गुरुवार, 1 जनवरी 2026

बांग्लादेश के सन्दर्भ में रणनीति बदले भारत

भारत के पड़ोसी देश बांग्लादेश के हिंसक और उथल-पुथल भरे माहौल के बीच एक दुखद खबर सामने आई है. बांग्लादेश की पहली महिला प्रधानमंत्री बेगम खालिदा जिया का अस्सी वर्ष की उम्र में निधन हो गया. अपने राजनैतिक जीवन में सक्रिय रहने वाली बेगम खालिदा लम्बे समय से कई गम्भीर बीमारियों से ग्रस्त थीं. खालिदा ज़िया 1991 से 1996 तक पहली बार और फिर 2001 से 2006 तक दोबारा बांग्लादेश की प्रधानमंत्री बनीं. वर्ष 1984 से लेकर अपने निधन तक उनके द्वारा अपनी पार्टी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) का नेतृत्व किया जाता रहा. बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की स्थापना उनके पति पूर्व राष्ट्रपति जियाउर्रहमान ने 1978 में की थी. बेगम खालिदा जिया का राजनीति में अपने पति की हत्या के बाद आना हुआ. 1981 में उनके पति की हत्या के बाद 1982 में उन्होंने सक्रिय राजनीति में प्रवेश किया.

 



ये वो दौर था जबकि शेख हसीना भी आवामी लीग के साथ राजनीति में सक्रिय थीं. राजनीति के उस दौर में बांग्लादेश में दो दलों की दो महिलाओं द्वारा राजनीति में सक्रिय रहना और दोनों का धुर विरोधी होना चर्चा का केन्द्र-बिन्दु बना था. इसी कारण बांग्लादेश की तत्कालीन राजनीति को बैटल ऑफ बेगम्स से सम्बोधित किया जाने लगा. यद्यपि अवामी लीग और बीएनपी एक-दूसरे के धुर विरोधी दल बने हुए थे तथापि दोनों ही दलों ने बांग्लादेश में लोकतन्त्र की वकालत की. खालिदा जिया की तरह ही शेख हसीना भी बांग्लादेश की दो बार प्रधानमंत्री बनीं. उन्होंने 1996 से 2001 तक और फिर 2009 से 2024 तक बांग्लादेश की प्रधानमंत्री के रूप में कार्य किया. बेगम खालिदा जिया जहाँ पूर्व राष्ट्रपति जियाउर्रहमान की पत्नी थीं वहीं शेख हसीना बांग्लादेश के पहले राष्ट्रपति शेख़ मुजीबुर्रहमान की बेटी हैं. 

 

राजनैतिक वर्चस्व वाले परिवारों से आने वाली इन दोनों महिलाओं की राजनैतिक विचारधारा सदैव अलग रही. हसीना सरकार जहाँ धर्मनिरपेक्षता और भारत के साथ सहयोग को महत्व देती रहीं वहीं खालिद ज़िया की नीति इसके उलट ही रही. शेख हसीना की प्रतिद्वंद्वी के रूप में अपनी राजनीति को धार देने के लिए बेगम ज़िया ने बांग्लादेश को कट्टरपंथ के हवाले कर दिया. 2001 में जब बेगम खालिदा ज़िया दोबारा सत्ता में लौटी तो लोकतान्त्रिक मूल्यों की वकालत करने के बाद भी वे इस्लामिक कट्टरपंथ के समक्ष झुक गई. जमाते इस्लामी जैसे संगठन के साथ हाथ मिलाकर उन्होंने कट्टरपंथियों के हाथ मजबूत कर दिये. चूँकि उनकी राजनीति जमाते इस्लामी के प्रभाव के समक्ष फीकी पड़ गई इसी कारण से वे पाकिस्तान समर्थन की तथा भारत विरोध की नीति पर चलने लगीं. उनके द्वारा भारत के विरुद्ध वैमनस्यता का भाव पैदा किया गया, जिससे आवामी लीग की उदारवादी राजनीति और हिन्दू अल्पसंख्यक समुदायों को किनारे किया जा सके. इन सबके परिणाम आज बांग्लादेश में दिख रहे हैं. स्वयं खालिदा ज़िया भी भ्रष्टाचार के आरोपों में जेल गईं और लम्बे समय से उनकी पार्टी चुनावों से बाहर रही.

 

आज बांग्लादेश पूरी तरह से कट्टरपंथी ताकतों के हाथ में है. ऐसे में जबकि केयरटेकर सरकार पाकिस्तान की कठपुतली बनी हुई है तब लोकतंत्र बहाली की आशा उन्हीं बेगमों पर टिकी थी जिन्होंने कभी लोकतंत्र के लिए संघर्ष किया था. बांग्लादेश के ऐसे कठिन समय में शेख हसीना को देश छोड़ने को मजबूर कर दिया गया और खालिदा ज़िया अब जीवित नहीं हैं. निश्चित ही यह स्थिति बांग्लादेश को हिंसक वातावरण से मुक्ति दिलाने की राह को और कठिन बनाने वाली है. भले ही बेगम ज़िया भारत के करीब न रहीं हों लेकिन उनकी सरकार कम से कम अल्पसंख्यक समुदायों का ऐसा खुला, बेशर्म संहार तो नहीं कर सकती थी, उनकी सरकार अपनी जवाबदेही से भाग नहीं सकती थी. भारत के लिए बांग्लादेश में एक चुनी हुई सरकार होना सबसे महत्वपूर्ण है. देश के लिए अब यह बहुत आवश्यक है कि बांग्लादेश किसी के नेतृत्व में लोकतंत्र की राह पर वापस आये और भारत विभाजन की बातों तक पहुँच चुके भारत विरोध पर लगाम लगाई जा सके.

 



भारत के उत्तर-पूर्व को काटने की खुली चुनौती को किसी भी तरह से अनदेखा नहीं किया जा सकता है. ग्रेटर बांग्लादेश का जो नक्शा प्रचारित किया जा रहा है वह दर्शाता है कि बांग्लादेश की राजनीति लगभग पूरी तरह से इस्लामिक कट्टरपंथ के नियंत्रण में आ चुकी है. भारत की नीति अब शेख हसीना के अलावा नई ज़मीन बनाने की होनी चाहिए. देश को राजनीतिक ज़मीन तलाशने के साथ-साथ स्पष्ट सैनिक और भूराजनीतिक कवायद करनी होगी. बांग्लादेश को भारत की अखंडता के लिए खतरा नहीं बनने दिया जा सकता, इस सिद्धांत पर अमल करते हुए भारत को आगे बढ़ना होगा. हम पहले ही भूगोल परिवर्तित करने की खुशी में खतरनाक भूराजनीतिक भूल कर चुके हैं. बांग्लादेश बनने के समय ही अपनी भूराजनीतिक विवशता को साधने का प्रयास होना चाहिए था, जिससे सिलिगुड़ी गलियारा हमेशा के लिए सुरक्षित हो जाता. यह दुखद है कि ऐसा नहीं किया गया फिर भी वर्तमान परिस्थितियों से सबक लेते हुए अपनी रणनीति में परिवर्तन से गुरेज नहीं किया जाना चाहिए.

 

पड़ोसी को यह समझाने का वक़्त आ चुका है कि यदि हम सैनिक हस्तक्षेप से बांग्लादेश बना सकते हैं तो अपने उत्तरपूर्वी राज्यों की रक्षा के लिए किसी भी विकल्प का प्रयोग कर सकते हैं. बांग्लादेश का मित्रवत रूप न सिर्फ हमारे लिए बल्कि स्वयं बांग्लादेश के हित में है. रूस और यूक्रेन का विरोधी स्वरूप उदाहरण के रूप में हमारे सामने है, इससे सबक लेना होगा.