अंततः अपने अड़ियल
रुख पर बने रहते हुए अमरीकी राष्ट्रपति ने भारत पर बढ़े हुए शुल्क से सम्बंधित आदेश
पर हस्ताक्षर कर दिए. इससे एक अगस्त से बढ़े हुये टैरिफ की दर दंडात्मक टैरिफ को मिलाकर
पचास प्रतिशत की उच्च दर तक पहुँच गई. इसका प्रभाव भारतीय अर्थव्यवस्था पर पड़ना तय
है, देखना ये है कि भारतीय अर्थव्यवस्था को यह प्रभाव किस प्रकार पड़ेगा? यह भी एक नवीन अनुभव होगा कि क्या
ऐसी स्थिति में भारत नया मार्ग बनाने में सफल होगा? अमरीका के इस तानाशाही रवैये का
जैसा प्रभाव खुद डोनाल्ड ट्रम्प ने सोचा था, वैसा दिख नहीं रहा. यद्यपि भारत की
तरफ से कूटनीतिक प्रयास पूरी क्षमता के साथ किये जा रहे हैं तथापि अत्यन्त संयम के
साथ सधी हुई प्रतिक्रिया दी जा रही है.
अमरीका द्वारा भारतीय
अर्थव्यवस्था को मरी हुई अर्थव्यवस्था कह कर डोनाल्ड ट्रम्प ने भारत के उन
तत्त्वों को उकसाने का प्रयास किया जो भारतीय राजनीति में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी
और सरकार को असहज स्थितियों में ला सकें. यदि ऐसा होता तो सरकार पर अमरीकी शर्तों पर
समझौता करने का दबाव पड़ता. अमेरिकी राष्ट्रपति की दबाव की यह रणनीति काम नहीं आ सकी.
भारत सरकार ने दो टूक कह दिया कि वह किसानों और दुग्ध उत्पादकों के हितों की कीमत
पर कोई समझौता नहीं करेगी. भारत और अमरीका के मध्य सम्भावित ट्रेड डील न होने का कारण
अमरीकी कम्पनियों को कृषि और डेयरी उद्योग में आने की अनुमति न देना रहा है. ये और
बात है कि इस डील के पूरा न होने का कारण अमरीका ने भारत द्वारा रूस से पेट्रोलियम
आयात करना बताया है. गौरतलब है कि रूस-यूक्रेन युद्ध तीन वर्षों से चल रहा है और भारत
निरंतर ही रूस से सस्ती दरों पर पेट्रोल आयात कर रहा है, जिसके परिणाम स्वरूप लगभग
दस बिलियन डॉलर की बचत हो रही है. यहाँ दृष्टव्य है कि रूस के साथ न सिर्फ भारत ने
बल्कि चीन ने भी व्यापार जारी रखे हैं. यहाँ विशेष तथ्य यह है कि स्वयं अमरीका भी रूस
से व्यापार कर रहा है. ऐसे में रूस-यूक्रेन युद्ध का हवाला देकर भारत पर शुल्क
और दंडात्मक शुल्क आरोपित करने की बाते सही नहीं है. वास्तविक सत्य पर सामान्य रूप
में किसी का ध्यान नहीं जा रहा है.
वास्तविकता यह है कि
अमरीका सदा से ही वैश्विक राजनीति को अपने नियंत्रण में रखने का प्रयास करता रहा है.
यही कारण है कि कोई भी वैश्विक संस्था चाहे वह सयुंक्त राष्ट्र संघ हो, विश्व बैंक हो, विश्व व्यापार संघटन, मानवाधिकार संस्थाएँ हों, वे सभी अमरीकी हितों को ही आगे बढाने
के लिए डिज़ाइन की गईं हैं. इस बीच भूराजनीतिक स्थितियाँ कुछ इस प्रकार परिवर्तित हो
रही हैं कि रूस पुनः अपनी शक्ति प्राप्त कर रहा है. अनेक कोशिशों के बाद भी अमरीका और यूरोप
द्वारा रूस को पराजित नहीं किया जा सका जबकि यूक्रेन के पचास प्रतिशत भाग पर रूस कब्जा
कर चुका है. ऐसी स्थिति में सम्भावना है कि शीघ्र ही रूस की शर्तों पर युद्ध रुकेगा.
रूस की विजेता जैसी स्थिति से अमरीका को मुँह छिपाने की जगह नहीं मिल रही है. वैश्विक
स्तर पर अपनी इसी खीझ को छिपाने, दूर करने के लिए डोनाल्ड ट्रम्प जबरन ही वैश्विक नेता बनने की कोशिश कर रहे
हैं. इसी में ही वे भारत-पाकिस्तान संघर्ष के दौरान सीजफायर को लेकर लगातार दावे करते
नज़र आये. भारत द्वारा उनकी मध्यस्थता की बात को सिरे से नकारने से खीझकर पाकिस्तानी
जनरल मुनीर को व्हाइटहाउस का मेहमान बना कर ट्रम्प ने भारत को नीचा दिखाने की कोशिश
की.
इनके सापेक्ष यदि अमरीका-भारत
व्यापार की बात की जाए तो यह लगभग 118 अरब डॉलर के आसपास है, जिसमें
व्यापार संतुलन भारत के पक्ष में है. भारत का कुल निर्यात समग्र घरेलू उत्पाद का मात्र
दो प्रतिशत ही है, जिसका मूल्य लगभग 37.59 लाख करोड़ रुपए के आसपास है. यदि भारत पर अमरीका द्वारा उच्च प्रशुल्क में कोई
कमी नहीं की जाती तो इस घाटे के दूसरे विकल्प तलाश कर इस समस्या से निपटा जा सकता है.
भारत द्वारा अमरीका को मुख्य रूप से विद्युत उपकरण, रत्न, जवाहरात, हस्तशिल्प और फार्मा
से सम्बंधित वस्तुओं का निर्यात किया जाता है, जिनके वैकल्पिक बाज़ार यूरोप, अफ्रीका और चीन में तैयार किये जा सकते हैं.
चूँकि भारतीय अर्थव्यवस्था निर्यात आधारित नहीं है, इस कारण अमरीका से उत्पन्न निर्यात
अवरोध को सहजता से सहन किया जा सकता है. अमरीकी उच्श्रृंखलता और व्यापार ब्लैकमेल को
भारत में कार्यरत उन अमरीकी कम्पनियों से पूरा किया जा सकता है जो भारत मे खरबों का
मुनाफा कमा रही हैं. ये कम्पनियाँ दो प्रतिशत का नाममात्र का शुल्क दे रहीं, कुछ
कम्पनियाँ जो ऑनलाइन प्लेटफॉर्म का उपयोग कर रहीं मगर कोई भी शुल्क नहीं दे रहीं, ऐसी कम्पनियों पर पर चार प्रतिशत का
टैक्स लगा कर घाटा पूरा किया जा सकता है. इससे घाटे की स्थिति से उबने के साथ-साथ भारत
की अर्थव्यवस्था को मृत कहने वालों को सबक भी सिखाया जा सकता है.
इसके अलावा ट्रम्प
की निगाहों में ब्रिक्स की मजबूती भी खटक रही है. यदि ब्रिक्स देश विनिमय हेतु सामूहिक
मुद्रा पर सहमत हो गए तो डॉलर की वर्तमान वर्चस्वता खतरे में आ जायेगी. रूस,
चीन और भारत का व्यापारिक सहयोग अमरीका
के लिए संकट की स्थिति उत्पन्न कर देगा. इस कारण वह इस त्रिकोण के तीनों कोणों भारत,
चीन, रूस को अलग-अलग तरीके से कमज़ोर करने की कोशिश कर रहा
है. अतः भारत को अमरीका के समक्ष झुकने के बजाय ब्रिक्स देशों के साथ मजबूत सहयोग का
आधार तैयार करना चाहिये. अमरीका बड़ी अर्थव्यवस्था अवश्य है पर यह नहीं भूलना चाहिए
चीन और भारत दुनिया के दो सबसे बड़े बाज़ार हैं. यदि ब्रिक्स ताकतवर होगा तो भारत-चीन
के मध्य का व्यापार स्वयं ही अमरीकी व्यापार की आवश्यकता को कम कर देगा.
आपत्तिकाल में धैर्य
और साहस से उठाए गए कदम भविष्य की दिशा तय करते हैं. भारत को निश्चित रूप से अमरीका
से ट्रेड डील का प्रयास करना चाहिए किन्तु अपनी शर्तों पर. हमारी अर्थव्यवस्था को मृत घोषित करने वालों
के समक्ष झुकने की आवश्यकता नहीं है. एशिया में नए सहयोग के द्वारा भारत अपने भूराजनीतिक
और व्यापारिक हितों को एकसाथ साध सकता है. यदि भारत, चीन और रूस निकट आये तो पाकिस्तान और अमरीका दोनों को
ही काउंटर बैलेंस किया जा सकता है. यदि सोच समझ कर आगे बढ़ा जाए तो डोनाल्ड ट्रम्प की
सनक अमरीका को ही नुकसान पहुँचा सकती है भारत को नहीं, यह निश्चित है.
