गुरुवार, 29 अगस्त 2024

अपने मूल उद्देश्य से दूर होता आरक्षण

सर्वोच्च न्यायालय ने 2004 में दिए अपने ही निर्णय को पलटते हुए 01 अगस्त को आरक्षण पर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया. इसमें कहा गया कि राज्य सरकारें अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) में उप-वर्गीकरण कर सकती हैं. इसका अर्थ हुआ कि राज्य सरकारें अपने वंचित वर्गों के लिए अलग से आरक्षण की व्यवस्था कर सकती हैं. यह फैसला सर्वोच्च न्यायालय की सात सदस्यीय संवैधानिक पीठ ने एक के मुकाबले छह के बहुमत से दिया. इस फैसले का आधार अनुसूचित वर्ग में अनेक ऐसी जातियों का होना है जो अत्यधिक वंचित हैं. इनको उचित आँकड़ों के आधार पर अनुसूचित वर्ग के आरक्षण की निर्धारित सीमा में आरक्षण का लाभ दिया जाए, जिससे आरक्षण का मूल उद्देश्य प्राप्त किया जा सके. देश में अभी एससी को 15 प्रतिशत और एसटी को 7.5 प्रतिशत आरक्षण मिलता है. सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद इसी 22.5 प्रतिशत आरक्षण में एससी और एसटी के कमजोर वर्गों हेतु अलग से कोटा तय होगा. इससे पूर्व 2004 में सर्वोच्च न्यायालय ने अनुसूचित वर्ग के उप-वर्गीकरण पर रोक लगाई थी. तब उसका मत था कि राज्य को ऐसा करने का अधिकार नहीं क्योंकि इसका निर्धारण राष्ट्रपति द्वारा किया जाता है. आरक्षण पर सर्वोच्च न्यायालय के वर्तमान निर्णय के बाद आरक्षण फिर से बहस का मुद्दा बना हुआ है.

 



एससी-एसटी के उप-वर्गीकरण करने सम्बन्धी निर्णय देने के इसी अवसर पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अनुसूचित वर्ग में भी ओबीसी की तरह क्रीमी लेयर बनाने की सलाह दी. अभी आरक्षण हेतु अनुसूचित वर्ग में क्रीमी लेयर लागू नहीं है, यह प्रावधान एससी-एसटी में पदोन्नति के सन्दर्भ में है. ध्यातव्य है कि ओबीसी क्रीमी लेयर में शामिल लोगों को आरक्षण का लाभ नहीं मिलता है. क्रीमी लेयर के अनुसार यदि किसी ओबीसी परिवार की वार्षिक आय आठ लाख रुपये से अधिक है तो उसके सदस्य को आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा. क्रीमी लेयर उस समूह विशेष को कहते हैं जो अपने समूह के अन्य लोगों की अपेक्षा सामाजिक तथा आर्थिक रूप से सशक्त हैं.

 

सर्वोच्च न्यायालय की इस टिप्पणी के बाद आरक्षण को लेकर राजनैतिक घमासान की स्थिति पैदा हो गई. इसने सरकार को असमंजस की स्थिति में ला खड़ा किया. विपक्षी दलों को राजनीति करने का एक मुद्दा मिल गया. राजनीति के हाशिये पर खड़े तमाम दल और बहुजन सम्प्रदाय के तथाकथित हितैषी सड़कों पर निकल आये. सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को पलटने के लिए, मूल मुद्दे को भटकाने के लिए ऐसे लोगों द्वारा धरना-प्रदर्शन, भारत बन्द, आन्दोलन जैसे कदम उठाये गए.

 

संवैधानिक रूप से सरकारों को अधिकार प्राप्त है कि वे संविधान के अनुच्छेद 15(3, 4, 5, 6अ) एवं 16(4) के तहत ऐतिहासिक, सामाजिक, शैक्षणिक रूप से पिछड़ी, छुआछूत की शिकार जातियों के उन्नयन हेतु उपाय कर सकती हैं. आरक्षण भी उन उपायों में एक है. संविधान में आरक्षण की व्यवस्था समाज के वंचित वर्गों को अवसर उपलब्ध कराने हेतु की गई. सामाजिक न्याय के लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु इस व्यवस्था को अपनाया गया. इसका मुख्य उद्देश्य शोषित रहीं उन जातियों को समान अवसर उपलब्ध करवाना है, जो भेदकारी सामाजिक संरचना में बहुत पीछे छूट गईं. दुखद यह है कि आज यह व्यवस्था ही सबसे अधिक शोषण और विभेदकारी बनी हुई है. यह न्याय और समान अवसरों की उपलब्धता के संवैधानिक अधिकारों का मखौल उड़ाती है. आरक्षण का लाभ लेने वाली जातियाँ इसे अपना अधिकार मान बैठी हैं जबकि एक अवसर पर सर्वोच्च न्यायालय स्पष्ट कर चुका है कि आरक्षण कोई मौलिक अधिकार नहीं है. आज न तो आजादी के समय जैसी सामाजिक स्थितियाँ हैं और न ही जनमानस की सोच उस समय के जैसी है. बावजूद इसके सामाजिक न्याय के नाम पर पिछड़े और अनुसूचित वर्गों के लिए आरक्षण की व्यवस्था बनी हुई है.

 

सच्चाई यह है कि आरक्षण ने एक ऐसा नवसामंत वर्ग तैयार कर दिया है जिसके पास संसाधनों तक पहुँच और राजनैतिक रसूख दोनों ही हैं किन्तु ये नवसामंत अपने को वंचित और शोषित दर्शाते हुए समस्त संसाधनों का दोहन करते रहना चाहते हैं. ऐसा करके वे सामाजिक न्याय के लक्ष्य को तार-तार कर रहे हैं. यदि किसी अनुसूचित परिवार से कोई व्यक्ति सर्वोच्च पद पर भी पहुँच जाए; माता पिता दोनों ही सिविल सेवा अधिकारी हो जाएँ तो भी उनकी संतान वंचित और शोषित ही कही जाती है. ऐसे में इस मनोवृत्ति का क्या किया जा सकता है? आरक्षण द्वारा एक ऐसा बड़ा वर्ग तैयार हो गया है जो निरंतर आरक्षण का लाभ लेकर उन वास्तविक वंचितों और शोषितों का हक मार रहा है जो गरीबी और अभाव का जीवन जी रहे हैं. सामाजिक न्याय की स्थापना हेतु योग्यता को नजरअंदाज करके भी आरक्षण के मूल लक्ष्य को अब तक प्राप्त नहीं किया जा सका है, न ही कभी किया जा सकेगा.

 

इस दोषपूर्ण व्यवस्था ने समाज को पहले से भी कहीं ज्यादा बाँट दिया है. आरक्षण की रेवड़ी समस्या से ध्यान हटा सकती है पर उसका समाधान नहीं कर सकती है. असल समस्या जाति नहीं बल्कि गरीबी है, संसाधनों का न्यायपूर्ण बँटवारा है, अवसरों की अनुपलब्धता है. इनका हल आरक्षण से नहीं हो सकता है. अतः बहुत आवश्यक है कि मूल समस्या को पहचान कर व्यवस्थाएँ बनाई जाएँ न कि राजनैतिक लाभ के लिए अन्याय और शोषण पर आधारित व्यवस्था को सामाजिक न्याय के नाम पर ढोया जाए. समाज के सबसे गरीब व्यक्ति तक उन्नयन के अवसर पहुँचने चाहिए. जिससे सामाजिक न्याय और समानता के लक्ष्यों वास्तव में प्राप्त किया जा सके.


मंगलवार, 6 अगस्त 2024

बांग्देलाश के हालात हमारे लिए सबक

हमारे पड़ोसी देश बांग्लादेश में जो कुछ विगत दिनों घटित हुआ वो भारत के लिए बेहद चिंताजनक है. बांग्लादेश की प्रधानमंत्री को इस्तीफा देकर देश छोड़कर भारत आने को विवश होना पड़ा. माह जून से ही बांग्लादेश में लगातार हिंसक प्रदर्शन चल रहे हैं, जिनमें 300 लोग मारे जा चुके हैं. मरने वालों में अधिकांश ढाका यूनिवर्सिटी के छात्र हैं. इस हिंसक आंदोलन के कारण एक चुनी हुई सरकार जा चुकी है और उसके नेता को देश छोड़ना पड़ा. हिंसक प्रदर्शन में शेख मुजीब की प्रतिमा तक जनता के निशाने पर है. प्रधानमंत्री आवास पर जनता का कब्ज़ा है और चार लाख प्रदर्शनकारी ढ़ाका की सड़कों पर हैं. सेना तख्तापलट कर एक बार फिर सत्ता पर नियंत्रण कर चुकी है.

 

इन स्थितियों के पीछे बांग्लादेश उच्च न्यायालय का वो फैसला है जिसमें 2018 में सरकारी नौकरियों में रद्द किए गए आरक्षण को फिर से बहाल कर दिया गया. इस फैसले से सरकारी नौकरियों में आरक्षण की सीमा को बढ़ा कर 56 प्रतिशत कर दिया गया. इसमें 30 प्रतिशत आरक्षण मुक्ति योद्धा के नाम पर 1971 के स्वतंत्रता सेनानियों के परिवारों को देने की बात कही गई. यही आरक्षण रोष का प्रमुख कारण बना, जिसके इतने गंभीर परिणाम सामने आए. इस फैसले के विरुद्ध छात्रों में तीव्र प्रतिक्रिया हुई और ढाका मार्च का आह्वान किया गया. आंदोलन की अगुआई ढाका यूनिवर्सिटी के नाहिद इस्लाम नामक छात्र ने की और 8 जुलाई से देश में तालाबन्दी की घोषणा की.

 



जुलाई से आंदोलन ने गति पकड़ ली और देश भर से प्रदर्शनकारी ढाका में इकट्ठे होने लगे. शेख हसीना के नेतृत्व वाली अवामी लीग की सरकार ने आंदोलन को दमन करने का प्रयास किया. बड़े पैमाने पर छात्रों की गिरफ्तारियां हुई और बल प्रयोग किया गया. आन्दोलनकारी हसीना के इस्तीफे की मांग पर अड़ गए. हसीना सरकार ने यद्यपि सुप्रीम कोर्ट में हाइकोर्ट के फैसले के विरुद्ध अपील की जिस पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इस आरक्षण को निरस्त भी कर दिया, लेकिन तब तक देर हो चुकी थी. सरकार द्वारा प्रदर्शनकारियों से निपटने के गलत तरीकों ने अवामी लीग की ज़मीन सरका दी. पार्टी विरोधी दल, जमात के स्लीपर सेल, आईएसआई तब तक आंदोलन में घुस चुके थे. छात्रों का आंदोलन जो आरक्षण की चिंगारी से भड़का अब वो किसी और ही दिशा में किसी और लक्ष्य के लिए कार्य कर रहा था. शेख हसीना की चुनी हुई सरकार को निर्वासित कर सेना और कट्टरपंथियों ने सत्ता पर नियंत्रण लिया. ये सब कुछ वैसे ही हुआ जैसे कुछ समय पहले अफगानिस्तान, श्रीलंका, म्यांमार में हुआ था.

 

यह आंदोलन एक वैश्विक मोडस ऑपरेंडी के अनुसार है, ठीक वैसे ही जैसे अमरीका में ट्रंप के चुनाव हारने के बाद, भारत में किसान विरोधी आंदोलन और सीएए के विरोध के समय देखा गया. अंतर सिर्फ इतना है कि भारत और अमेरिका में प्रजातन्त्र की जड़ें गहरी हैं और सेना सत्ता पर नियंत्रण का लक्ष्य नहीं रखती बल्कि नागरिक नियंत्रण में कार्य करने की अभ्यस्त है. अन्यथा अफगानिस्तान, म्यांमार, पाकिस्तान, मालदीव, श्रीलंका और बांगलादेश की भांति यह प्रयोग यहां भी सफल होता. बांग्लादेश में फिलहाल शेख हसीना को आर्मी ने डील करके सेफ पैसेज दे दिया है, जिससे वो भारत आ सकी. ऐसा ही कुछ श्रीलंका और अफगानिस्तान में किया गया था. यहाँ कहने का आशय यह है कि ये सारा घटनाक्रम और कार्यशैली संयोगवश एक जैसे नहीं हैं बल्कि इनके गहरे खतरनाक अर्थ हैं. भारत के चारों तरफ सभी पड़ोसी देशों में ये सब किया जा रहा है, भारत के राज्यों- उत्तर-पूर्व एवं पश्चिम बंगाल में भी ये इस्लामिक आव्रजन और पिछले कुछ समय से मणिपुर में चल रही घटनाएं किसी एक पटकथा के भाग हैं, जिन्हें धीरे-धीरे लागू करने का प्रयास किया जा रहा है.

 

दरअसल बांग्लादेश में कोटा सिस्टम तो एक बहाना ही है. जब फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने निरस्त कर दिया तो आंदोलन भी समाप्त हो जाना चाहिए था पर ऐसा नहीं हुआ. इसके पीछे और भी वृहद स्ट्रेटेजी काम कर रही है. भारत के चारों तरफ सरकारों का पतन होना और सेना के हाथों में सत्ता नियंत्रण होना यूं ही नहीं हो रहा. मणिपुर के बहाने भारत में भी जनसंघर्ष के द्वारा सत्ता बेदखली का प्रयोग किया जा रहा है. उत्तर-पूर्व में ये घटना गम्भीर खतरे पैदा करेगी. उनसे निपटने की कोशिश में ऐसे ही उबाल हमारी सड़कों पर भी देखने को मिलेंगे. इस्लामिक कट्टरपंथ का जिन्न पश्चिम एवं मध्य एशिया के बाद बांग्लादेश के बहाने पूर्व एशिया में घुस आया है.

 

भारत के लिए ये सभी स्थितियां चिंताजनक हैं क्योंकि न सिर्फ सुरक्षा बल्कि व्यावसायिक दृष्टि से भी बांग्लादेश का पतन हमारे हितों के विरुद्ध है. यदि कट्टरपंथी ताकतवर होंगे तो वृहत्तर इस्लामिक बांग्लादेश की योजना पर कार्य करेंगे, जिससे हमारी उत्तर-पूर्वी सीमा दबाव में आ जायेगी. आव्रजन के बहाने इस्लामिक आबादी को भारत में ठेला जाएगा जो अन्ततः संघर्ष में परिणित होगा. इन शरणार्थियों के नाम पर आने वाले मुस्लिमों को रोकने की कोशिश में सरकार को हमारे देश के भीतर से ही चुनौतियां दी जाएगी. हमारी सड़कों पर भी इस्लामी जिन्न खून की होली खेलने की कोशिश करेगा. भारत को बेहद सतर्क और सधे हुए तरीके से इस समस्या से निपटने की आवश्यकता है. देश को अपने हितों की रक्षा के लिए सतर्क रहना होगा.