शुक्रवार, 3 मार्च 2023

खालिस्तानी भूत की वापसी??

नब्बे का दशक पंजाब के लिए खूनी रहा है. यह समय खालिस्तानी आन्दोलन और आंतकवाद के चरम का रहा है. अलग सिख राज्य की माँग ब्रिटिश साम्राज्य के पतन के साथ आरंभ हुई. सन 1940 में पहली बार ‘खालिस्तान’ शब्द का प्रयोग किया गया. धर्म के आधार पर भारत विभाजन और पाकिस्तान निर्माण ने ऐसी सोच को जिंदा रखा जो सम्प्रदायवाद के आधार पर भारत विभाजन का समर्थन करती थी. सिख अलगाववादियों द्वारा पंजाब, चंडीगढ़, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के कुछ इलाकों को मिलाकर एक क्षेत्रीय दावा प्रस्तुत किया गया, जिसकी राजधानी लाहौर को माना गया. ये सभी इलाके कभी महाराजा रणजीत सिंह के राज्य के भाग हुआ करते थे, जिसकी राजधानी लाहौर हुआ करती थी.


पाकिस्तान ने अपनी उत्पत्ति के साथ ही भारत को अस्थिर करने के प्रयास शुरू कर दिए. जब 1971 के भारत-पाक युद्ध में अपनी शर्मनाक पराजय और बांग्लादेश निर्माण से बौखलाए पाकिस्तान ने अपनी नीति को भारत-विभाजन पर केन्द्रित कर दिया. इसमें उसकी ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई बराबर सक्रिय रही. भारत-विरोधी नीति को धार देने हेतु इस्लामिक जगत से आर्थिक सहयोग भी लिया गया. विदेशी भूमि पर तमाम अलगाववादियों को एकजुट करने के प्रयास किये गये, आतंकी दस्ते बनाये गये, उन्हें प्रशिक्षित कर हथियार उपलब्ध करवाए गये. इसके बाद के लम्बे रक्तरंजित संघर्ष ने न सिर्फ पंजाब को बल्कि पूरे भारत को गहरे ज़ख़्म दिए.




भिंडरावाला का उदय पंजाब में आतंकवाद को उसके चरम पर ले गया. भारत सरकार ने इस स्थिति पर नियंत्रण पाने हेतु 1 जून 1984 से ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ आरंभ किया. ऑपरेशन तो सफल रहा, स्वर्ण मंदिर परिसर को आतंकियों से मुक्त करवा लिया गया, भिंडरावाला मारा गया लेकिन सिख समाज में इसकी तीव्र विरोधी प्रक्रिया हुई. कालांतर में ऑपरेशन ब्लू स्टार का बदला लेने के उद्देश्य से प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गाँधी की हत्या उनके ही सिख अंगरक्षक बेयंत सिंह और सतवंत सिंह द्वारा कर दी गई. 1990 आते-आते पंजाब की जनता का खालिस्तानी आन्दोलन से मोहभंग हो चुका था. वे इस रक्तरंजित दौर से मुक्ति चाहते थे. सेना आतंकवादियों का दमन कर रही थी. परिणामस्वरूप 1995 तक खालिस्तान के जिन्न को बोतल में बंद कर दिया गया.


पंजाब में आतंकवाद का सफाया पाकिस्तानी ख़ुफ़िया एजेंसी आईएसआई की असफलता थी. अब उसने अपनी आतंकी नीति को कश्मीर पर केन्द्रित कर जम्मू-कश्मीर में विभाजन के नाम पर आतंक फैलाना शुरू कर दिया. जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद की पाकरचित कहानी उस समय एक अजीब मोड़ पर आ गई जब अगस्त 2019 में जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम के द्वारा अनुच्छेद 370 को हटा दिया गया. राज्य का विभाजन जम्मू-कश्मीर और लद्दाख के रूप में कर दिया गया. यह पाकिस्तान के लिये बड़ा झटका था जिसने पाकिस्तानी रणनीति के भूराजनीतिक समीकरणों को पलट कर रख दिया. कश्मीर की स्थिति पूरी तरह से बदलने को भारत सरकार प्रतिबद्ध है. बड़ी संख्या में सैन्य बलों की उपस्थिति ने घाटी में उपद्रवियों और अलगाववादियों पर नकेल कस रखी है. पाकिस्तानपरस्त राजनीतिज्ञों की राजनीतिक भूमि दरक चुकी है. इसके चलते पाकिस्तान में पल रहे आतंकी समूहों और इस्लामी जगत के नेतृत्व की चाह ने पंजाब को अपनी भारत-विरोधी नीति की प्रयोगशाला बनाने को उद्यत किया. परिणामस्वरूप खालिस्तान का जिन्न फिर से जिंदा किया गया.   


सीएए, किसान आन्दोलन आदि के नाम पर जिस प्रकार लम्बे और हिंसक संघर्ष देखने को मिले वो सीधे-सीधे इशारा करते हैं कि बदली हुई परिस्थितियों में हमारे शत्रुओं ने भी अपनी रणनीति में परिवर्तन किया है. इस परिवर्तन की प्रयोगभूमि एक बार फिर पंजाब है. मादक द्रव्यों की उपलब्धता, अवैध हथियारों की तस्करी का संजाल पंजाब में बिछाया जा चुका है. पचास से अधिक गिरोह खालिस्तानी आतंकियों के साथ मिल कर काम कर रहे हैं. बब्बर खालसा इंटरनेशनल, इंटरनेशनल सिख यूथ फेडरेशन, खालिस्तान कमांडो फोर्स जैसे आंतकी समूह पाकिस्तान की मदद से पुनः सक्रिय हैं. वर्ल्ड सिख आर्गेनाइजेशन, सिख फॉर जस्टिस नामक संगठन अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैण्ड आदि से धन एकत्र कर भारत में आग लगाने का कार्य कर रहे हैं. एनआईए की एक जाँच टीम ने खुलासा किया कि किसान आन्दोलन के नाम पर भारत को हिंसा में झोंकने की साजिश रची गई और इसके लिए कनाडा से एक लाख अमरीकी डॉलर भारत भेजे गये थे.


पंजाब में कई स्थानों से सुरक्षा बलों द्वारा आरडीएक्स, स्वचालित हथियार, ड्रोन आदि पकडे गये. इसी वर्ष 23 फ़रवरी को ‘वारिस पंजाब दे’ नामक कट्टरपंथी संगठन के प्रमुख अमृतपाल सिंह और उसके समर्थकों द्वारा अजनाला थाने पर जिस प्रकार हमला बोलकर वांछित अपराधी लवलीत उर्फ़ तूफान सिंह को रिहा करने को मजबूर किया गया, वह बेहद चिंताजनक है. अमृतपाल सिंह खुलेआम भारत को तोड़ने और हिंसा की धमकियाँ दे रहा है. वह स्वयं को भिंडरावाला का का वारिस साबित कर पंजाब को उसी आग में झोंकना चाहता है जिसमें कभी पंजाब झुलस रहा था.


पंजाब की राजनीति से कैप्टेन अमरिंदर सिंह की विदाई भी एक अशुभ संकेत ही है. वे राष्ट्रीय सुरक्षा के मुद्दों को व्यक्तिगत राजनैतिक हितों से ऊपर रखने वाले, केंद्र के साथ समन्वय बनाकर काम करने वाले राजनेता थे. उनके उत्तराधिकारी के रूप में भगवंत मान ऐसा कर पाएंगे, इसमें संदेह है. जिस आम आदमी पार्टी की सरकार इस समय पंजाब में है, उस पर खालिस्तानियों से चंदा लेने और सहानुभूति रखने के आरोप लगते रहे हैं. ऐसे में प्रतीत होता है कि पंजाब की परिस्थितियाँ ऐसी बन गई हैं या बनाई जा रही हैं जहाँ विदेशी सहायता के बल पर खालिस्तान के जिन्न को बोतल से बाहर निकाला जा सके. किरदार नये होंगे पर पटकथा वही पुरानी होगी. राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से पंजाब की स्थिति बुरे संकेत दे रही है. केन्द्र सरकार को बिना समय गँवाए स्थिति के अनुरूप प्रभावशाली कदम उठाने की आवश्यकता है. बेहतर होगा कि सरकार प्रतिरक्षात्मक होने के स्थान पर आक्रामक नीति अपनाए.