सोमवार, 29 सितंबर 2025

सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी

 सोनम वांगचुक के बहाने से....


जब से प्रसिद्ध जलवायु एक्टिविस्ट सोनम वांगचुक गिरफ्तार हुए है एक अजीब सी मनःस्थिति हो चली है। एक द्वंद्व में दिमाग उलझ कर रह गया है कि क्या सच मे सोनम वांगचुक पर लगाये जा रहे आरोप सत्य हैं या सरकार की मंशा शक करने योग्य है? गंभीर आरोपों में राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत गिरफ्तारी क्या सिर्फ वांगचुक की राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को कुचलने के लिए की गई है, क्या कोई भी सरकार पूरी दुनिया की आंखों में धूल झोंक कर बिना किसी ठोस आधार के ऐसा कर  सकती है?

इसका जवाब तो वक़्त ही सही दे पाएगा लेकिन वांगचुक के आंदोलन, लद्धाख की वो स्थितियां जिन्हें मुद्दा बनाने का प्रयास किया जा रहा है, लद्धाख की भूसामरिक स्थिति और विदेशी हितों के सम्यक अध्ययन के बिना सतही आधार पर किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचना उचित नहीं होगा। जैसा कि हम इस मामले में सोशल मीडिया में वांगचुक के समर्थन में देख सकते है। लेकिन यह प्रश्न भी महत्वपूर्ण है कि क्या वांगचुक का समर्थन करने वाली सोशल मीडिया भीड़ और आंदोलन में जमा तथाकथित जेन ज़ी जिन्होंने हाल में ही बांग्लादेश और नेपाल को बर्बाद किया है वास्तव में लद्धाख के हितों की बात कर रहें है? या यह सिर्फ एक दिखावा है किसी गहरी साजिश को छुपाने के लिए।

कुछ बातें समझ से परे हैं जैसे कि वांगचुक और उनके समर्थक लोगो को निरंतर भड़काते रहे केंद्र द्वारा बनाई जा रही एक बिजली परियोजना के विरुद्ध, उनका कहना था कि यह लद्दाख के पर्यावरण को हानि पहुँचायेगा और तो और स्थानीय चरवाहों को भी समस्या होगी। बात स्थानीय गरीब चरवाहों को तो आकर्षक लग सकती है लेकिन क्या यह प्रश्न वाजिब नहीं है कि क्यों कुछ लोग लद्दाख को चरवाह युग से बाहर नहीं आने देना चाहते हैं? लद्दाख में आधारभूत संरचनाओं का अभाव होना किसके हित मे है? यदि आजतक सरकारों द्वारा इस महत्वपूर्ण सीमांत प्रदेश में राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से कोई काम नहीं किया गया तो क्या यह उपेक्षा अनवरत चलनी चाहिए, इसमें किसका लाभ है? संविधान की छठी अनुसूची में लद्दाख को लाने की एक बड़ी मांग बताया जा रहा है, यह राज्य की संस्कृति, संसाधनों को लोगो की भावनाओं के अनुरूप व्यवस्थित करने का एक साधन है, इस पर चर्चा करके रास्ता निकाला जा सकता है। आज जो लोग धारा 370 को बेहतर बता रहे है उनसे कोई ये क्यों नहीं पूछता की तब भी छठी अनुसूची जम्मू और कश्मीर पर लागू नहीं होती थी तो यह झूठा बहाना क्यों खड़ा किया जा रहा है? कुल मिलाकर लद्दाख के ठंडे पठारों में लाया गया यह उबाल अंतर्राष्ट्रीय षड्यंत्र का एक हिस्सा है जिसमें इस सीमांत प्रदेश को भारत की मुख्य भूमि से अलग थलग बनाये रखना उद्देश्य है। लद्दाख में आधारभूत संरचनाओं का विकास विदेशी हितों के विरुद्ध है इसलिए यह आंदोलन खड़ा किया जा रहा है। जिससे बकरी चराने वाले बकरी ही चराते रहें और षड्यंत्रकारियों की दया पर भारत की सुरक्षा अवलंबित रहे। राहुल गांधी और सोनम वांगचुक अपनी महत्वाकांक्षा के मारे हुए वो चेहरे हैं जो लगातार झूठ बोल रहे हैं, लोगो को भड़का कर सड़को पर लाने का प्रयास कर रहें हैं जिससे विदेशों से प्राप्त मूल्य की उपादेयता सिद्ध की जा सके। अंत मे एक प्रश्न एक ही पटकथा के इन दोनों चेहरों से पूछा जाना चाहिए कि आखिर वो कौन सी 4000 किमी भूमि है जो मोदी सरकार के बाद चीन ने हड़पी है? भारतीय भूमि तो चीन के अधिकार में है लेकिन वो इनके ही खानदान के शासन में गई है यह लोगों को याद रखना चाहिए।

इति।

29.09.25

शुक्रवार, 12 सितंबर 2025

नेपाल का जेन जी आंदोलन

दक्षिण एशिया में विगत कुछ समय से बनी अराजकता की स्थिति भारत के सभी पड़ोसी देशों में हलचल मचाये हुए है. पाकिस्तान, मालदीव, श्रीलंका और बांग्लादेश के बाद अब नेपाल भी अराजकता और संवैधानिक संकट में फँस गया है. नेपाल में लोग सड़कों पर प्रदर्शन करते दिख रहे हैं. हिंसा के परिणामस्वरूप ओली सरकार गिर चुकी है तथा वे देश भी छोड़ चुके हैं. इन हिंसक प्रदर्शनों में नेपाल के संसद भवन, राजनेताओं के आवासों, न्यायालय भवन आदि को निशाना बनाया जा रहा है. इन हमलों को इस बात का प्रतीक बताया जा रहा है कि आंदोलन भ्रष्ट राजनीति, न्यायपालिका के विरुद्ध है. आंदोलनकर्ता समूह मुख्य रूप से युवा छात्र वर्ग है, इसके चलते इस आंदोलन को जेन ज़ी की क्रांति नाम दिया जा रहा है. जेन ज़ी मुख्य रूप से 13 से 28 वर्ष के युवाओं को सामूहिक रूप से सम्बोधित करने हेतु प्रयुक्त किया जाता है. यह वो पीढ़ी है जो वर्ष 1997 से 2012 के बीच जन्मी है और संचार क्रांति के लाभों के मध्य पल्लवित हुई.

 



ऐसा कहा जा रहा है कि नेपाल सरकार के एक फैसले, जिसमें 26 सोशल मीडिया प्लेटफार्म को बंद कर दिया गया, के परिणामस्वरूप नेपाल में ये आंदोलन भड़क उठा. आंदोलन भड़कने का तात्कालिक कारण भले ही सोशल मीडिया पर नियंत्रण का प्रयास माना जा जाये किन्तु इसके मूल में कुछ और ही कारण है. दरअसल नेपाल की इस तथाकथित जेन ज़ी क्रांति भी पाकिस्तान, म्यांमार, श्रीलंका, बंग्लादेश में हुए तख्तापलट और विद्रोह के समान है, जिस कहानी के सूत्रधार नॉन स्टेट एक्टर्स हैं. देखा जाये तो यह राज्य और अराज्यीय तत्वों का संघर्ष है. साम्यवादी विचाधारा का राजनीतिक रूप से भले ही अवसान प्रतीत होता हो किन्तु आज भी सत्त्ता को अराजकतावादी आंदोलन से उखाड़ फेंकने वाले तत्व मौजूद हैं. यही तत्व राज्य से इतर एक अन्य व्यवस्था और तंत्र बनाकर राज्य से संघर्ष का वातावरण तैयार करते हैं. इन्हीं तत्वों को हम डीप स्टेट और नॉन स्टेट एक्टर्स के रूप में जानते हैं. डीप स्टेट का उपयोग अक्सर उन गुप्त और शक्तिशाली समूहों या संस्थाओं के लिए किया जाता है जो किसी देश की सरकार और राजनीतिक प्रणाली पर पीछे से प्रभाव डालते हैं. यह अवधारणा अक्सर षड्यंत्र सिद्धांतों से जुड़ी होती है और इसका अर्थ है कि कुछ शक्तिशाली व्यक्ति या संगठन सरकारी नीतियों और निर्णयों को गुप्त रूप से नियंत्रित करते हैं.इसमें अक्सर उच्च पदस्थ अधिकारी, सैन्य अधिकारी, खुफिया एजेंसियों के सदस्य और अन्य प्रभावशाली व्यक्ति शामिल होते हैं.

 

विगत कुछ वर्षों के घटनाक्रमों और आंदोलनों में उनकी कार्यशैली (मोडस ऑपरेंडी) पर ध्यान दिया जाए तो एक आश्चर्यजनक समानता देखी जा सकती है. वर्ष 2019 में भारत में नागरिकता संशोधन अधिनियम, 2024 में न्यूनतम समर्थन मूल्य को लेकर किसानों को भड़काने, 2023 में मणिपुर में जातीय संघर्ष को भड़का कर भारत में भी अराज्यीय तत्वों द्वारा ऐसा ही कुछ करने का प्रयास किया गया. इस कार्य हेतु विपक्ष के नेताओं और प्रभावशाली व्यक्तियों को बड़े पैमाने में विदेशों से धन उपलब्ध कराया गया जिससे पहले आंदोलन भड़काया जाए फिर अलोकतांत्रिक तरीके से सरकार को गिराया जाए. जनवरी 2021 में जब डोनाल्ड ट्रंप चुनाव हार गए तब भी डीप स्टेट तत्वों द्वारा व्हाइट हाउस पर कब्जे का प्रयास किया गया. बाद में डोनाल्ड ट्रंप के चुनाव जीतने को भी डीप स्टेट से ही जोड़ा जाता है. 2022 में श्रीलंका, 2024 में बंग्लादेश की सरकारों को भी इसी तरह विदेशी सहायता के बल पर आंदोलनों की आड़ में अवैध तरीके से सत्ता छोड़ने को मजबूर किया गया. इन देशों में ठीक वैसे ही छात्र आंदोलन, सरकार, न्यायालय का विरोध, संसद भवन,राष्ट्रपति भवन, महत्वपूर्ण परिसरों में लूटपाट और हिंसा हुई जिस तरह से आज नेपाल में हो रहा है.

 

इन सभी आंदोलनों में एक और समानता दिखती है कि आंदोलन बिना किसी नेता के शुरू होता है, जनता को सड़कों पर लाकर सरकार विरोधी पराकाष्ठा होती है, फिर भयंकर हिंसा, लूटपाट द्वारा सरकारी तंत्र को ध्वस्त किया जाता है, मंत्रियों, नेताओं को देश छोड़ने को विवश कर संवैधानिक संकट पैदा किया जाता है, इन सबके बाद अचानक से आंदोलन का नेता प्रकट हो जाता है जिसका समर्थन सेना भी करती है. अचानक प्रकट हुए यही नेता अमरीकी एजेंट बताए जाते हैं. नेपाल और बांग्लादेश की घटनाओं में अमेरिकन प्रभाव को स्पष्ट रूप से महसूस किया जा सकता है. इन सभी उदाहरणों में एकमात्र भारत ही ऐसा है जहाँ डीप स्टेट के षड्यंत्र से सरकार को बेदखल नहीं किया जा सका. इसका कारण भारत की बेहद स्थिर संसदीय व्यवस्था, अनुशासित सेना और बहुमत की मजबूत सरकार है. सांस्थानिक विकास के कारण ही भारत इन अन्तराष्ट्रीय षड्यंत्रों से बच पाया है.

 

आज नेपाल एक गंभीर संकट में फँस चुका है. अगले कुछ दिनों में वहाँ भी बांग्लादेश के मुहम्मद यूनुस की तरह एक डमी नेता बैठा दिया जाएगा लेकिन तात्कालिक आक्रोश में नेपाल के युवाओं ने देश को एक अनिश्चित भविष्य की ओर धकेल दिया है. यह सत्य है कि भ्रष्टाचार और बेरोजगारी बहुत गंभीर मुद्दे हैं जिन पर कोई भी सरकार कार्य नहीं करना चाहती. इसी कारण जनता में आक्रोश पैदा होता है, जिसका फायदा राष्ट्रविरोधी शक्तियाँ सरलता से उठा रही हैं. राजनीतिक आदर्शवाद की पुनर्स्थापना, राजनीतिक शुचिता और सदाशयता आज की माँग है, जिसे दुनिया भर की सरकारों को अपना प्राथमिक एजेंडा बनाना होगा अन्यथा राज्य को अराज्यीय तत्वों द्वारा ऐसे ही निगल लिया जाएगा. यह वातावरण राष्ट्रीय पहचान और नागरिक स्वतंत्रता को समाप्त करने वाला होगा. राज्यविहीनता किसी विचारधारा का आदर्श हो सकता है किन्तु नागरिकों के लिए नारकीय यातना है. फिलिस्तीन और शरणार्थियों के रूप में राज्यविहीन नागरिकों की मानवीय त्रासदी हमारे समक्ष जीवित उदाहरण हैं, जिनसे सबक लेने की आवश्यकता है.