गुरुवार, 24 जुलाई 2025

प्राथमिक विद्यालयों का विलय

 जब से सरकार ने बड़े पैमाने पर प्राथमिक विद्यालयों को बंद करने का फैसला विशुद्ध व्यापारिक बुद्धि से लिया तब से निरंतर यही सोचती रही कि ये लोकतांत्रिक व्यवस्था सरकार को लोककल्याण के मार्ग से विचलित होने से रोक लेगी। सरकार को ये फैसला वापस लेना ही होगा। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। एक आश्चर्य जनक चुप्पी विपक्ष ने साध रखी है ।किसी को कोई मतलब नहीं प्राथमिक विद्यालयों के विलय और बन्द किये जाने से। जहाँ गांवों  में गरीबी की स्थिति ये हो कि बच्चों को विद्यालय तक लाने के लिए उन्हें भोजन दिया जाए जिससे अभिभावक उन्हें विद्यालय भेजे और बालक/ बालिकाओं को कुछ पोषण प्राप्त हो सके ऐसे में वे राज्य सरकारें जहाँ ग्रामीण क्षेत्र का विस्तार भी अधिक् है और ग्रामीण गरीबी की दर भी वहां वे बेधड़क होकर ऐसे अत्याचारी फैसले कर रहीं हैं इससे भी अदभुत यह कि इसका कोई विरोध किसी भी स्तर पर नहीं हो रहा। क्या बच्चों को शिक्षा क् अधिकार बिना विद्यालयों के पूरा हो जाएगा? क्या सरकार अपने इस उत्तरदायित्व से भाग सकती है कि गरीबों तक शिक्षा, स्वास्थ्य, भोजन पहुंचाना उसकी प्राथमिक जिम्मेदारी है? यदि एक भी बच्चा पढ़ना चाहता है तो उसकी पहुंच विद्यालय तक होनी चाहिए। संख्या और खर्च का बहाना बना कर आप हाशिये पर खड़े उस समाज की अवहेलना नहीं कर सकते जो अपने लिए भोजन, स्वास्थ्य सुविधाएं और शिक्षा खरीद नहीं सकते। सरकारों को याद रखना होगा कि वे दुकान नहीं चला रहे और न ही बाजार जहाँ रुपयों की थैली रखने वाले के लिए ही सब कुछ है। ये लोकतांत्रिक व्यवस्था केवल कागजी नहीं हो सकती। अजीब है इस व्यवस्था में सब कुछ जहाँ जुबानी जंग चलाने वाले पक्ष और विपक्ष आम लोगों और गरीबों की गर्दन रेते जाने के उपक्रमों पर षडयंत्रकारी रूप से एक रहते है। कोई पक्ष नहीं कोई विपक्ष नहीं...

कहते है लोकतंत्र में सत्ता की स्वेच्छाचारिता पर विपक्ष अंकुश लगाता है, पर यहाँ विपक्ष है कौन? सब बिके हैं पर्दे के पीछे।