होगा उसका कई गुना अमरीकी कम्पनियों के द्वारा यूक्रेन के संसाधनों और पुननिर्माण के नाम पर लूट लिया जाएगा। युद्ध मे जो भूमि यूक्रेन खो चुका वो शायद ही वापस मिले और सहायता देने वाले दोस्त अमरीकी घर मे लूट खसोट करेंगे सो अलग।अमरीका की दोस्ती यूक्रेन को ले डूबी ये कहना अतिश्योक्ति नही होगी।

अब यदि ईरान के साथ जो कुछ भी हो रहा है उसे अमरीकी दुश्मनी के शास्त्रीय उदाहरण के रूप में देखा जाए तो परिणाम आश्चर्यजनक रूप से समान ही दिखेगा। ईरान फिलहाल तो अमरीकी प्रत्याशा के विपरीत जोरदार पलटवार कर रहा है लेकिन ये पलटवार की शक्ति बहुत समय तक नहीं रहेगी। तब अमरीका और इज़राइल मिल कर युद्ध के नाम पर ईरान को राख और खंडहर में बदल देंगे। यदि ईरान किसी भी प्रकार परमाणु शक्ति का प्रयोग करने की स्थिति में आ भी गया तो ज़मीन पश्चिम एशिया या इज़राइल की ही होगी,अमरीका ईरान की मारक क्षमता से बहुत दूर है। यानी फिर दूसरो की जान, ज़मीन की कीमत पर अमरीकी नीति नाचती रहेगी। ईरान बर्बाद हो या ईरान के सबसे घातक प्रहार से (यदि ऐसा हो सके तब) इज़राइल, अमरीका तब भी सुरक्षित रहेगा। इस बार भी निशाना ईरान नहीं बल्कि रूस और चीन हैं जिनके हितों को नुकसान पहुंचाने के लिए ईरान को निशाना बनाया जा रहा है। बर्बादी के बाद ईरान को भी युद्ध समझौते और पुनर्निर्माण के नाम पर अमरीकी कम्पनियों को लूट खसोट का लाइसेंस दे दिया जाएगा। इस प्रकार अमरीकी दुश्मनी भी वैसी ही है जैसी उनकी दोस्ती। आवश्यकता पड़ने पर अमरीकी इज़राइल की कीमत पर भी अपने हितों को साधेगे इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए। एक और महत्वपूर्ण तथ्य की अमरीकी  नीति की नग्नता, तानाशाही, बेखौफ अनैतिकता के प्रदर्शन पर दुनिया की सबसे बड़ी संसद,महासभा अर्थात संयुक्त राष्ट्र संघ खुद नंगा होकर खड़ा है। इस नग्नता ने संघ के औचित्य पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। क्या सँयुक्त राष्ट्र संघ अब भी जिंदा है??


इति

05.03.26

बुधवार, 4 मार्च 2026

पश्चिम एशिया का गहराता संकट

​पश्चिम एशिया (मध्य पूर्व) इस समय अपने इतिहास के सबसे अस्थिर और खतरनाक दौर से गुजर रहा है. यह क्षेत्र वर्तमान में एक ऐसे बहुआयामी युद्ध की चपेट में है, जिसने न केवल क्षेत्रीय शांति को बल्कि वैश्विक अर्थव्यवस्था को भी संकट में डाल दिया है. इजरायल-ईरान का संघर्ष इस अस्थिरता के केन्द्र में है. इन दो देशों का आपसी तनाव अब संघर्ष के दौर से आगे जाकर सीधे सैन्य टकराव में बदल चुका है. 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजरायल द्वारा संयुक्त रूप से ईरान के परमाणु और सैन्य ठिकानों पर हमले किए गए. इस हमले में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला खामनेई सहित शीर्ष कमांडर मारे गए. इसके अलावा इस युद्ध में ईरान पूरी तरह से अकेला दिख रहा है, उसका नेतृत्व खत्म किया जा चुका है, ऐसे में अमरीका को जवाब देने के लिए ईरान के पास 'मरो या मारो' का ही विकल्प बचा है. राजनीतिक नेतृत्वविहीन ईरान ने प्रतिशोध के लिए बेहद असंतुलित और आक्रामक नीति पर चलना आरंभ कर दिया है जो अमरीका और इजराइल के लिए समस्या बन चुकी है.

 



यद्यपि इस युद्ध के आरंभ में ही ईरान नेतृत्वविहीन हो गया तथापि वह लगातार हमले कर यह दर्शाने की कोशिश कर रहा है कि उसकी शक्ति बरकरार है. इजरायल के साथ-साथ आसपास के अन्य देशों पर हमले करके उसने वैश्विक पटल पर स्पष्ट सन्देश दिया है कि वह इज़राइल और उसकी मदद करने वालों को मुँहतोड़ जवाब देगा. उसके निशाने पर खाड़ी देशों में अमरीकी संपत्तियाँ और आयल रिफाइनरीज हैं. उसने न केवल इजरायल पर बल्कि खाड़ी देशों में स्थित अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर भी मिसाइल हमले किए हैं. ईरान पर हमले करने के लिए इन देशों द्वारा अमरीका को अपने अड्डे और अन्य सुविधाएँ दिए जाने से क्षुब्ध होकर ईरान ने स्ट्रेट ऑफ होरमुज को बंद कर दिया. इसके पीछे उसका उद्देश्य इन देशों के आर्थिक नुकसान पहुँचाना है. स्ट्रेट ऑफ होरमुज पर नियंत्रण के द्वारा वैश्विक ऊर्जा सप्लाई चेन पर दबाव बनाकर ईरान कुछ लाभप्रद स्थिति प्राप्त कर सकता है. ​यह जलडमरूमध्य ईरान और ओमान को अलग करता है तथा फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ता है. अपने सबसे संकरे बिन्दु पर इसकी चौड़ाई 33 किलोमीटर है. इसी मार्ग से खाड़ी देशों से आने वाला पेट्रोलियम भारत, चीन, जापान और अन्य जगहों तक पहुँचता है. इराक, क़तर, बहरीन, ओमान, यूएई, सऊदी अरब इसी मार्ग से पेट्रोलियम व्यापार करते है. कुल पेट्रोलियम आपूर्ति का बीस प्रतिशत इसी मार्ग से गुजरता है. स्ट्रेट ऑफ होरमुज एवं बेब अल मेंडेब मार्ग अवरुद्ध होने पर सारे व्यापारिक जहाजों को अफ्रीका का पूरा चक्कर लगाकर यूरोप जाना पड़ेगा जो बेहद खर्चीला और समय लेने वाला होगा. इन मार्गों को अवरुद्ध करने में यदि ईरान पूर्णतः सफल हो जाता है तो इसके गम्भीर आर्थिक संकट होंगे.

 

इज़राइल और अमरीका ने इस युद्ध के माध्यम से कुछ बड़े लक्ष्य निर्धारित किये हैं, जिनमें ईरान में सत्ता परिवर्तन, उसकी सैनिक शक्ति को खत्म करना, मिसाइल क्षमता को न्यून करना और परमाणु कार्यक्रम पर रोक लगाना शामिल है. खामनेई की मौत के साथ इज़राइल-अमरीका ने इस युद्ध के सबसे बड़े लक्ष्यों में एक लक्ष्य हासिल कर लिया है. ईरान में राजनीतिक अस्थिरता भले ही उत्पन्न हो गई हो लेकिन सत्ता परिवर्तन अभी तक नहीं किया जा सका है. ऐसी स्थिति को देखते हुए अमेरिका स्पष्ट सैनिक श्रेष्ठता पर अपनी रणनीति निर्धारित किये है. उसके द्वारा ईरान की घेरेबंदी चारों तरफ से की जा चुकी है. समुद्री नाकेबंदी के लिए अमरीकी फ्लीट तैनात है; अमरीकी जेट्स और बी-टू बॉम्बर ईरान के आकाश में मंडरा रहे हैं; शहरों, प्रक्षेपास्त्र केंद्रों, परमाणु संयंत्रों आदि पर बमबारी की जा रही है, जिससे किसी भी कीमत पर ईरान को आत्मसमर्पण के लिए विवश किया जा सके.

 

इस युद्ध के प्रत्यक्ष राजनीतिक, आर्थिक और भूसामरिक प्रभाव हैं, गहरे निहितार्थ हैं जिनके प्रभाव पूरे विश्व को झेलने होंगे. इस युद्ध ने मुस्लिम भाईचारे की असलियत उधेड़ कर रख दी है. साफ-साफ दिख रहा कि ईरान लगातार जिन देशों पर हमला कर रहा है वो सभी मुस्लिम देश हैं. सऊदी अरब सहित तमाम मुस्लिम देशों द्वारा अमरीका की मदद करते देख कोई आश्चर्य नहीं कि ये देश ईरान के विरुद्ध सैनिक कार्यवाही में शामिल हो जाएँ. अमरीका-इज़राइल जिस तरह से ईरान को अस्थिर करके सत्ता परिवर्तन करना चाहते है, वह बेहद खरनाक प्रयास है. ईरान की सम्भावित परमाणु क्षमता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है. यदि युद्ध के दौरान भी वह किसी भी प्रकार परमाणु शक्ति प्राप्त कर लेता है तो निश्चित रूप से इसका प्रयोग करेगा. लम्बी और मध्यम दूरी की प्रक्षेपास्त्र क्षमता ईरान के पास मौजूद है. उसके पास ड्रोन के भी अच्छे खासे भंडार हैं.

 

ईरान के अन्यायपूर्ण दमन से यह एक बार फिर स्पष्ट हो रहा कि विश्व व्यवस्था शक्ति से संचालित है और शक्ति का कोई विकल्प नहीं है. दुनिया देख रही कि अमरीका ने ताकत के बल पर पश्चिम एशिया को धुआँ-धुआँ कर रखा है, जिससे इस क्षेत्र में इज़राइल-अमरीकी हितों को सुरक्षित रखने के साथ-साथ चीन और रूस की लाभप्रद स्थिति को पलटा जा सके. चीन द्वारा आयात किया जाने वाला अधिकांश पेट्रोलियम पश्चिम एशिया से ही आता है. ऐसे में वर्तमान युद्ध से चीन की अर्थव्यवस्था की रफ्तार को भी कम किया जा सकता है, जो अमरीका की वृहद रणनीति का एक भाग है. कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें, युद्ध की लागत, पश्चिम एशिया  में फैली तबाही विश्व व्यवस्था को मंदी, गोलबंदी, शस्त्र स्पर्धा और परमाणु होड़ में डाल देंगी.

 

दूसरों की ज़मीन पर परमाणु खतरा हो या भयंकर से भयंकर तबाही, अमरीका अपने रणनीतिक लक्ष्य साध कर ही रुकेगा. अमरीका की तानाशाही ईरान के गिरने के बाद अनियंत्रित होकर विश्व को अपने डंडे से हाँकेगी, जो भारत और अन्य देशों के लिए राजनीतिक, कूटनीतिक समस्याएँ पैदा करेगी. युद्ध पश्चात् उत्पन्न होने वाले भूराजनीतिक समीकरणों को अपने पक्ष में संतुलित करने की कूटनीतिक परीक्षा से भारत को गुजरना होगा. आज जो पश्चिम एशिया में किया जा रहा है कल वो दक्षिण एशिया में न किया जा सके इसके लिए रणनीतिक सबक लेकर तैयार रहना होगा.