शुक्रवार, 27 जून 2025

विश्वयुद्ध का खतरा और सीजफायर का भविष्य

ईरान और इजराइल में भले ही सीजफायर हो गया हो मगर एक समय इस युद्ध से विश्वयुद्ध का खतरा नजर आया था. ईरान के परमाणु कार्यक्रम को समाप्त करने की अपनी जिद के चलते इज़राइल ने ईरान पर हवाई हमले कर दिए. नेतन्याहू स्पष्ट रूप से कह चुके थे कि वे लक्ष्य को प्राप्त किये बगैर रुकने वाले नहीं हैं. अपनी इसी जिद के चलते इज़राइल पूरी ताकत से ईरान की सैन्य ताकत और परमाणु क्षमता को तबाह करने पर आमादा रहा. ऐसी स्थिति में ईरान भी खामोश होकर नहीं बैठा बल्कि उसने भी पूरी तीव्रता से इजराइल पर पलटवार किये. ईरान के जोरदार हमलों से इज़राइल को काफी नुकसान हुआ. उसकी वायु रक्षा प्रणाली ईरान की बैलिस्टिक मिसाइल का सामना नहीं कर पाई. उसके द्वारा दागी गई हायपरसोनिक मिसाइलों ने तेलअबीव में भयानक तबाही मचाई. आयरन डोम और सभी प्रतिरक्षा प्रणालियों को ध्वस्त कर ईरान द्वारा इज़राइल पर कुछ सफल हमले किये गए. उसके द्वारा किये गए ताबड़तोड़ बैलिस्टिक मिसाइल हमलों में इज़राइली बस्तियाँ, शहर, अस्पताल आदि निशाने पर रहे. अपने हमलों में उसने सैनिक, असैनिक लक्ष्यों में कोई भेद नहीं किया.

 

युद्ध की इस स्थिति में अमेरिका के असमंजस भरे रुख को देखकर शंका हो रही थी कि कहीं इजराइल ने ईरान पर हमला करके गलती तो न कर दी? ऐसा इसलिए क्योंकि इजराइल पश्चिम एशिया और मध्य पूर्व में अमेरिका भूराजनीति का आधार है, ऐसे में उसे विश्वास था कि ईरान के साथ युद्ध की स्थिति में अमेरिका उसका खुलकर साथ देगा. इस विपत्ति काल में अमेरिका अविश्वसनीय नजर आ रहा था. ईरान पर समझौता करने का दबाव बनाते ट्रम्प अपनी नीति से पूरी तरह से पलटते दिखाई दिए. अमेरिका के खुलकर युद्ध में उतरने को लेकर भी दूरी बनाते नजर आये. ईरान की बढती ताकत के बीच अमरीका पर विश्वास करके इज़राइल बेहद असहज स्थिति में फँसा नजर आ रहा था. ऐसा महसूस हुआ कि इस बार ईरान की ताकत को समझने और युद्ध करने के इजराइल के निर्णय में कुछ खामी रह गई. इज़राइल के आयरन डोम के असफल होने के बाद उसके व्यापारिक, औद्योगिक केन्द्र ईरान के निशाने पर रहे, जिसके सामरिक लाभ के साथ-साथ वृहद स्ट्रैटिजिक अर्थ भी थे. अर्थव्यवस्था पर चोट इज़राइल की यौद्धिक क्षमता तोड़ कर रख देगी और माइक्रोसॉफ्ट ऑफिस पर हमला इसका ही उदाहरण था.

 

शंका से भरे ऐसे वातावरण में अमेरिका ने ऑपरेशन मिडनाइट हैमर के द्वारा ईरान के तीन परमाणु ठिकानों- फोर्दो, नतांज और इस्फहान पर हमला कर दिया. इस हमले में 125 एयरक्राफ्ट, सात बी-2 स्टील्थ बॉम्बर्स के द्वारा ईरान के परमाणु ठिकानों पर 13,608 किलो वजनी बस्टर बम गिराए गए. युद्ध में शामिल होने के बाद भी अमेरिका ने कहा कि वह ईरान से युद्ध नहीं चाहता है मगर यदि इस हमले का पलटवार ईरान द्वारा किया गया तो उसके परिणाम बहुत बुरे होंगे. अमेरिका द्वारा ईरान के परमाणु संयत्रों पर हमला करने के बाद इस तरह की धमकी भरे अंदाज में बयान देने के बाद ऐसा माना जा रहा था कि ईरान इसका जवाब नहीं देगा किन्तु जिस तरह से कतर, इराक, कुवैत पर उसने मिसाइलें दागी, उससे ईरान ने दुनिया को दिखा दिया कि वह अमेरिका की धमकी या उसकी दबंगई से डरने वाला नहीं है. इसे अमेरिका की धमकी कहा जाये या फिर नसीहत, ईरान ने उसे मानने से इंकार करते हुए कतर के अमेरिकी बेस पर सीधा हमला कर दिया. यह एक तरह से जहाँ अमेरिका की धमकी को नजरंदाज करना था वहीं अमेरिका को खुली चुनौती देना भी था.

 

ईरान के इस पलटवार से मध्य पूर्व के देशों तक युद्ध की आग फैलने की आशंका बढ़ गई थी. मध्य पूर्व के देशों में अमेरिका के एक दर्जन से भी अधिक अड्डे हैं जिनकी सुरक्षा खतरे में आ चुकी थी. चूँकि ईरान किसी भी स्थिति में अमेरिका की ज़मीन पर हमला नहीं कर सकता, इस कारण उसके द्वारा मध्य पूर्व के अमेरिकी अड्डों को निशाना बनाया गया. ईरान के इस पलटवार के पीछे आत्मघाती कदम की आहट भी सुनाई दी. यदि इस पलटवार पर अमेरिका आक्रोशित हो गया तो कहीं ये हमला ईरान के लिए पर्ल हार्बर हमले की तरह आत्मघाती सिद्ध न हो जाये. पर्ल हार्बर पर जापान के हमले का बदला लेने के लिए अमेरिका ने जापान पर परमाणु बम गिरा दिया था. जिसका दुष्परिणाम जापान आज तक भुगत रहा है. फ़िलहाल तो ईरान के इस पलटवार के बाद भी अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प द्वारा इजराइल-ईरान में सीजफायर होने की घोषणा सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म द्वारा की गई, जिसको पहले तो ईरान द्वारा नकारा गया किन्तु बाद में ईरान और इजराइल इस युद्धविराम पर राज़ी हो गए.

 

इस स्थिति के बाद भी समय अनिश्चितता का है, संशय का है. ऐसे में भविष्य ही तय करेगा कि कल क्या होगा? दरअसल इस युद्ध के केन्द्र में ईरान का परमाणु कार्यक्रम रहा. अब जबकि फोर्दो परमाणु संयंत्र अमेरिकी हमले के कारण पूरी तरह से बर्बाद हो गया है मगर ऐसा अंदेशा लगाया जा रहा है कि ईरान ने हमले से पहले ही संवर्द्धित यूरेनियम को किसी दूसरे स्थान पर स्थानांतरित कर दिया है. यदि यह अंदेशा सत्य हुआ तो जहाँ अमेरिका के हमले का उद्देश्य पूरा नहीं हो सका वहीं ईरान का परमाणु कार्यक्रम अभी जिंदा बना हुआ है. यह संवर्धित यूरेनियम ही ईरान को परमाणु बम तक ले जा सकता है. इसके साथ ही अमेरिका की अविश्वसनीयता किसी से भी छिपी नहीं है, ऐसे में कल को अमेरिका का ही रुख क्या होगा, ये भी समय की मुट्ठी में है. अब समय ही तय करेगा कि ईरान-इजराइल सीजफायर का वास्तविक भविष्य क्या है.


सोमवार, 23 जून 2025

ईरान द्वारा अमरीकी अड्डे पर हमला

 आज ईरान की कतर के अमरीकी बेस पर सीधा हमला कर न सिर्फ अमरीका को चुनौती दी है अपितु मध्य पूर्व के देशों तक युद्ध की आग लगा दी गई है। मध्य पूर्व के देशों में अमरीका के एक दर्जन से भी ज्यादा अड्डे हैं जिनकी सुरक्षा खतरे में आ चुकी है। यह संभावना कम ही मानी जा रही थी ईरान ऐसा कोई कदम उठा सकता है। आज इराक,कुवैत,कतर पर मिसाइलें दाग ईरान दुनिया को यह दिखाना चाह रहा कि वो अमरीका और इज़राइल दोनों को ही मुँह तोड़ जवाब देने में सक्षम है।

लेकिन ईरान के इस कदम ने तमाम मुस्लिम देशों को अपने विरोध में कर लिया है। अमरीकी अड्डे इस पूरे क्षेत्र में बड़ी संख्या में हैं।

इस घटना ने ऐसे सभी देशों संशकित कर दिया जिनकी ज़मीन पर अमरीकी अड्डे हैं।

लेकिन ईरान के पास भी बहुत ज़्यादा विकल्प नही बचे हैं, वो अमरीकी ज़मीन पर हमला नहीं कर सकते इस कारण मध्य पूर्व के अमरीकी अड्डों को निशाना बना रहे हैं। दरअसल सारा मामला फोर्दो परमाणु संयंत्र पर हमले से जुड़ा हुआ है।अमरीका और इज़राइल के हमले में यह जगह पूरी तरह से बर्बाद हो गई,लेकिन ऐसा अंदेशा और खबरे हैं कि हमले से पहले संवर्द्धित यूरेनियम को ईरान द्वारा किसी और स्थान पर स्थानांतरित कर दिया । इस प्रकार हमले का उद्देश्य पूरा नहीं हो सका।

यह संवर्धित यूरेनियम ही ईरान को परमाणु बम तक ले जा सकती है। अब यदि वकाई में ईरान फोर्दो से यूरेनियम बचाने में सफल रहा है तो उसका परमाणु कार्यक्रम अब भी जिंदा है।इस कार्यक्रम को ज़िंदा बनाये रखने के लिए ये ईरान के लिए बहुत आवश्यक हो चुका है कि वह अमरीका को कहीं और उलझाए जिससे उन्हें परमाणु कार्यक्रम को जारी रखने और बम बनाने के लिए कुछ समय मिल जाये।

कतर, कुवैत,इराक के अमरीकी अड्डो पर हमला कर ईरान अमरीका के ध्यान भटकाने,उलझाने की कोशिश कर रहा है।

जब तक ईरान अमरीका प्रतिरोध,प्रतिक्रिया में उलझे रहेंगे ईरान परमाणु सामग्री को सुरक्षित कर आगे कदम बढ़ा सकता है।यदि एक बार वो बम बनाने में सफल हो जाएगा तो स्थितियां स्वयं ईरान के हित मे बदली जा सकती हैं।

लेकिन यदि ईरान ऐसा नहीं कर सका तो कहीं ये घटना भी पर्ल हार्बर हमले की तरह न सिद्ध हो जाये जिसके कारण अमरीका द्वितीय  विश्वयुद्ध में कूद गया और 1941 के इस जापानी हमले का बदला अमरीका द्वारा 1945 में जापान पर परमाणु बम गिरा कर लिया गया।

खैर !कल क्या होगा वो ये तय करेगा कि ईरान का कदम सही रहा कि आत्मघाती सिद्ध हुआ।

शुक्रवार, 20 जून 2025

क्या अमेरिका पर विश्वास कर इज़राइल फंस गया?

इजराइल-हमास संघर्ष के समय से ही ईरान द्वारा इसमें हस्तक्षेप करने की आशंका बनी हुई थी. बदलती परिस्थितियों में ईरान की परमाणु परियोजना रोकने के प्रयासों में इजराइल ने ईरान पर हवाई हमले कर दिए. इजराइल-ईरान युद्ध की ऐसी स्थिति में पश्चिम एशिया से आ रही खबरों में इस समय ईरान के पलटवार की खूब चर्चा है. ईरान के जोरदार हमलों से इज़राइल को काफी नुकसान हुआ है. उसकी वायु रक्षा प्रणाली ईरान की बैलिस्टिक मिसाइल का सामना नहीं कर पा रही है. ईरान द्वारा किये जा रहे ताबड़तोड़ बैलिस्टिक मिसाइल हमलों में इज़राइली बस्तियाँ, शहर, अस्पताल आदि निशाने पर हैं. वह अपने हमलों में सैनिक, असैनिक लक्ष्यों में कोई भेद नहीं कर रहा है. उनकी यही एकमात्र सामरिकी इज़राइल को परेशानी में डाल रही है.

 

ईरान के फोर्दो परमाणु सयंत्र पर हमले की इज़राइली ज़िद और ईरान के पूर्व राष्ट्रपति खामनेई की हत्या की योजना के चलते वर्तमान युद्ध स्थिति बनी. इजराइल की इस तरह की योजना के पीछे अमेरिकी मंशा की सम्भावना जताई जा रही है. इसका बहुत बड़ा कारण इजराइल की स्थिति है. दरअसल पहले से ही गाजा में उलझे हुए इज़राइल के लिए सबसे बड़ी चुनौती ईरान की बढ़ती हुई ताकत है. ऐसे में ईरान का परमाणु बम बनाने की स्थिति तक पहुँचना इज़राइल के अस्तित्व को सीधी चुनौती है. स्पष्ट है कि यदि ईरान परमाणु बम बना लेगा तो उसका सम्भावित प्रयोग इजराइल पर ही होगा. ऐसी विषम परिस्थिति को जानने-समझने के बाद कोई भी देश अपने अस्तित्व पर आए संकट को अनदेखा नहीं कर सकता. इज़राइल की स्थिति ऐसी है कि ज़िंदा रहना है तो युद्ध के लिए तैयार रहना होगा. इसके अलावा वैश्विक महाशक्तियों में इज़राइल को अमेरिकी भूराजनीति का और ईरान को रूस की भूराजनीति का मोहरा माना जाता है. इजराइल पश्चिम एशिया और मध्य पूर्व में अमेरिका भूराजनीति का आधार है. इज़राइल को कमज़ोर करके इस क्षेत्र में अमरीकी भूराजनीति को कम किया जा सकता है. आशंका है कि अमेरिका को निशाना बनाने के लिए रूस अपनी ग्रेटर स्ट्रेटेजी के द्वारा नाटो देशों में अलगाव और पश्चिम एशिया की स्थितियों को अपने हितों के अनुरूप ढालने का प्रयास करेगा. ऐसे में सम्भव है कि इजराइल को ईरान की परमाणु शक्ति का भय दिखाकर अमेरिका ने अपने हित साधने का प्रयास किया हो.

 



ईरान की बढती ताकत के बीच अमरीका पर विश्वास करके इज़राइल बेहद असहज स्थिति में फँस चुका है. राष्ट्रपति ट्रम्प, जो एक बड़बोले नेता के रूप में जाने जाते हैं, उनके खुलकर समर्थन की आशा में इजराइल इस स्थिति में आ गया है. कुछ इसी तरह की स्थिति में दुनिया ने यूक्रेन को देखा कि कैसे नाटो ने उसे रूस के साथ आत्मघाती संघर्ष में उलझा दिया, जो आज तक जारी है. पूरा यूक्रेन राख हो गया पर युद्ध का कोई परिणाम नहीं निकला है, न ही युद्ध रुका है. संभवतः इस बार ईरान की ताकत को समझने और युद्ध करने के इजराइल के निर्णय में कुछ खामी रह गई. इज़राइल के आयरन डोम के असफल होने के बाद उसके व्यापारिक, औद्योगिक केन्द्र ईरान के निशाने पर हैं, जिसके सामरिक लाभ के साथ-साथ वृहद स्ट्रैटिजिक अर्थ भी हैं. अर्थव्यवस्था पर चोट इज़राइल की यौद्धिक क्षमता तोड़ कर रख देगी. माइक्रोसॉफ्ट ऑफिस पर हमला इसका ही उदाहरण है. विपत्ति काल में अमरीकी मित्र सबसे अविश्वसनीय है, यह एक बार फिर साबित हो गया. कल तक ट्रम्प ईरान पर समझौता करने का दबाव बनाते दिख रहे थे, आज अपनी नीति से पूरी तरह से पलट चुके हैं. अमेरिका के खुलकर युद्ध में उतरने को लेकर भी दूरी बनाते नजर आ रहे हैं. ईरान ने होरमुज की खाड़ी में अमेरिका की घेरेबंदी कर उसके मन मे डर पैदा कर दिया है. ये सारी दुनिया जानती है कि अमरीकी सेना कभी भी ज़मीनी लड़ाई में आमने-सामने लड़ कर जीत नहीं सकी है और हथियार छोड़ कर भागती रही है. वियतनाम रहा हो या फिर अफगानिस्तान, उसका यही इतिहास रहा है.

 

रूस, चीन, कोरिया और 21 अरब देशों का एकसाथ विरोध मोल लेकर इज़राइल को बचाने के लिए अमेरिका युद्ध में खड़ा होगा ये दूर की कौड़ी लग रहा है. क्लस्टर बमों की मार झेल रहे इज़राइल को जी.बी.यू. 57 और टैक्टिकल न्यूक्लियर हथियार ही बचा सकते हैं लेकिन इनका प्रयोग अमेरिका के लिए भी तबाही लाएगा. पश्चिम एशिया की वर्तमान स्थितियाँ बेहद खतरनाक हो चुकी हैं. एक ट्रिगर पर ये संघर्ष परमाणु युद्ध में बदल सकता है. यदि फोर्दो परमाणु संयंत्र पर हमला होता है तो रेडियोएक्टिव रिसाव होगा और ईरान के पास परमाणु प्रतिरोध का विकल्प खुल जायेगा. यदि ईरान के पास बम नहीं भी होगा तो रूस, चीन, पाकिस्तान आदि से उसे उपलब्ध कराया जा सकता है. यद्यपि बंकर बरस्टिंग बम के बिना फोर्दो परमाणु सयंत्र, जो ईरान की राजधानी तेहरान से 200 किमी दूर है, जहाँ 300 किमी ज़मीन के अंदर परमाणु सामग्री को रखा गया है, को आसानी से निशाना नहीं बनाया जा सकता तथापि ऐसा होता है तो यह बेहद खतरनाक कदम होगा.

 

वर्तमान सन्दर्भों में भले ही ईरान हावी दिख रहा है, मीडिया रिपोर्टिंग इज़राइल विरोधी लग रही है, अरब और जिहादी संसार में मनोबल उच्च लग रहा है, अमेरिका पीछे हटना चाह रहा है तब भी इज़राइल इन परिस्थितियों को पलटने में सक्षम है. यह किसी को भूलना नहीं चाहिए कि कोई भी जंग सिर्फ मिसाइलों और छद्म संगठनों के सहारे नहीं जीती जा सकती और ईरान के पास यही दो चीज़े हैं. आमने-सामने की जंग में  स्थितियाँ कुछ और ही होंगी. कुछ समय बाद ईरान कितने मिसाइल हमले कर पायेगा? क्या अमेरिका ऐसे ही चुप होकर बैठा रहेगा? इज़राइल किस सीमा तक जाएगा? आदि प्रश्न युद्ध का भविष्य तय करेंगे. यदि इज़राइल के सामने अस्तित्व का संकट उपस्थित होगा तो यह युद्ध पारंपरिक ही रह पाएगा इसमें संदेह है.


सोमवार, 16 जून 2025

ईरान- इज़राइल संघर्ष

 पश्चिम एशिया में इज़राइल और ईरान के मध्य चल रहा विध्वंसक संघर्ष वैश्विक चिंता का विषय है। इज़राइल, ईरान की सैन्य ताकत और परमाणु क्षमता को तबाह करने पर आमादा है। नेतन्याहू साफ कर चुके हैं इस लक्ष्य को प्राप्त किये बगैर वे रुकने वाले नहीं हैं। ईरान अभी तो प्रतिरोध कर रहा है,उसके द्वारा दागी गई हायपरसोनिक मिसाइलों ने तेलअबीव में भयानक तबाही मचाई है। आयरन डोम और सभी प्रतिरक्षा प्रणालियों को ध्वस्त कर ईरान द्वारा इज़राइल पर कुछ सफल हमले किये गए हैं, किंतु ये सफलता इज़राइल पर हावी होने के पर्याप्त नहीं है। ईरान बहुत दिनों तक इज़राइल के हमलों का सामना नहीं कर पायेगा और उसके लिए झुकने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा। इज़राइल पर कुछ सफल हमलों से जिहादी, इस्लामिक संसार मे भले जश्न का माहौल हो पर यह नितांत अस्थाई है।

युद्ध में ऐसे नुकसान होते ही रहते हैं  चाहे दुश्मन कितना भी कमजोर क्यों न हो,वो कभी न कभी नुकसान पहुंचा ही सकता है। इज़राइल की युद्ध क्षमता और इक्षाशक्ति का मुकाबला ईरान नहीं कर सकता।

हाल के भारत-पाक संघर्ष, ईरान- इज़राइल के वर्तमान संघर्ष से युद्ध की रणनीति में आये कुछ परिवर्तनों को स्पष्ट रूप से समझा जा सकता है। पहला ये कि परमाणु ताकत ब्लैकमेल करने की शक्ति खो चुकी है। दूसरा ये कि छद्म युद्ध में मुखौटे के पीछे छुपे राज्य, अब इस तरह से बिना किसी कीमत के युद्ध जारी नहीं रख सकते।भारत हो या इज़रायल दोनों ने ही छद्म युद्ध की आड़ में लड़ रहे राज्य को युद्ध का जिम्मेदार मानते हुए सीधी कार्यवाही करने में संकोच नहीं किया है। सबक साफ है लड़ना है तो मैदान में आओ!! देखते हैं कौन किस पर भारी पड़ेगा?

शुक्रवार, 13 जून 2025

परमाणु भयादोहन

 क्या परमाणु भयादोहन अब बीते समय की बात हो गई है?

इस्राएल और ईरान के मध्य शुरू हो गए संघर्ष ने दुनिया भर के रणनीतिकारों के मध्य इस बहस को तीव्र कर दिया है कि परमाणु अस्त्र शस्त्र जो उन्नीस सौ पैतालिस के जापान और हिरोशिमा की तबाही के बाद से ही भयादोहन का साधन माने जाते रहे, इनकी उपलब्ध्ता ने राज्यों को शक्ति क्रम में ऊपर कर दिया। इन हथियारों के बल पर महाशक्तियों ने विश्व राजनीति को अपने अपने स्वार्थों के अनुरूप जैसे चाहा वैसे चलाया। दक्षिण एशिया, पश्चिम एशिया इस राजनीति का सबसे भयानक शिकार रहे। अमरीका और पूर्व सोवियत संघ की प्रतिद्वंद्वी राजनीति ने परमाणु अप्रसार के जितने प्रयास किये उतना ही इनका फैलाव हुआ। कुछ परमाणु कार्यक्रम घोषित रहे और कुछ अघोषित। दोनों महाशक्तियों द्वारा अपने साथियों को परमाणु सहायता और हथियार उपलब्ध करवाए गए जिसके परिणाम स्वरूप परमाणु शस्त्र होड़ बढ़ती गई। चीन के परमाणु शक्ति और साम्राज्य वादी नीतियों के कारण भारत को भी परमाणु सुरक्षा की आवश्यकता हुई और भारत ने परमाणु बम बनाया भी। पश्चिम की राजनीति ने शांतिप्रिय भारत के परमाणु कार्यक्रम जो मात्र आत्मरक्षा के लिए था को रोकने के तो हर संभव प्रयास किये, किंतु पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम को अनदेखा कर उसे परमाणु बम तक पहुंचने दिया। वही अमरीका ईरान के परमाणु कार्यक्रम को इज़राइल के माध्यम से रोकने की पूरी कोशिश कर रहा है। इस्राइल के कल के हमलों में ईरान में भयानक तबाही हुई है और सबसे महत्वपूर्ण बात ये कि इस्राइल द्वारा ईरान के परमाणु केंद्रों पर सीधा हमला किया गया है। ऐसा ही कुछ हमने ऑपरेशन सिन्दूर के समय देखा था जब भारत ने पाकिस्तान की परमाणु कमान पर सीधा हमला कर दिया था। भारत ने परमाणु भयादोहन को किनारे करने का जो दुस्साहस दिखाया उसने परमाणु ब्लैकमेल की रणनीति को क्या शून्य कर दिया है? ईरान हमला अवश्य करेगा और देखना होगा कि ये संघर्ष परमाणु संघर्ष तक पहुँचेगा अथवा नहीं। भारत के सैन्य रणनीतिकारों ने

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान नए मानक तय कर दिए हैं परमाणु हमले के प्रयास को दुश्मन की ज़मीन पर ही खत्म कर देना। इस दक्षता के द्वारा ही परमाणु हमले के खतरे को उदासीन किया जा सकता है। शायद इस्राएल इसी रणनीति पर काम कर ऐसा दुस्साहस दिखा रहा है। खैर जो भी हो परमाणु हथियार,परमाणु धमकी अब मनमानी करने की गारंटी नहीं रही ऐसा भारत और इस्राइल के कदमों को देख कर कहा जा सकता है।

रविवार, 8 जून 2025

संक्रियात्मक दक्षता के उच्चतम सोपान पर सैन्य क्षमता

पहलगाम आतंकी हमले के बाद ऑपरेशन सिन्दूर अभियान में पाक अधिकृत कश्मीर और पाकिस्तान में नौ आतंकी ठिकानों को मिसाइल हमलों के द्वारा निशाना बनाया गया. इसमें लश्कर-ए-तोयबा और जैश-ए-मोहम्मद के ठिकानों को भारतीय सेना ने ध्वस्त कर दिया. इसके लिए सेना द्वारा मात्र 24 सटीक, लक्ष्य केन्द्रित और अकाट्य हमले किये गये, जिनको पाकिस्तानी रक्षा प्रणाली द्वारा पहचाना न जा सका तो उनको रोकने का प्रश्न ही नहीं उठता. पाकिस्तान के अवाक्स को भी भारत के हमलों ने बेकार कर दिया. पाकिस्तान की वायु रक्षा प्रणाली, जो चीन से आयातित थी, उसे भारतीय वायु सेना ने पूरी तरह से निष्क्रिय कर दिया. इन अप्रत्याशित हमलों से बौखलाए पाकिस्तान ने भारत के 26 शहरों पर मिसाइल और ड्रोन से हमला करना चाहा लेकिन भारत की वायु रक्षा प्रणाली ने सभी हमलों को हवा में ही असफल कर दिया.

 

इस बार आतंकी हमले का जवाब भारत द्वारा जिस तरह से दिया गया इसका उदाहरण पूरी दुनिया में कहीं भी नहीं मिलता है. पिछले चालीस वर्षों से निरंतर सीमा पार प्रायोजित आतंकवाद में भारत ने लगभग तीस हजार नागरिकों और सैनिकों को खोया है, लेकिन कभी ऐसे जवाब नहीं दिया जैसे इस बार दिया. ऐसा पहली बार हुआ कि भारत ने आतंक का प्रतिकार करने की अपनी प्रतिरक्षात्मक नीति को पूरी तरह पलट दिया. जिसने न सिर्फ महाशक्तियों को बल्कि हमें निरंतर घाव देने वाले पाकिस्तान और उसके आकाओं को भी अचंभित कर दिया. सम्पूर्ण विश्व में यह पहला उदहारण है जब किसी परमाणु शक्ति ने किसी दूसरी परमाणु शक्ति पर सीधा हमला बोला. मात्र 22 मिनट में सीमापार के नौ आतंकी ठिकानों को बिना किसी प्रतिरोध के ध्वस्त करना और एकसाथ पकिस्तान के 11 वायु ठिकानों पर सफल हमला करना भारतीय सैन्य क्षमता की उत्कृष्टता का परिचायक है. अमेरिकी एफ16 फाइटर जेट, चीनी एचक्यू 90, एलवाई 80, एचक्यू16 वायु रक्षा प्रणाली आदि सटीक रणनीति और संक्रियात्मक क्षमता के आगे घुटने टेक गई. भारत ने अंतर्राष्ट्रीय सीमा से सौ किमी अन्दर बहावलपुर आतंकी ठिकाने पर स्कैल्प मिसाइल का सफल हमला करके साबित कर दिया गया सैकड़ों किमी तक ऐसे ही सफल हमले किये जा सकते हैं, जिसका तोड़ पाकिस्तान के पास नहीं है.

 



भारत-पाक संघर्ष के चार दिनों में भारत ने दक्षिण एशिया में अपनी सैनिक सर्वोच्चता के नये मानक खड़े किये. बेहतरीन आक्रामक क्षमता, जीरो टाइम संक्रियात्मक दक्षता, आक्रामक दुस्साहस की भारी-अनपेक्षित कीमत वसूलने की योग्यता ने पाकिस्तान को तो बौना साबित किया ही, चीन के लिए भी स्पष्ट लाल रेखा खींच दी. मिसाइलों की ग्रिड निर्देशांक के एक मीटर के घेरे में सफल, सटीक मारक क्षमता के द्वारा भारत ने सिद्ध किया कि आमने-सामने की लड़ाई के बिना भी वह दुश्मन की कमर तोड़ सकता है. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने स्पष्ट भी किया कि दुनिया के किसी देश को परमाणु ब्लैकमेल की नीति से पहले सौ बार सोचना होगा. भारत ने अपने ‘न्यू नॉर्मल’ घोषित कर दिए है. भारत को अस्थिर करने, घाव देने का कोई भी प्रयास युद्ध होगा और इसका प्रतिकार करने के अपने नैतिक एवं वैधानिक अधिकार से वह पीछे नहीं हटेगा. पाकिस्तानी परमाणु कमान के नजदीक नूर खान एयरबेस पर सफल हमला, किराना हिल्स की घटनाओं और परमाणु विकिरण की अफवाहों आदि से भारत ने स्पष्ट सन्देश दिया कि किसी भी परमाणु हमले के प्रयास को वह दुश्मन की ज़मीन पर ही ख़त्म कर सकता है. यद्यपि परमाणु विकिरण का खंडन किया गया तथापि आनन-फानन में पाकिस्तान का संघर्ष विराम के लिए गिड़गिड़ाना, युद्ध रोकने के पुरजोर वैश्विक प्रयासों को इस सन्दर्भ में देखा जा सकता है. आखिर युद्ध के कोहरे में तमाम तथ्य छुपे रह जाते है जिन्हें कोई पक्ष कभी नहीं स्वीकारता. फ़िलहाल, विदेशमंत्री का कथन ‘करारा जवाब दिया जाएगा’ बहुत कुछ कहता है, भारत की विश्वसनीयता सिद्ध करता है.

 

भारतीय सैन्य क्षमता ने संक्रियात्मक श्रेष्ठता से न सिर्फ रणनीतिक लक्ष्य को प्राप्त किया अपितु भविष्य के लिए परमाणु नीति को भी पुनर्भाषित किया है. सिन्धु जल संधि को स्थगित कर भारत ने दुस्साहस के प्रति साम, दाम, दंड, भेद की नीति को वास्तविकता के धरातल पर उतारा है. आपरेशन सिंदूर के द्वारा भारत ने ग्लोबल साउथ की तकनीकी विपन्नता और सैनिक शक्ति को यूरोप के मुकाबले निम्न माने जाने की धारणा को चूर-चूर कर दिया है. इजराइल और अमेरिका की तरह सटीक हमले कर भारत ने वैश्विक नेतृत्व की ओर ठोस कदम बढ़ाये हैं. विश्व व्यवस्था को नियंत्रित करते बड़े शस्त्र आपूर्तिकर्ता देशों को इस अभियान ने अचंभित कर दिया है.

 

मिसाइल प्रणाली एस400, एंटी-एयरक्राफ्ट गन एल70, बराक, ब्रह्मोस, आकाश मिसाइल, अत्यंत अल्प दूरी की वायु प्रतिरक्षा प्रणाली (वशोराड्स), एआई, उपग्रह आधारित नेविगेशन सिस्टम तथा उन्नत, स्वचालित प्रतिरक्षा प्रणाली आकाशतीर आदि से भारत ने एक अभेद्य प्रतिरक्षा तंत्र बनाया जिसकी तुलना इजराइल के आयरन डोम से की जा रही है. इस तुलना का कारण पश्चिमी सीमा पर पाकिस्तान द्वारा किये ताबड़तोड़ ड्रोन और मिसाइलों हमलों को सेना द्वारा इसी स्वदेशी प्रतिरक्षा प्रणाली द्वारा नाकाम किया जाना है. इस प्रतिरक्षा तंत्र को भारतीय कंपनियों डीआरडीओ, भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड, अल्फा डिज़ाइन्स द्वारा तैयार किया गया है. अभियान की सफलता ने शस्त्र निर्माण में भारत की उपलब्धियों का शानदार प्रदर्शन कर मेक इन इंडिया मुहिम को तो मजबूत किया ही साथ ही स्वदेशी हथियारों ने चीनी मिसाइलों और प्रतिरक्षा प्रणाली पर अपनी श्रेष्ठता भी सिद्ध की.

 

स्वदेशी प्रतिरक्षा प्रणाली की सफलता से भारत नवीन संभावनाओं के साथ शस्त्र व्यापार में उपस्थित है. यदि इस क्षेत्र में बड़े पैमाने पर निवेश किया जाए तो चीन, अमेरिका, तुर्किये के एशियाई बाजारों में भारत प्रवेश कर सकता है. उम्मीद है कि भारत शीघ्र ही समस्त बाधाओं को दूर कर हथियार निर्यात की राह पर मजबूत कदम रखेगा. निसंदेह आपरेशन सिन्दूर ने अपने रणनीतिक लक्ष्यों को साधने के साथ-साथ भारत की छवि को अपनी रक्षा करने में सक्षम-समर्थ, आक्रामक किन्तु संतुलित, शक्तिशाली सिद्ध किया है. नेतृत्व ने भी अपनी दूरदर्शिता साबित करते हुए बिना युद्ध में फँसे दुश्मन और पूरे विश्व को स्पष्ट सन्देश दिया है कि हम अब और नहीं सहेंगे, ईंट का जवाब पत्थर से देंगे.