सर्वोच्च न्यायालय
ने 2004 में दिए अपने ही निर्णय को पलटते हुए 01 अगस्त को आरक्षण पर एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया. इसमें कहा गया कि राज्य
सरकारें अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) में उप-वर्गीकरण कर सकती हैं.
इसका अर्थ हुआ कि राज्य सरकारें अपने वंचित वर्गों के लिए अलग से आरक्षण की व्यवस्था
कर सकती हैं. यह फैसला सर्वोच्च न्यायालय की सात सदस्यीय संवैधानिक पीठ ने एक के
मुकाबले छह के बहुमत से दिया. इस फैसले का आधार अनुसूचित वर्ग में अनेक ऐसी
जातियों का होना है जो अत्यधिक वंचित हैं. इनको उचित आँकड़ों के आधार पर अनुसूचित वर्ग
के आरक्षण की निर्धारित सीमा में आरक्षण का लाभ दिया जाए, जिससे आरक्षण का मूल उद्देश्य
प्राप्त किया जा सके. देश में अभी एससी को 15 प्रतिशत और एसटी को 7.5 प्रतिशत आरक्षण
मिलता है. सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद इसी 22.5 प्रतिशत आरक्षण में एससी और
एसटी के कमजोर वर्गों हेतु अलग से कोटा तय होगा. इससे पूर्व 2004 में सर्वोच्च न्यायालय
ने अनुसूचित वर्ग के उप-वर्गीकरण पर रोक लगाई थी. तब उसका मत था कि राज्य को ऐसा करने
का अधिकार नहीं क्योंकि इसका निर्धारण राष्ट्रपति द्वारा किया जाता है. आरक्षण पर सर्वोच्च
न्यायालय के वर्तमान निर्णय के बाद आरक्षण फिर से बहस का मुद्दा बना हुआ है.
एससी-एसटी के
उप-वर्गीकरण करने सम्बन्धी निर्णय देने के इसी अवसर पर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अनुसूचित
वर्ग में भी ओबीसी की तरह क्रीमी लेयर बनाने की सलाह दी. अभी आरक्षण हेतु अनुसूचित
वर्ग में क्रीमी लेयर लागू नहीं है, यह प्रावधान एससी-एसटी में पदोन्नति के सन्दर्भ
में है. ध्यातव्य है कि ओबीसी
क्रीमी लेयर में शामिल लोगों को आरक्षण का लाभ नहीं मिलता है. क्रीमी लेयर के अनुसार
यदि किसी ओबीसी परिवार की वार्षिक आय आठ लाख रुपये से अधिक है तो उसके सदस्य को आरक्षण
का लाभ नहीं मिलेगा. क्रीमी लेयर उस समूह विशेष को कहते हैं जो अपने समूह के अन्य
लोगों की अपेक्षा सामाजिक तथा आर्थिक रूप से सशक्त हैं.
सर्वोच्च न्यायालय
की इस टिप्पणी के बाद आरक्षण को लेकर राजनैतिक घमासान की स्थिति पैदा हो गई. इसने सरकार
को असमंजस की स्थिति में ला खड़ा किया. विपक्षी दलों को राजनीति करने का एक मुद्दा मिल
गया. राजनीति के हाशिये पर खड़े तमाम दल और बहुजन सम्प्रदाय के तथाकथित हितैषी सड़कों
पर निकल आये. सर्वोच्च न्यायालय के फैसले को पलटने के लिए, मूल मुद्दे को भटकाने
के लिए ऐसे लोगों द्वारा धरना-प्रदर्शन, भारत बन्द, आन्दोलन जैसे कदम उठाये गए.
संवैधानिक रूप से
सरकारों को अधिकार प्राप्त है कि वे संविधान के अनुच्छेद 15(3, 4, 5, 6अ) एवं 16(4) के तहत ऐतिहासिक, सामाजिक, शैक्षणिक रूप से पिछड़ी, छुआछूत
की शिकार जातियों के उन्नयन हेतु उपाय कर सकती हैं. आरक्षण भी उन उपायों में एक
है. संविधान में आरक्षण की व्यवस्था समाज के वंचित वर्गों को अवसर उपलब्ध कराने हेतु
की गई. सामाजिक न्याय के लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु इस व्यवस्था को अपनाया गया. इसका
मुख्य उद्देश्य शोषित रहीं उन जातियों को समान अवसर उपलब्ध करवाना है, जो भेदकारी सामाजिक संरचना में बहुत
पीछे छूट गईं. दुखद यह है कि आज यह व्यवस्था ही सबसे अधिक शोषण और विभेदकारी बनी
हुई है. यह न्याय और समान अवसरों की उपलब्धता के संवैधानिक अधिकारों का मखौल उड़ाती
है. आरक्षण का लाभ लेने वाली जातियाँ इसे अपना अधिकार मान बैठी हैं जबकि एक अवसर पर
सर्वोच्च न्यायालय स्पष्ट कर चुका है कि आरक्षण कोई मौलिक अधिकार नहीं है. आज न तो
आजादी के समय जैसी सामाजिक स्थितियाँ हैं और न ही जनमानस की सोच उस समय के जैसी है.
बावजूद इसके सामाजिक न्याय के नाम पर पिछड़े और अनुसूचित वर्गों के लिए आरक्षण की व्यवस्था
बनी हुई है.
सच्चाई यह है कि आरक्षण
ने एक ऐसा नवसामंत वर्ग तैयार कर दिया है जिसके पास संसाधनों तक पहुँच और राजनैतिक
रसूख दोनों ही हैं किन्तु ये नवसामंत अपने को वंचित और शोषित दर्शाते हुए समस्त संसाधनों
का दोहन करते रहना चाहते हैं. ऐसा करके वे सामाजिक न्याय के लक्ष्य को तार-तार कर रहे
हैं. यदि किसी अनुसूचित परिवार से कोई व्यक्ति सर्वोच्च पद पर भी पहुँच जाए; माता पिता दोनों ही सिविल
सेवा अधिकारी हो जाएँ तो भी उनकी संतान वंचित और शोषित ही कही जाती है. ऐसे में इस मनोवृत्ति
का क्या किया जा सकता है? आरक्षण
द्वारा एक ऐसा बड़ा वर्ग तैयार हो गया है जो निरंतर आरक्षण का लाभ लेकर उन वास्तविक
वंचितों और शोषितों का हक मार रहा है जो गरीबी और अभाव का जीवन जी रहे हैं. सामाजिक
न्याय की स्थापना हेतु योग्यता को नजरअंदाज करके भी आरक्षण के मूल लक्ष्य को अब तक
प्राप्त नहीं किया जा सका है, न ही कभी किया जा सकेगा.
इस दोषपूर्ण व्यवस्था
ने समाज को पहले से भी कहीं ज्यादा बाँट दिया है. आरक्षण की रेवड़ी समस्या से ध्यान
हटा सकती है पर उसका समाधान नहीं कर सकती है. असल समस्या जाति नहीं बल्कि गरीबी है, संसाधनों का न्यायपूर्ण बँटवारा है,
अवसरों की अनुपलब्धता है. इनका हल आरक्षण
से नहीं हो सकता है. अतः बहुत आवश्यक है कि मूल समस्या को पहचान कर व्यवस्थाएँ बनाई
जाएँ न कि राजनैतिक लाभ के लिए अन्याय और शोषण पर आधारित व्यवस्था को सामाजिक न्याय
के नाम पर ढोया जाए. समाज के सबसे गरीब व्यक्ति तक उन्नयन के अवसर पहुँचने चाहिए. जिससे
सामाजिक न्याय और समानता के लक्ष्यों वास्तव में प्राप्त किया जा सके.

