बिहार में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा एक मुस्लिम महिला का नकाब हटाने का मामला
विवाद का विषय बना हुआ है. एक सरकारी समारोह में नियुक्ति पत्र वितरण के समय चिकित्सक
नुसरत को नियुक्ति पत्र देते समय उसकी पहचान की जानकारी करने के लिए खुद नीतीश कुमार
द्वारा उस महिला का नकाब खींचने को सामाजिकता की दृष्टि से सही नहीं कहा जा सकता
है. ये बात सही है कि नीतीश कुमार जैसे संजीदा, उम्रदराज, अनुभवी राजनेता द्वारा किसी महिला का
बुर्का खींचने का उद्देश्य उस महिला को अपमानित करना अथवा किसी धार्मिक संकुचित
दृष्टिकोण को अपनाया जाना नहीं होगा, न ही उनकी मानसिकता उस मुस्लिम महिला को बेपरदा करने की रही होगी. उनके कृत्य के समर्थन
में कुछ लोगों का यह कहना कि नियुक्ति पत्र प्रदान किये जाते समय पहचान करना इसलिए
आवश्यक था कि कहीं कोई गलत व्यक्ति नियुक्ति पत्र प्राप्त न कर ले, एकबारगी भले ही
सही प्रतीत होता हो मगर इस कारण भी किसी महिला का बुर्का हटाने को सही तो नहीं कहा
जा सकता है. यदि सुरक्षा एवं पहचान की जानकारी आवश्यक थी तो ये प्रोटोकॉल उस महिला
के मंच पर आने से पहले ही निपटा लिए जाने चाहिए थे. पहचान की अनिवार्यता को बनाये
रखने के लिए नियुक्ति पत्र वितरण के पूर्व ही समस्त औपचारिकताओं की पूर्ति कर लेनी
चाहिए थी.
ऐसा आवश्यक कदम पहले न उठाने के कारण अब नीतीश कुमार द्वारा एक महिला का हिज़ाब
खींचे जाने की घटना राजनीतिक बयानबाजी और मीडिया के लिए एक प्रमुख घटना बनी हुई है.
इस कृत्य के समर्थन और विरोध में राष्ट्रीय, अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर कई तरह की प्रतिक्रियायें सामने आ रहीं
हैं, जिनमें से कुछ बेहद असभ्य और अशालीन भी हैं. एक महिला
होने के नाते मैं स्वयं भी किसी भी रूप में पर्दे को उचित नहीं मानती हूँ, वह चाहे घूँघट के रूप में हो अथवा हिजाब के रूप में. मेरा व्यक्तिगत रूप
से ऐसा मानना रहा है कि महिलाओं के सामाजिक, आर्थिक, शैक्षिक
विकास की राह का सबसे बड़ा अवरोध पर्दा ही है. इस पर्दा प्रथा ने महिलाओं को एक
इन्सान से इतर मात्र लैंगिक पहचान ही प्रदान की है. इसी लैंगिक पहचान को
सर्वोच्चता, अनिवार्यता जैसी अवधारणा में लपेट कर महिलाओं को
यौन संतुष्टि का एक साधन बनाकर निरन्तर उनका शोषण किया गया है. ऐसी विडम्बना, ऐसी विसंगति होने के बाद भी नीतीश कुमार ने जो आचरण किया उसे सही नहीं कहा
जा सकता है. यह कृत्य तो कुछ वैसे ही हुआ कि किसी की पोशाक पसंद न आये तो उसे जबरन
सभा मे उतरवाने लगें.
सामाजिक दृष्टिकोण से, आधुनिकता के सन्दर्भों में हिज़ाब भले ही मजहबी गुलामी का प्रतीक बना हो; किसी महिला की धार्मिक, सामाजिक, पारिवारिक मजबूरी, विवशता का प्रतिबिम्ब
बना हो फिर भी उसे जबरन घसीट कर उतारने की कोशिश उचित नहीं कही जा सकती. ऐसा उस
समय और भी अशोभनीय और निन्दनीय हो जाता है जबकि ऐसा करने वाला व्यक्ति किसी प्रदेश
का मुख्यमंत्री हो. इतने उच्च पदस्थ राजनेता को महिला की अस्मिता का ध्यान रखा
जाना चाहिए था. नीतीश कुमार अपने इस कृत्य से भले ही उस महिला की, नियुक्ति पत्र वाले व्यक्ति की
पहचान पाना चाह रहे हों, महिलाओं को हिजाब से मुक्त होने का
सन्देश देना चाह रहे हों मगर यहाँ एक बात ध्यान रखने योग्य ये है कि स्त्री हो या
पुरुष, सभी को गुलामी की बेड़ियाँ स्वयं ही काटनी होती हैं.
समाज द्वारा, संगठन द्वारा, किसी
नेतृत्व के द्वारा ऐसा अवसर और वातावरण बनाने की आवश्यक्ता होती है जहाँ सामाजिक सुधार
स्वयं पीड़ितों के ह्रदय में जगह बना लें. जबरन किसी भी तरह के सामाजिक सुधार नहीं किये
जा सकते हैं. यदि ऐसा किया जाना सम्भव होता तो देश में पुनर्जागरण कार्यक्रम न
चलाये गए होते, लोगों को जागरूक करने वाले अभियान न चलाये जा
रहे होते, किसी तरह की जागरूकता की कोई आवश्यकता ही नहीं होती.
सामाजिक दृष्टिकोण से मुस्लिम समाज किसी अन्य समाज की तुलना में अधिक पिछड़ा,
संकुचित और दकियानूसी है. इसी कारण इनके बीच सामाजिक सुधारों, बदलावों की प्रक्रिया
अधिक कठिन और सुस्त है. परिवर्तन की इस सुस्त प्रक्रिया को एक तरह की निरन्तरता की
आवश्यकता है, जिससे धीमा ही सही किन्तु बदलाव होता रहे. वैसे भी माना जाता है कि महिलाओं
में बदलाव की प्रगति दो पीढ़ियों के बाद दिखती है. वर्तमान विकसित महिला समाज विकास
की मंजिल तक अपनी दादी-नानी और माँ द्वारा बनाई गई राह से गुजरते हुए पहुँचा है. मुस्लिम
समाज की महिलाएँ भी अपनी बेड़ियाँ तोड़ देंगी; वे भी आज़ादी की हवा में खुलकर साँस लेंगी;
वे भी हिजाब से बाहर आकर अपना विकास करेंगी, जरा उनके हाथ और जेब मजबूत तो होने दीजिए.
संभवतः ये ऐसी पीढ़ी है जो भले ही मजबूरी में हिज़ाब को अपनाए है मगर डॉक्टर और इंजीनियर
भी बन रही है. इनकी भावी पीढ़ी की बेटियों और उनकी बेटियों के आने तक यही बदलाव
व्यापक रूप में दिखेगा, बस यहाँ शेष समाज को थोड़ा धैर्य रखने की आवश्यकता है.
ध्यान रखना होगा कि हिजाब की, पर्दे की कैद से मुक्ति के लिए अपनाया गया आपका अशालीन,
उतावला व्यवहार कहीं उन बेटियों को वापस
घरों में कैद न कर दे, जिन्हें कम से कम पढ़ने का मौका तो मिला है.
