राष्ट्रीय पत्रिका 'अमृत भूमि' के नवम्बर 2023 अंक में प्रकाशित लेख.
शनिवार, 11 नवंबर 2023
अपने परिवारों के दीपक को न बुझने देंगे
राष्ट्रीय पत्रिका 'अमृत भूमि' के नवम्बर 2023 अंक में प्रकाशित लेख.
मंगलवार, 7 नवंबर 2023
अपने परिवारों के दीपक को न बुझने देंगे
“आपने मेरे बचपन और बच्चा होने का फायदा उठाया, मुझे विज्ञान पढ़ने के लिए मजबूर किया. आप मेरी छोटी बहन के साथ ये मत करना, उसे वो पढ़ने देना जो वो पढ़ना चाहती है.” ये शब्द हैं उस पत्र के जिसे वर्ष 2016 में जेईई की तैयारी करने वाली एक छात्रा कृति त्रिपाठी ने आत्महत्या से पहले अपनी माँ को लिखा था. ऐसा उसने कम अंक आने के कारण नहीं किया था बल्कि वह मानसिक रूप से परेशान हो गई थी. सात साल बाद भी ऐसी स्थिति बदली नहीं है. इस बीच खबरें लगातार आती रहीं मगर किसी ने ये नहीं सोचा कि आखिर किसी विद्यार्थी के मन में ऐसी नफरत क्यों पनप उठी कि उसे आत्महत्या जैसा कदम उठाना पड़ा? इस सवाल के आईने में यदि हम कोचिंग मंडी के रूप में प्रसिद्ध शहर कोटा की विगत कुछ माह की घटनाओं को देखें तो बहुत कुछ साफ़-साफ़ दिखाई देगा. यह हम सबके लिए शर्मनाक स्थिति है कि एक तरफ हम दीपोत्सव मनाने वाले हैं दूसरी तरफ बहुत से परिवारों के दीपक बुझे जा रहे हैं. पिछले कुछ माह से कोटा विद्यार्थियों की आत्महत्या के कारण लगातार सुर्ख़ियों में है. पिछले आठ माह में चौबीस छात्र आत्महत्या कर चुके हैं, उनमें से आधे से ज़्यादा छात्र नाबालिग़ थे. इस वर्ष आत्महत्या करने वाले विद्यार्थियों में पंद्रह वर्ष का एक बच्चा भी शामिल है जो सिर्फ एक महीने पहले ही कोटा आया था और बारह छात्र ऐसे थे, जिन्होंने कोटा पहुँचने के छह महीने के भीतर ही आत्महत्या कर ली.
आँखों
में सपने लिए जो बच्चे यहाँ आते हैं, उनकी
बच्चों के सपनों को किसी न किसी रूप में यही शहर मिटाने में लगा हुआ है. प्रवेश
परीक्षाओं में सफलता का सपना लिए पूरे देश से लाखों बच्चे इस शहर आते हैं. लगभग
ढाई लाख से भी अधिक विद्यार्थी अलग-अलग कोचिंग संस्थानों में पढ़ते हैं. इन
संस्थानों में प्रवेश के लिए इनके अभिभावक एक लाख रुपये से लेकर तीन लाख रुपये तक
फीस भरते हैं. कैरियर की चकाचौंध के वशीभूत यहाँ आने वाले विद्यार्थी अपने अवयस्क
हृदय पर यह बोझ लेकर ही आते हैं. यहाँ आने के बाद इन विद्यार्थियों का तनाव भरा
एकाकी जीवन आरम्भ होता है. घर, स्कूल, दोस्त,
आराम, मस्ती आदि सब कहीं पीछे छूट जाते हैं. यदि इनके साथ होती
है तो बस वो गलाकाट प्रतियोगिता, जिसमें इन युवाओं को मशीन
बन कर दौड़ना होता है.
सोचने
वाली बात है कि एक तरफ हम सभी अपने पर्वों-त्योहारों के प्रति बहुत ही संवेदनात्मक
स्थिति में रहते हैं, दूसरी तरफ उनके
प्रति ही अत्यंत कठोर हो जाते हैं जिनसे हमारे घरों के त्योहारों में जीवन आता है.
देखा जाये तो कोटा शहर वर्तमान में महज बाजार बनकर रह गया है. यहाँ के कोचिंग
संस्थानों के लिए यहाँ आने वाला विद्यार्थी कमाई का साधन मात्र हैं. इन कोचिंग
ठेकेदारों की मानसिकता से अभिभावकों की भी मानसिकता साम्य स्थापित कर लेती है. इसी
कारण वे अपने ही बच्चे की योग्यता, रुझान, क्षमता, मनोस्थिति, खान-पान,
आराम आदि को दरकिनार कर उनको उस सपने के पीछे भागने को विवश करते
हैं, जो शायद उस किशोर हृदय ने कभी देखा ही न हो. किसी और के
सपनों को पूरा करने के लिए इन किशोरों को कोचिंग मंडियों में ईंधन की तरह प्रयोग
किया जा रहा है.
इन
सबके बीच दुखद यह है कि प्रतिस्पर्धा और तथाकथित सफलता का यह भूत किसी के अन्तर्मन
को जागने नहीं देता है. कोचिंग संस्थानों की कार्यशैली,
बच्चों को एटीएम समझने की सोच और विज्ञापन संस्कृति बड़े सपनों का
बोझ लादे आम परिवारों से आये इन बच्चों के मनोबल को तोड़ देती है. कोचिंग संस्थानों
द्वारा लगातार मॉक टेस्ट लेना, कम स्कोर करने वाले
विद्यार्थियों को डीग्रेड कर दूसरे बैचों में डालना, अच्छे
अंक लाने वालों को विशेष बैच में स्थानांतरित करना भी प्रतियोगियों के लिये अवसाद
का कारण बनता है. बेहतर न कर पाने का दुख, डीग्रेड हो जाने
की चिंता, असहाय अकेला मन, अभिभावकों
को परिणाम देने का दबाव आदि मिलकर अवसाद की एक ऐसी खाई खोदता है जिससे बाहर निकलने
में कई बच्चे असमर्थ हो जाते हैं और वे वह रास्ता चुनते हैं जहाँ से लौटने का कोई मार्ग
नहीं.
अभिभावकों
और प्रतियोगियों को यह समझना होगा कि इंजीनियर या डॉक्टर न बन पाने का मतलब जीवन
में संभावनाओं का अंत नहीं है. सफलता किसी एक व्यवसाय से बंधी नहीं हैं. अपने
बच्चे के नाज़ुक परों पर उम्मीदों का ऐसा बोझ न लादें कि उसका जीवन से ही मोह भंग
हो जाये. उड़ने दीजिये उन्हें उन्मुक्त आकाश में, वे निश्चित ही अच्छा करेंगे. इस दीपावली के पावन पर्व पर एक दीप अपने घर
में जलाते समय संकल्प लीजिये कि आप न केवल अपने घर-परिवार का बल्कि अपने आसपास के
घरों का कोई दीपक इस गलाकाट प्रतियोगिता के कारण बुझने नहीं देंगे. हम सबके दीपक
अपने भविष्य को रोशन करें, यही हम सबकी कामना, लक्ष्य होना चाहिए.

