फरवरी माह के अंत में शुरू हुआ 'ऑपरेशन रोरिंग लायन' और 'एपिक फ्यूरी' अनिश्चितताओं
के घेरे में आने के बाद वैश्विक समुदाय को न केवल चिंता में डाले हुए है बल्कि
भयाक्रांत भी किये है. अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान के विरुद्ध जब इस सैन्य
अभियान को शुरू किया गया था तो माना गया था कि यह अपने शुरुआती दौर में ही एकतरफा ढंग
से समाप्त हो जायेगा. ऐसा इसलिए महसूस किया गया था क्योंकि अमेरिका-इजरायल द्वारा आधुनिकतम
स्टील्थ तकनीक और सटीक मार करने वाली मिसाइलों के जरिए ईरान की सैन्य और आर्थिक
संरचना को नेस्तनाबूद करने का प्रयास किया गया. पश्चिमी विशेषज्ञों का आकलन था कि
आयतुल्लाह खामनेई और उनके शीर्ष कमान को समाप्त करने के बाद ईरान बिखर जाएगा. इससे
ईरान में सत्ता परिवर्तन करके एक ऐसी सत्ता स्थापित की जा सकेगी जो अमेरिकी हितों
के अनुकूल हो. लेकिन युद्ध की समूची स्थिति ने इन तमाम दावों की पोल खोल दी.
एक महीने से अधिक
की अवधि गुजर जाने के बाद भी किसी भी समय ऐसा नहीं लगा कि यह युद्ध अमेरिका-इजरायल
के लिए एकतरफा रहा हो. अमेरिका और इजरायल की संयुक्त सैन्य शक्ति ने ईरान की व्यापक
घेरेबंदी के बाद हवाई हमले करके वहाँ की खामनेई की सत्ता को परिवर्तित करने के साथ-साथ
वहाँ की आर्थिक एवं सैनिक शक्ति को समाप्त करना चाहा. आयतुल्लाह खामनेई और तमाम
शीर्ष नेतृत्व की हत्या के बाद ऐसी सम्भावना व्यक्त की गई कि ईरान आत्मसमर्पण
करेगा किन्तु तमाम विध्वंसक कदमों के बाद भी न तो ईरान में सत्ता परिवर्तन हुआ और न
ही उसका आत्मसमर्पण करवाया जा सका. इसके उलट ईरान ने पश्चिमी एशिया और खाड़ी देशों में
अमेरिकी सम्पति तथा सैन्य ठिकानों पर ताबड़तोड़ हमले कर अमेरिका को सीधी चुनौती दी.
अपने नेतृत्व की शहादत के बाद भी ईरान ने जिस प्रकार का संगठित पलटवार किया उसने यह सिद्ध कर
दिया कि ईरान का ढाँचा वहाँ के व्यक्तियों पर नहीं बल्कि एक गहरी पैठ रखने वाली सांस्थानिक
विचारधारा पर टिका है.
ईरान ने अपनी भूस्त्रातजिक
स्थिति का पूरा लाभ उठाते हुए होर्मुज़ जलडमरूमध्य से जहाजों के आवागमन को बाधित कर
दिया. इसके चलते लगभग सम्पूर्ण विश्व में तेल, गैस का संकट दिखाई देने लगा. उसकी इस रणनीति ने अमेरिका पर दबाव
बढ़ा दिया. इसके चलते युद्ध की चिरपरिचित विभीषिका के दौर में, हफ्तों के भीषण
रक्तपात, गोलाबारी और विनाश के बाद दोनों पक्ष युद्धविराम के लिए सहमत हुए. यह
युद्धविराम भले ही अस्थायी हो मगर इससे कई सारे पक्षों के खुलने की स्थिति बनने की
सम्भावना उत्पन्न हुई. यह युद्धविराम किसी सैन्य विजय का परिणाम नहीं,
बल्कि एक 'रणनीतिक गतिरोध' की परिणति के रूप में सामने आया. यह अस्थायी युद्धविराम
न सिर्फ परमाणु हमले की किसी भी सम्भावना को समाप्त करता है बल्कि पेट्रोलियम के अबाध
आवागमन से अनेक देशों की अर्थव्यवस्था को ध्वस्त होने से भी बचाता है. भारत के दृष्टिकोण
से भी युद्धविराम उचित है क्योंकि भारतीय अर्थव्यवस्था भी इस युद्ध से नकारात्मक रूप
से प्रभावित हो रही है. इस युद्ध के कारण न केवल तेल की आपूर्ति बाधित हुई थी बल्कि खाड़ी देशों
में मौजूद करोड़ों भारतीयों की सुरक्षा और वहाँ से आने वाला निवेश भी संशय में था.
भारत ने निरंतर कूटनीतिक संवाद के जरिए यह स्पष्ट किया था कि इस युद्ध का कोई
सैन्य समाधान संभव नहीं है.
इस युद्ध और उससे उत्पन्न
स्थितियों के बाद जिस प्रकार से ईरान की शर्तों को मानते हुए युद्धविराम हुआ है उससे
यह स्पष्ट है कि अमेरिका पर भी युद्ध रोकने का दबाव था. यह युद्ध इस बात का भी प्रतीक
है कि यदि किसी देश का सांस्थानिक विकास हुआ है तो उसे युद्ध में झुका पाना सहज भी
नहीं है. जिस प्रकार अमेरिका जैसी ताकत को ईरान ने कड़ी चुनौती दी और खाड़ी में उसके
हितों को दूरगामी नुकसान पहुँचाया है उससे अमेरिका के तानाशाही भरे व्यवहार पर भी कुछ
लगाम लगने की सम्भावना दिखती है. हालाँकि अमेरिका अभी भी स्व-प्रचार के माध्यम से स्वयं
को इस युद्ध में एकतरफा विजेता साबित करने में लगा हुआ है. विचारणीय तथ्य यह है कि
यदि वास्तव में यही सत्य होता तो युद्धविराम ईरान की शर्तों पर नहीं हुआ होता.
वर्तमान में
युद्धविराम की घोषणा का आकलन करें तो स्पष्ट है कि ईरान ने अमेरिका को सीधी चुनौती
देकर उसकी तानाशाह वाली छवि को नुकसान पहुँचाया है. इसके साथ-साथ खाड़ी देशों में
स्थित अमरीकी सैन्य ठिकानों पर हमले करके ईरान ने दिखा दिया कि इस युद्ध में वह
अमेरिका से कम नहीं है. चूँकि इस युद्ध ने परमाणु हमले की आशंका को उत्पन्न कर
दिया था ऐसे में किसी भी कदम से शांति की स्थापना अत्यावश्यक हो गई थी. अब चुनौती
इस अस्थायी युद्धविराम को एक स्थायी शांति समझौते में बदलने की है. यद्यपि अमेरिका
के एकतरफा जीत के कथित दावों के बीच ईरान की शर्तों पर हुए युद्धविराम के इस दौर
में बातचीत का आधार भी बनाया गया तथापि बातचीत का पहला दौर असफलता की भेंट चढ़ गया.
शांति स्थापना की स्थिति भले ही नाजुक हो किन्तु यह युद्धविराम मानवता की जीत तो है
ही. किसी
भी युद्ध में उसके स्थायी समाधान के लिए पहला अनिवार्य कदम युद्धविराम होता है. ऐसा
ईरान-अमेरिका-इजरायल युद्ध में हो गया है, अब युद्धविराम सफल हो और कोई स्थायी समाधान
निकले, इसके लिए वैश्विक प्रयास किये जाने चाहिए. वैश्विक स्तर पर सभी को ध्यान
रखना होगा कि सम्पूर्ण विश्व के लिए, मानवता के लिए, प्रकृति के लिए युद्ध नहीं शांति
आवश्यक है.

