गुरुवार, 28 सितंबर 2023
सांस्कृतिक वैभव संग सफलतम नेतृत्व
मंगलवार, 26 सितंबर 2023
भारत की साख से खिलवाड़
अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जी-20 के सफल आयोजन के
तुरंत बाद ही कनाडा के साथ भारत का सम्बन्ध वैश्विक चर्चा का विषय बना. जो समय
जी-20 जैसे वैश्विक आयोजन की सफलता, उसके क्रियान्वयन, उसके उद्देश्य में निकलना
चाहिए था, वह भारत-कनाडा संबंधों की चर्चा में व्यतीत हो रहा है. ऐसी चर्चा को हवा
उस समय मिली जबकि इसी सितंबर में कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रुडो ने एक बयान
देकर भारत की एजेंसियों पर खालिस्तानी आतंकी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या का आरोप लगा डाला. यह
आश्चर्य का विषय हो सकता है कि जिस व्यक्ति की हत्या का आरोप कनाडा के
प्रधानमंत्री द्वारा लगाया जा रहा है वह कोई सभ्रांत नागरिक नहीं बल्कि एक
खालिस्तानी आतंकी था, जो भारत से 1996 में भाग कर कनाडा में आ गया था. हरदीप सिंह
को कनाडा की नागरिकता भी प्राप्त थी. वर्ष 2012 में उसे पाकिस्तान में हथियारों और आईईडी धमाके करने की ट्रेनिंग दी गई थी. निज्जर को 200
हत्याओं में संलिप्त रहे गुरदीप
सिंह का सहयोगी बताया जा रहा है. इसके अलावा निज्जर को कनाडा में फिरौती, केटीएफके लिए नेटवर्क बनाना, ड्रग तस्करी आदि के द्वारा भारत विरोधी
गतिविधियों के लिए धन जुटाने में भी सक्रिय समझा जा रहा था. इस सन्दर्भ में 2018
में भारत सरकार द्वारा एक डोजियर कनाडा सरकार को सौंपा गया था और वर्ष 2020 में गृह मंत्रालय द्वारा UAPA के तहत उसे आतंकी भी घोषित किया गया था.
इसके पहले नवम्बर 2014 में निज्जर के विरुद्ध
भारत द्वारा इंटरपोल रेड कॉर्नर नोटिस भी जारी किया गया था. भारत द्वारा कनाडा के
अधिकारियों को समय-समय पर सूचित किया जाता रहा कि निज्जर खालिस्तान टाइगर फ़ोर्स, जो
एक प्रतिबंधित आंतकी संगठन है, को कनाडा की ज़मीन से चला रहा है. कनाडा सरकार को इसके
लिए भी आगाह किया जा चुका था कि निज्जर का पासपोर्ट फ़र्ज़ी है और उसने गलत तरीके से
नागरिकता प्राप्त की है. इसके बाद भी कनाडा सरकार द्वारा उसे उड़ान से प्रतिबंधित
करने के अतिरिक्त कुछ नहीं किया गया. निज्जर खालिस्तान आंदोलन को निरंतर आईएसआई के
सहयोग और निर्देश पर चला रहा था. भारतीय दूतावासों पर हमलों, राजनयिको को धमकियां जैसे कार्यों में वह संलिप्त
रहा मगर कार्यवाही करने के बजाय ट्रुडो सरकार उसे संरक्षण देती रही.
गौर करने योग्य है कि 19 सितंबर तक कनाडा की
सरकार न तो निज्जर के हत्यारों को पहचान सकी और न ही इस मामले में मुखर हुई. जी-20
सम्मेलन के पश्चात जस्टिन ट्रुडो अचानक ही भारत के विरुद्ध आक्रामक हो उठे और हाउस
ऑफ कॉमन्स में सीधे-सीधे भारत की एजेंसियों को आरोपित कर बैठे. अंतर्राष्ट्रीय
मामलों में बयान देने से पहले ट्रुडो को इतनी समझ होनी चाहिए थी कि किसी राष्ट्र
को सीधे-सीधे आरोपित करने से पहले पुख्ता सबूत दिए जाएं. ट्रुडो घरेलू राजनीति के दबाव
के चलते अथवा जी-20 सम्मेलन के दौरान आतंकियों को संरक्षण देने के मुद्दे पर भारत
के कठोररवैये के कारण न सिर्फ सम्मेलन में अलग-थलग पड़े बल्कि इससे उनको उनके ही देश
में आलोचना का शिकार होना पड़ा. इस दबाव और कुंठा से उबरने के लिए उन्होंने भारत को
निज्जर हत्याकांड में आरोपित कर दबाव बनाने का प्रयास किया.
कनाडा जो जी-7 का सदस्य है,अर्थव्यवस्था में दृढ़ है, अमेरिका का घनिष्ठ सहयोगी है, आसूचना के एक मजबूत नेटवर्क 5-आई का सदस्य है.
ऐसे में बिना सबूत के ही भारत पर आरोप लगा रहा है. यह और कुछ नहीं बल्कि जी-20 की
सफलता के पश्चात् भारत की वृहद अंतर्राष्ट्रीय भूमिका के दावे को कमज़ोर करने की
रणनीति मात्र है. भारत सयुंक्त राष्ट्र संघ के विस्तार और वीटो की माँग कर रहा है.
जी-20 सम्मेलन में अफ्रीकी यूनियन को शामिल कर वह तृतीय विश्व की आवाज़ बन उभरा है. यह पश्चिमी देशों के लिए एक अप्रिय स्थिति है. ऐसी
स्थिति में ब्रिटेन के भारत की तरफ झुकाव ने इनकी चिंताओं को और भी बढ़ा दिया है.
असल में आज अमेरिका सहित अन्य देशों को चीन के विरुद्ध भारत एक शक्तिशाली विकल्प
दिख रहा है. ऐसे में उन्हें भारत की आवश्यकता तो है पर एक ऐसे भारत की जो वैश्विक
शक्तिक्रम में नीचे भी रहे और सयुंक्त राष्ट्र में उनका मोहताज़ भी रहे. इसके लिए
खालिस्तान के मुद्दे पर भारत को उलझाना उनको सरल लगा.
जस्टिन ट्रुडो मोहरा बन कर पश्चिमी शक्तिओं की
उस सोच को सामने रख रहे हैं जो पूरी तरह से भारत को अन्तर्राष्ट्रीय
संधियों के उल्लंघनकर्ता,
सम्प्रभुता का सम्मान न करने वाला, मानवाधिकारों का दोषी सिद्ध कर भारत की सयुंक्त राष्ट्र संघ की स्थायी सदस्यता
के दावे को कमज़ोर करने के लिए रची गई है. फ्रीडम ऑफ स्पीच, रूल ऑफ लॉ, डेमोक्रेटिक
वैल्यूज जैसे शब्दों के पीछे जस्टिन ट्रुडो अपनी निम्न स्तरीय राजनीति और अपरिपक्व
सोच को छुपा नहीं सकते. खालिस्तानी आतंकियों को शरण देकर वे पाकिस्तान जैसे दिख
रहे हैं. पाकिस्तान का हश्र उनके सामने हैं, उन्हें
उससे कुछ सीखने की ज़रूरत है. यहाँ विचारणीय है कि खालिस्तान के लिए जनमत संग्रह
करवाने वाले क्यूबेक के लिए जनमत संग्रह क्यों नहीं करवाते? कानून के शासन का दम भरने वाले आतंकियों के
लिए सुरक्षित गढ़ क्यों बने हुए है? अभिव्यक्ति
की आज़ादी के नाम पर भारत के विभाजन की चाह रखने वालों को पालना किस संप्रभुता की
मर्यादा का पालन है?
वॉर अगेंस्ट टेरर के नाम पर 2001 से 2021 तक अमेरिका
अफगानिस्तान में बैठा रहा. इराक
में सद्दाम हुसैन की सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए 2003 से 2011 तक इराक में बैठा
रहा. यह साबित करता है कि आतंकवाद के मुद्दे पर
पश्चिमी देशों की कथनी और करनी में अंतर है. भारत सरकार निज्जर की हत्या में अपनी
किसी भी भूमिका से इंकार कर चुकी है. अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को ट्रुडो से यह अवश्य
पूछना चाहिए कि आतंकवाद को संरक्षण देने की यह रणनीति उन्हें किधर ले जाएगी? भारत
अपनी सुरक्षा करने में सक्षम है फिर चाहे वह संकट सीमा पर हो या अन्य किसी प्रकार का. खालिस्तान भारत में तो
नहीं बनेगा, हाँ, ट्रुडो चाहें तो उसे कनाडा की धरती पर बनवा सकते हैं. सुरक्षा का
नैसर्गिक अधिकार प्रत्येक राष्ट्र को प्राप्त है और उस पर आने वाले हर खतरे से
निपटने के लिए हमारा भारत हमेशा तैयार है.
सोमवार, 11 सितंबर 2023
रविवार, 10 सितंबर 2023
जी-20 सम्मलेन उद्घोषणा है नए गरजते, चमकते, उठते, ताकतवर भारत की
पिछले दो दिनों से देश की राजधानी वैश्विक चर्चा का केंद्र बनी हुई है. दिल्ली की चमक से पूरा संसार अचंभित है. ये अवसर रहा जी-20 की मेजबानी का, जो इस बार इसका अध्यक्ष होने के नाते भारत द्वारा की गई. बाली, इंडोनेशिया सम्मेलन में यह निश्चित किया गया गया कि आगामी अध्यक्षता भारत को दी जाए, इसी कारण जी-20 का अठारहवाँ शिखर सम्मेलन भारत की राजधानी नई दिल्ली में आयोजित किया गया. इसमें सभी सदस्य देशों के राष्ट्राध्यक्ष, प्रतिनिधि सम्मिलित हुए. इसके साथ ही संयुक्त राष्ट्र महासचिव, डब्लूएचओ के डीजी, विश्व बैंक के अध्यक्ष आदि जैसे विशिष्ट मेहमान भी उपस्थित हुए. इसके अतिरिक्त प्रधानमंत्री द्वारा कुछ गैर सदस्य देशों को भी आमंत्रित किया गया. भारत की मेजबानी ने दुनिया भर से आये मेहमानों को न सिर्फ सम्मोहित किया अपितु अविस्मरणीय यादों का एक आलेख उनके हृदय में भी अंकित कर दिया. विश्व की बीस सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं का समूह है जी-20, जो वैश्विक व्यापार और राजनीति पर गहरा प्रभाव रखता है. यह विश्व की लगभग दो तिहाई आबादी, वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद का 85 प्रतिशत, विश्व व्यापार का 75 प्रतिशत का प्रतिनिधित्व करने वाला मंच है.
इसकी स्थापना वर्ष 1999 में एशियाई वित्तीय संकट के बाद की गई थी. इसका उद्देश्य वैश्विक आर्थिक समस्याओं पर चिंतन करना, वित्त का प्रबंधन एवं महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा के लिए एक मंच देना है. अमेरिका, रूस, चीन, भारत, इटली, जापान, ब्रिटेन आदि जैसी बड़ी आर्थिक शक्तियाँ इसकी सदस्य हैं. अभी तक इसमें 19 देश और यूरोपीयन यूनियन सहित कुल 20 सदस्य थे किन्तु नई दिल्ली में हुए वर्तमान शिखर सम्मेलन में भारत के प्रस्ताव पर अफ्रीकन यूनियन को भी सदस्यता प्रदान कर दी गई है. इस प्रकार यह 21 सदस्यों का एक आर्थिक मंच बन गया है.
इस बार का यह सम्मेलन कई मायनों में विशेष और अविस्मरणीय रहा. न सिर्फ भारत के 60 शहरों में 200 से भी अधिक बैठकें आयोजित की गईं बल्कि दिल्ली को नये भारत का परिचय बना कर इस तरह प्रस्तुत किया गया कि दुनिया दंग रह गई. अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा मानकों, व्यवस्थाओं में भारतीय क्षमता को पूरी दुनिया ने देखा. भारतीय सुरक्षा व्यवस्था ही नहीं अपितु अभूतपूर्व मेजबानी का भी भारत ने अनुभव कराया. भारत मंडपम की शान, दिल्ली की सुंदरता, हमारी भव्य, विराट संस्कृति की झलक, कोर्णाक का चक्र, नटराज की विशाल अलौकिक मूर्ति, नालंदा के खंडहरों की प्रतिकृति, हस्तशिल्प आदि को भारत का प्रतीक बना कर दुनिया के सामने प्रस्तुत किया गया. इस आयोजन में भारत ने अपने वैभवशाली इतिहास, संस्कृति के साथ-साथ उन्नत, विकसित वर्तमान की ऐसी छवि प्रस्तुत की जिसे बस अलौकिक ही कहा जा सकता है. भारतीय संस्कृति को विदेशी मेहमानों ने केवल देखा ही नहीं बल्कि बहुतों से उसे आत्मसात भी किया. इसकी खूबसूरती तब देखने को मिली जबकि महामहिम द्वारा दिए गए रात्रिभोज में कई विदेशी मेहमान भारतीय परिधानों में नजर आये.
ऐसा नहीं है कि देश की अध्यक्षता, मेजबानी में सम्मिलित अतिथियों ने सिर्फ यहाँ की संस्कृति के, यहाँ के इतिहास के, यहाँ के शिल्प के ही दर्शन किये बल्कि यहाँ आकर उनको देश की वैचारिक समृद्धता से भी उनका परिचय हुआ. सम्मेलन की थीम ‘वन अर्थ, वन फैमली, वन फ्यूचर’ रही जो हमारी ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की उस शाश्वत, सनातनी सोच का प्रतिनिधित्व करती है जो समस्त विश्व को एक परिवार मानती है. आज के युद्धकाल में इस तरह की सोच का वैश्विक प्रसार करने की मानसिकता उसी देश की हो सकती है, जिसने इसे स्वयं में आत्मसात कर रखा हो.
सम्मेलन के आरंभ से ही तमाम आलोचक इसकी असफलता की भविष्यवाणी कर रहे थे. यूक्रेन युद्ध के कारण रूस-अमेरिकी तनाव, भारत-चीन संबंधों में तनाव को देखते हुए भले ऐसा कहा जा रहा हो किन्तु भारत ने अपनी राजनयिक कुशलता का परिचय देते हुए बहुत बड़ा कद प्राप्त कर लिया है. सम्मेलन में अमेरिकी राष्ट्रपति बाईडन, ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ऋषि सुनक की उपस्थिति ने नए अध्याय जोड़े वहीं चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग का इस सम्मेलन से दूरी बनाये रखने को अपनी फजीहत होने से बचने वाला कदम बताया गया. इसका एक और बड़ा कारण भारत और अमेरिका के मजबूत होते द्विपक्षीय संबंध भी है.
इसे भारत की राजनयिक सफलता ही कही जाएगी कि एक ही मंच पर अमेरिका,चीन, रूस शामिल हुए, यूक्रेन युद्ध पर चर्चा हुई तथा पहले दिन ही घोषणापत्र का निर्विरोध जारी होना रहा. नई दिल्ली घोषणापत्र का जारी होना भारत की कूटनीतिक, राजनयिक कुशलता का प्रतीक है. यह भारतीय राजनय की प्रभावशालिता का नया दौर है. तमाम महत्वपूर्ण भू राजनीतिक मुद्दों, मानव केंद्रित विकास, बायोफ्यूल्स के लिए सहयोग, आतंकवाद, फाटा की कार्यवाहियों को सख्त करने, अर्थ प्रबंधन, अधिक वित्त और ऋण की उपलब्धता सुनिश्चित करने, ग्रीन क्रेडिट, सतत समावेशी विकास, विश्वास बहाली के उपायों जैसे वैश्विक मुद्दों पर आम राय बनी और सहयोग का मार्ग खुला. भारत के संदर्भ में सबसे महत्पूर्ण विषय चीन के ‘वन रोड वन बेल्ट’ को काउंटर बैलेंस करने के लिए यूरोप, मध्य एशिया और भारत के मध्य आर्थिक गलियारे के निर्माण पर सहमति होना है. यह भारतीय सामानों की आसान पहुँच इन बाज़ारों तक कर देगा साथ ही साथ द्विपक्षीय व्यापार को भी बढ़ाएगा.
इस सम्मेलन ने भारत को वैश्विक राजनीति के केंद्र में खड़ा कर दिया है. आज का यह भारत जानता है कि भारतीय हितों को कैसे संवर्धित करना है. वह बड़ी शक्तियों से संतुलन साधने के साथ-साथ पिछड़े देशों की आवाज़ भी बना है. अफ्रीकन यूनियन को सदस्यता देना इसका प्रतीक है. सम्मेलन अपने लक्ष्यों को पाने में सफल रहा. तमाम खतरों के बाद भी भारत ने यह दिखा दिया कि वह बड़ी भूमिकाओं के लिए पूरी तरह से तैयार है. वह दक्षिणी भू-मंडल का नैसर्गिक नेतृत्वकर्ता है. जी-20 शिखर सम्मलेन उद्घोषणा है नए गरजते, चमकते, उठते, ताकतवर भारत की.
बुधवार, 6 सितंबर 2023
नाजुक परों पर उम्मीदों का बोझ न लादें
समाचार पत्र 'बीपीएन टाइम्स' दिनांक 06 सितम्बर 2023 के सम्पादकीय पृष्ठ पर प्रकाशित लेख
इसे यहाँ क्लिक करके पढ़ा जा सकता है.
रविवार, 3 सितंबर 2023
नाज़ुक परों पर उम्मीदों का बोझ न लादें
“आपने मेरे बचपन और बच्चा होने का फायदा उठाया, मुझे विज्ञान पढ़ने के लिए मजबूर किया. आप मेरी छोटी बहन के साथ ये मत करना, उसे वो पढ़ने देना जो वो पढ़ना चाहती है.” ये शब्द हैं उस पत्र के जिसे वर्ष 2016 में जेईई की तैयारी करने वाली एक छात्रा कृति त्रिपाठी ने आत्महत्या से पहले अपनी माँ को लिखा था. ऐसा उसने कम अंक आने के कारण नहीं किया था बल्कि वह मानसिक रूप से परेशान हो गई थी. उसने अपने मित्र को भी लिखा था कि “कोई विश्वास नहीं करेगा कि मेरे जैसी नब्बे प्रतिशत लाने वाली लड़की सुसाइड कर सकती है. लेकिन मैं बता नहीं सकती कि मेरे अंदर कितनी नफरत भरी है.” आखिर किसी विद्यार्थी के मन में ऐसी नफरत क्यों पनप उठी कि उसे आत्महत्या जैसा कदम उठाना पड़ा?
इस सवाल के आईने में यदि हम कोचिंग मंडी के रूप में प्रसिद्ध शहर कोटा की विगत कुछ माह की घटनाओं को देखें तो बहुत कुछ साफ़-साफ़ दिखाई देगा. इस शहर में पूरे भारत से छात्र, छात्राएँ इंजीनियरिंग, मेडिकल प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी के लिए आते हैं. पिछले कुछ माह से यह शहर छात्रों की आत्महत्या के कारण लगातार सुर्ख़ियों में है. पिछले आठ माह में चौबीस छात्र आत्महत्या कर चुके हैं, उनमें से आधे से ज़्यादा छात्र नाबालिग़ थे. इस वर्ष आत्महत्या करने वाले विद्यार्थियों में पंद्रह वर्ष का एक बच्चा भी शामिल है जो सिर्फ एक महीने पहले ही कोटा आया था और बारह छात्र ऐसे थे, जिन्होंने कोटा पहुँचने के छह महीने के भीतर ही आत्महत्या कर ली.
प्रवेश परीक्षाओं में सफलता का सपना लिए पूरे देश से लाखों बच्चे इस शहर आते हैं. लगभग ढाई लाख से भी अधिक विद्यार्थी अलग-अलग कोचिंग संस्थानों में पढ़ते हैं. पूरे शहर में लगभग चार हजार हॉस्टल्स, इससे ज्यादा पीजी और अनेक लॉज हैं, जिनमें अपना घर छोड़ कर आने वाले बच्चे रहते हैं. इन विद्यार्थियों से ही इस शहर की आमदनी का पहिया घूम रहा है. अपने घरों को छोड़ एक अनजान शहर में संघर्ष की भट्टी में झोंके गए अधिकांश विद्यार्थी नाबालिग होते हैं. इन संस्थानों में प्रवेश के लिए इनके अभिभावक एक लाख रुपये से लेकर तीन लाख रुपये तक फीस भरते हैं. इसके अलावा वे रहने, खाने-पीने और अन्य व्यवस्थाओं पर भी बड़ी राशि खर्च करते हैं. आसानी से समझा जा सकता है कि एक मध्यमवर्गीय परिवार के लिए सालाना चार से पाँच लाख रुपये का खर्च आसान नहीं है. कैरियर की चकाचौंध के वशीभूत यहाँ आने वाले विद्यार्थी अपने अवयस्क हृदय पर यह बोझ लेकर ही आते हैं. यहाँ आने के बाद इन विद्यार्थियों का तनाव भरा एकाकी जीवन आरम्भ होता है. घर, स्कूल, दोस्त, आराम, मस्ती आदि सब कहीं पीछे छूट जाते हैं. यदि इनके साथ होती है तो बस वो गलाकाट प्रतियोगिता, जिसमें इन युवाओं को मशीन बन कर दौड़ना होता है.
कोचिंग संस्थानों के लिए ये विद्यार्थी कमाई का साधन मात्र हैं. गैरकानूनी ढंग से व्यवसाय कर रही तमाम कोचिंग में कई विद्यार्थी कक्षा आठ, नौ के स्तर के होते हैं. ऐसे विद्यार्थियों को भी ये कोचिंग मंडी अपने व्यापार में घसीट लेती है. इनका डमी प्रवेश किसी स्कूल में करवा दिया जाता है, जहाँ पर कभी स्कूल न जाने के बाद भी उसमें प्रवेश बना रहता है. इन कोचिंग ठेकेदारों की मानसिकता से अभिभावकों की भी मानसिकता साम्य स्थापित कर लेती है. इसी कारण वे अपने ही बच्चे की योग्यता, रुझान, क्षमता, मनोस्थिति, खान-पान, आराम आदि को दरकिनार कर उनको उस सपने के पीछे भागने को विवश करते हैं, जो शायद उस किशोर हृदय ने कभी देखा ही न हो. किसी और के सपनों को पूरा करने के लिए इन किशोरों को कोचिंग मंडियों में ईंधन की तरह प्रयोग किया जा रहा है.
कोचिंग संस्थान, अभिभावक और स्वयं तैयारी करने वाले भी जानते हैं कि सफलता की दर मात्र एक, दो प्रतिशत है लेकिन सच को जानना और उसे स्वीकार करना दो बिल्कुल अलग बातें हैं. एक अवयस्क विद्यार्थी इस कटु सच को स्वीकार कर तभी आगे बढ़ सकता है जब उन्हें समझाया जाये और उस अनावश्यक दबाव से मुक्त रखा जाए जो माता-पिता, कोचिंग और स्वयं असफलता उन पर बनाती है.
इन सबके बीच दुखद यह है कि प्रतिस्पर्धा और तथाकथित सफलता का यह भूत किसी के अन्तर्मन को जागने नहीं देता है और बाल अधिकारों का हनन लगातार होता रहता है. कोचिंग संस्थानों की कार्यशैली, बच्चों को एटीएम समझने की सोच और विज्ञापन संस्कृति बड़े सपनों का बोझ लादे आम परिवारों से आये इन बच्चों के मनोबल को तोड़ देती है. कोचिंग संस्थानों द्वारा लगातार मॉक टेस्ट लेना, कम स्कोर करने वाले विद्यार्थियों को डीग्रेड कर दूसरे बैचों में डालना, अच्छे अंक लाने वालों को विशेष बैच में स्थानांतरित करना भी प्रतियोगियों के लिये अवसाद का कारण बनता है. गौरतलब है कि आत्महत्या करने वाले कई छात्रों द्वारा ऐसा कदम मॉक टेस्ट के परिणाम आने के बाद ही उठाया गया. बेहतर न कर पाने का दुख, डीग्रेड हो जाने की चिंता, असहाय अकेला मन, अभिभावकों को परिणाम देने का दबाव आदि मिलकर अवसाद की एक ऐसी खाई खोदता है जिससे बाहर निकलने में कई बच्चे असमर्थ हो जाते हैं और वे वह रास्ता चुनते हैं जहाँ से लौटने का कोई मार्ग नहीं.
नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के आँकड़ों के अनुसार भारत मे औसतन प्रतिदिन 35 विद्यार्थी परीक्षा में असफल होने पर आत्महत्या का मार्ग चुनते हैं. कोटा में लगभग हर माह तीन बच्चे अपना जीवन समाप्त कर लेते हैं. आत्महत्या की इस प्रवृत्ति को नियंत्रित करने के लिए प्रशासन द्वारा अनेक प्रयास किये जा रहे है. कई तरह के उपकरणों द्वारा इन बच्चों पर नज़र रखने, कमरों में अलार्म लगवाने आदि आदि जैसी व्यवस्थाएं एक फौरी उपाय हो सकती हैं लेकिन समस्या का समाधान नहीं. इन कोचिंग संस्थानों की कार्यशैली पर नज़र रखने के साथ इन्हें नियम कायदों में बाँधना आवश्यक है. सरकार को भी प्रतियोगी छात्रों पर दबाव कम करने हेतु केंद्रीकृत व्यवस्था के अतिरिक्त राज्य स्तरीय प्रतियोगी परीक्षाओं का भी विकल्प खुला रखना चाहिए.
अभिभावकों और प्रतियोगियों को यह समझना होगा कि इंजीनियर या डॉक्टर न बन पाने का मतलब जीवन में संभावनाओं का अंत नहीं है. सफलता किसी एक व्यवसाय से बंधी नहीं हैं. अपने बच्चे के नाज़ुक परों पर उम्मीदों का ऐसा बोझ न लादें कि उसका जीवन से ही मोह भंग हो जाये. उड़ने दीजिये उन्हें उन्मुक्त आकाश में, वे निश्चित ही अच्छा करेंगे.













