शनिवार, 28 फ़रवरी 2026

ईरान पर हमला

 पश्चिम एशिया में युद्ध की औपचारिक शुरुआत हो चुकी है। जैसा कि अंदाज था कि अमरीका एक तरफ तो वार्ता करेगा और दूसरी तरफ अचानक हमला करेगा। यद्यपि यह हमला फिलहाल इज़राइल द्वारा किया गया लेकिन यह अमरीकी रणनीति है इसे कोई भी समझ सकता है। रूस, चीन, ईरान की इस तिकड़ी के विरुद्ध अमरीका अपनी शक्ति के नग्न प्रदर्शन पर उतारू है। अमरीका यह सोच रहा कि शायद ईरान के विरुद्ध सीधी कार्यवाही पुतिन पर कुछ दबाव बना सके,जो शायद इतना सरल नहीं है। बल्कि पुतिन यह चाहेंगे कि ईरान पूरी ताकत से कुछ समय के लिए अमरीका को परेशान कर ले और अमरीकी मदद से यूक्रेन को वंचित किया जा सके। खैर ईरान ने एक असमान क्षमताओं वाले युद्ध में कदम रख दिया है,ईरान भी जानता है कि बहुत समय तक वो खड़ा नहीं रह सकेगा, इस कारण एक बेहद सोची समझी रणनीति के तहत वह खाड़ी में अमरीकी ठिकानों,संपत्तियों और मित्रों को निशाना बना रहा है। ईरान की इस नीति से खाड़ी में हाहाकार मचा हुआ है। यद्यपि अमरीका महत्वपूर्ण ठिकानों को खाली कर चुका है लेकिन फिर भी अमरीकी कंपनियों, और मित्र देशों की संपत्तियां तो मौजूद है हैं।

ईरान की दिलेरी और मिसाइल क्षमता अमरीका के मददगार खाड़ी देशों के लिए खतरनाक सिद्ध हो सकती है। कई बार ऐसा भी लगता है कि क्या अमरीका इस्राइल के माध्यम से अरब जगत को तबाह करने की रणनीति पर चल रहा है। इज़राइल पर हमास के आतंकियों द्वारा जो हमला किया गया था उसके लिए इस्राइल ने जो युद्ध छेड़ा था वो भी अंतहीन होता जा रहा है। क्या अमरीका इज़राइल को भी एक लंबे अंतहीन युद्ध मे उलझाये रखना चाहता है,ठीक वैसे ही जैसे यूक्रेन को अपनी आधी अधूरी मदद से न जीने लायक छोड़ा है और न ही मरने दे रहा।

एक वर्ग ऐसा भी है जिसे लगता है कि अमरीका और यूरोपीय देश ईरान की वर्तमान सत्ता को महिलाओं और मानवाधिकारों की रक्षा के उखाड़ना चाहते हैं, इसमें लेशमात्र भी सच्चाई नहीं है। ईरान की बढ़ती शक्ति,परमाणु एवं प्रक्षेपास्त्र कार्यक्रम न सिर्फ पश्चिम एशिया बल्कि अरब जगत में ही शक्ति संतुलन को पलट सकते हैं इस कारण ईरान निशाने पर है। ईरान का पतन अमरीकी अहंकार और दादागिरी को शक्ति प्रदान करने वाली होगी। प्रत्येक वो देश जो अपनी संप्रभुता को गिरवी नहीं रखेगा अमरीका के निशाने पर आ जायेगा। ईरान ने तत्काल सुरक्षा परिषद की मीटिंग बुलाई है पर एक मरी हुई संस्था की मरी हुई सभा से क्या हासिल होगा?

ईरान का पलटवार उसके हौसले का प्रतीक है लेकिन युद्ध जीतने के लिए हौसलों के अलावा भी बहुत कुछ चाहिए होता है...


इति

28.02.26

शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2026

दिल्ली शराब नीति केस पर अदालत का फैसला

 आज दिल्ली शराब नीति के मामले में अदालत का फैसला आया जिसमे दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया को अदालत ने दोषी न मानते हुए बरी कर दिया। अदालत का फैसला अवश्य ही ठोस सबूतों के आधार पर ही लिया गया होगा इसमें कोई शक नहीं है। सी.बी.आई और तमाम जांच एजेंसियां अपने ही केस को अदालत में सिद्ध नहीं कर सकी और फैसला अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया के पक्ष में आया। इस पूरे घटनाक्रम ने यह सोचने को विवश कर दिया है कि क्या वास्तव में ये पूरा मामला राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी को समाप्त करने के लिए षड्यंत्र पूर्वक रचा गया और ये सारे आरोप सही हैं कि सरकार द्वारा जांच एजेंसियों को गलत तरीके से फंसाने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है? आरोप प्रत्यारोप के दौर में सत्य कहीं दब के रह जायेगा, राजनीति व्यवस्था को नियमानुसार चलाने का एक साधन  मात्र है। लोकतंत्र में सत्ता में बैठने वाली सरकार यदि सत्त्ता का प्रयोग विपक्ष को समाप्त कर एक पार्टी की तानाशाही का मार्ग बनाने में लिप्त हो जाये तो इसे लोकतांत्रिक व्यवस्था के अंत का प्रतीक मान लोगो को जागरूक और सतर्क हो जाना चाहिए। पूरा देश देख रहा है कि किस प्रकार सत्ता से मतभेद रखने वाली आवाजों, संस्थाओं और दलों को जायज,नाजायज तरीकों से कुचलने के कोशिश बदस्तूर जारी है। किसी भी सरकार को यह नहीं भूलना चाहिए कि अनैतिकता की परकाष्ठा पर भी पहुंच कर वो सत्ता पर सदा सर्वदा काबिज़ नहीं रह सकते। कितनी आवाजें दबाई जाएंगी,कितने लोगों को जेलों में ठूंस कर कानूनी अधिकारों से वंचित कर सत्ता सुरक्षित की जाएगी? केजरीवाल की राह अभी भी आसान नहीं है क्योंकि उन्हें सत्ता के अंधे दम्भ से भी लड़ना है...फिलहाल अदालत को धन्यवाद करना चाहिए कि उन्होंने अपने फैसले से लोगों के सोचने के लिए एक महत्वपूर्ण प्रश्न उछाल दिया है।


27.02.26

सोमवार, 9 फ़रवरी 2026

राष्ट्रपति का अभिभाषण

 पिछले दिनों माननीय स्पीकर ओम प्रकाश बिड़ला जी ने प्रधानमंत्री के सदन में उपस्थित न होने के लिए जो तर्क दिया उसने न सिर्फ प्रधानमंत्री को आलोचनाओं के लिए प्रस्तुत कर दिया बल्कि यह कहने में कोई संकोच नहीं कि स्पीकर के पद की  मर्यादा को भी खंडित कर दिया। प्रधानमंत्री को सदन में ऐसा कौन सा खतरा हो सकता था कि ऐसी हल्की बात स्पीकर के माध्यम से सामने आए। विपक्ष के विरोध और प्रश्नों का जवाब आज तक सभी प्रधानमंत्री देते आये हैं, स्वयं मोदी जी भी इस पक्ष विपक्ष की रस्साकसी को बखूबी सम्भालते आये हैं। लेकिन आज ऐसा क्या हो गया कि प्रधानमंत्री को उस प्रकार असहजता का सामना करना पड़ रहा है। स्पीकर पूरे सदन का होता है उसके कार्य व्यवहार से सदन में यदि उसकी पार्टी निष्ठा या पार्टी की आंतरिक रणनीति झलक जाए तो इसे लोकतंत्र के लिए शुभ नहीं माना जाता। आज तक सदन ने बहुत सख्त,अनुशासित,अलग अलग राजनीतिक विचारधाराओं के प्रतिनिधित्व करने वाले स्पीकर देखे, किंतु सदन के कार्य व्यवहार में उनकी निष्पक्ष छवि पर उंगली नहीं उठाई जा सकी। यह अत्यंत दुखद है कि प्रधानमंत्री जी अभिभाषण पर जवाब देने नहीं आये और उससे भी दुःखद यह कि स्पीकर अपने पद की मर्यादा राजनीतिक निष्ठा प्रदर्शन के चक्कर सम्भाल नहीं सके।

09.02.26

मंगलवार, 3 फ़रवरी 2026

भारत अमरीका टैरिफ डील

राजनीति में न मित्र स्थायी होता है और न शत्रु, ये अवधारणा व्यक्तिगत स्तर पर, दलगत स्तर पर जितनी प्रभावी है, उतनी की वैश्विक स्तर पर प्रभावी समझ आती है. दो राष्ट्रों के मध्य भी ऐसी अवधारणा को स्थान मिलता है. विगत कुछ समय से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प की कार्यप्रणाली के चलते अनेक देशों की अर्थव्यवस्था में हलचल मची हुई है. भारत भी अमेरिकी राष्ट्रपति द्वारा छेड़े गए टैरिफ वॉर से अछूता नहीं रहा है. आर्थिक स्तर पर अनेक क्षेत्रों में अमेरिका के द्वारा बढ़ाये गए टैरिफ का सामना भारतीय बाज़ार द्वारा भी किया गया. टैरिफ को लेकर चल रही स्थितियों के बीच कुछ सुखद पल सामने आए हैं.

 

आखिरकार भूराजनीतिक आवश्यकताएँ अथवा विवशताएँ भारत और अमरीका की टैरिफ डील करवाने में सफल हो गईं हैं. आज दुनिया का कोई भी देश अपनी अर्थव्यवस्था को जोखिम में डाल कर बहुत दिनों तक द्विपक्षीय सम्बंधों को कायम नहीं रख सकता चाहे वह अमरीका जैसी बड़ी शक्ति हो या भारत जैसी कोई क्षेत्रीय शक्ति. ट्रंप सरकार द्वारा भारत पर विभिन्न स्तर पर टैरिफ लगाया गया. उसके पीछे की अमेरिका द्वारा भारत पर दबाव बनाने की रणनीति अपनाने का प्रयास किया गया. ऐसा करने के पीछे अमेरिका की मंशा ये थी कि अमरीकी शर्तों पर भारत को झुकाया जा सके. भारत के विरुद्ध अमेरिका के टैरिफ़ वॉर के पीछे प्रमुख मुद्दा रूस से भारत द्वारा किया जाने वाला पेट्रोलियम आयात रहा है. रूस के साथ एनर्जी ट्रेड अमरीका भारत के संबधो में फिलहाल सबसे बड़ी बाधा बन कर उभरा था. भारत अपने ट्रेड हेतु अपनी स्वायत्तता के विकल्प को छोड़ने को तैयार नहीं हुआ. ऐसी स्थिति के चलते अमरीका ने भारत के विरुद्ध पाकिस्तान को खड़ा करने के प्रयास किये. इसका सबसे गहरा अनुभव ऑपरेशन सिंदूर और उसके बाद पाकिस्तान के साथ अमरीका द्वारा की जाने वाली डील्स में दिखता है.

 



पाकिस्तान को मदद देकर भारत को दबाव में लाने की उसकी रणनीति भी असफल हुई. ट्रंप की बेवजह बयानबाजी ने सरकार की स्थिति को कई बार असहज किया फिर भी भारतीय कूटनीति चुपचाप अपना कार्य करती रही जिसकी प्रशंसा की जानी चाहिए. रूस के राष्ट्रपति का भारत आगमन,  रूस, चीन के साथ भारत की व्यापारिक गतिविधियों को बढाने का प्रयास ने जहाँ भारत के रुख़ को स्पष्ट किया, वहीं अमेरिका को भी असहज किया. इन कदमों ने भारत के कड़े तेवरों की तरफ़ की इशारा किया जिसे  सर्वाधिक महत्वपूर्ण यूरोपियन यूनियन के साथ हुए समझौते के रूप में देखा जा सकता है. मदर ऑफ़ डील्स के रूप में प्रसिद्ध यह समझौता अमरीका को यह बताने के लिए काफी था कि भारत ने अमरीका के समक्ष झुकने के बजाय नए बाज़ार ढूंढना शुरू कर दिया है.

 

देर से सही मगर ट्रम्प यह समझ गए कि अमरीका को भी इस भूराजनीतिक अस्थिरता के काल में भारत की उतनी ही ज़रूरत है जितनी भारत को अमरीका की. नाटो में दरार पड़ने,  अमरीका यूरोप के बिगड़ते संबध, ईरान के साथ जंग का उलझाव, अरब देशों में अमरीका के बिगड़ते रिश्ते, चीन और रूस की बढ़ती निकटता आदि के चलते इन सबको साधने के लिए उसे भारत की आवश्यक्ता है. चीन को साधने के लिए एशिया में भारत ही एकमात्र शक्ति है जिसकी सैनिक शक्ति और अर्थव्यवस्था की गहराई चीन के व्यापारिक आतंक का सामना कर सकती है. रूस से पेट्रोलियम आयात के स्थान पर नये विकल्प के रूप में वेनेज़ुएला को बताया जा रहा लेकिन यह कोई नया विकल्प नही है. भारत पहले भी वेनेज़ुएला से पेट्रोलियम आयात करता रहा है. जामनगर रिफाइनरी में इस आयातित तेल को परिशुद्ध किया जाता है. जामनगर रिफाइनरी तक वेनेजुएला का पेट्रोलियम पहुंचे यह तय करना अब अमरीकी मजबूरी है क्योंकि इसके परिशोधन की क्षमता बहुत कम रिफाइनरीयों में है जिनमे से एक जामनगर रिफाइनरी है. भारत के लिए भी यह आवश्यक है कि वह रूस से व्यापार एवं सहयोग करे. इस सहयोग के साथ भारत के लिए आवश्यक है कि वह रूस और चीन की बढ़ती नज़दीकियों से सतर्क रहते हुए उन्हें काउंटर बैलेंस करने के विकल्प भी जीवित बनाये रखे. आखिरकार हम रूस, चीन, पाकिस्तान की तिकड़ी बनना वहन नहीं कर सकते. यद्यपि अभी यह स्पष्ट नहीं है कि क्या भारत पूरी तरह से रूस से तेल का आयात बन्द कर देगा या इसमें धीरे धीरे कमी लाई जाएगी.

 

भारतीय सम्बन्धों का ताना-बाना किस तरह से आगे बढ़ेगा, यह अभी भविष्य के गर्भ में है किन्तु यह अनेक बार प्रमाणित हो चुका है कि भारतीय क्षमताओं को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता है. आज विश्व की बड़ी-छोटी अर्थव्यवस्थाओं को भारत के साथ की आवश्यकता है. फिलहाल जो भी हो अमरीका के साथ संबंधों में आया सबसे बड़ा अवरोध सुलझा लिया गया है. ट्रम्प ने एशिया में सबसे कम टैरिफ (अठारह प्रतिशत) भारत को देकर तुलनात्मक रूप से बेहतर स्थिति बनाने का प्रयास किया है. ऐसी डील का आज के वातावरण में स्वागत किया जाना चाहिए. उम्मीद है भारतीय अर्थव्यवस्था दबावमुक्त हो बेहतर प्रदर्शन कर सकेगी.

सोमवार, 2 फ़रवरी 2026

केंद्रीय बजट 2025-2026

 निराशाजनक बजट

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 रविवार को वित्तमंत्री श्रीमती निर्मला सीतारमण ने 53.5 लाख करोड़ का बजट प्रस्तुत किया जो उनका नौवां बजट था। इस बजट के आने से पहले यह आशा थी कि बजट टैरिफ और सप्लाई चेन में आये वैश्विक दबावों से अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए कुछ ठोस उपाय लेकर आएगा। कम से कम टैक्स, जी.एस.टी. सुधार, वित्तीय तरलता और महगांई पर नियंत्रण के कुछ ठोस प्रयास किये जायेंगे। किंतु बजट में ऐसा कुछ भी नहीं था, मंहगाई की मार से दबे हुए टैक्स पेयर को रिटर्न भरने के डेट 31 मार्च किये जाने से क्या लाभ होने वाला है ये शायद मंत्री जी के अलावा किसी के भी समझ मे नहीं आया होगा। शहरी विकास पर केंद्रित यह बजट सिर्फ बातों का ही दस्तावेज लग रहा,पहले से ही भारतीय शहर तथाकथित विकास की मार झेल के खुदे और धूल में भरे किसी तरह हांफ हांफ कर जी रहे हैं अब ये बजट उनकी दशा क्या करेगा ये देखना होगा। जो परियोजनाएं असफल हों गई उन्हें फिर से सुपर योजनाओं की तरह रिलॉन्च कर दिया गया पर्यटन के नाम पर। जैसे कि वाटर टैक्सी और टूरिज्म पैकेज पर टैक्स घटा कर दो प्रतिशत कर देना।

भारतीय कृषि को इस बजट द्वारा अमृत सरोवर में डूबने के लिए छोड़ दिया गया है। मेडिकल क्षेत्र में प्राइवेट पार्टनरशिप के साथ कायाकल्प करने की बातें तो की गईं है पर यह नहीं बताया गया कि जो मेडिकल क्षेत्र मर रहा है,जो सरकारी अस्पताल आम आदमी का सहारा हैं उनके दशा सुधारने के लिए क्या उपाय हैं?  निजी क्षेत्र में आंशिक सरकारी नियंत्रण वाले अस्पताल बन भी गए तो क्या आम आदमी उन सुविधाओं का लाभ ले सकेगा ? उच्च शिक्षा के लिए भी एक बड़ा सपना दिखा दिया गया है कि 5 नए शिक्षा हब बनेंगे जो अंतर्राष्ट्रीय स्तर की गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देंगे,ये कब और कैसे होगा यह स्पष्ट नहीं है और क्या ये वर्ल्ड क्लास सेंटर्स आमलोगों की पहुंच में होंगे?

बैंक,कृषि,उद्योग,शिक्षा,मेडिकल,मनोरंजन,सेवा,आदि क्षेत्रों के नाम तो बार बार आये लेकिन हाथ कुछ भी नहीं आया प्रतीत होता। एक दूर की लाइन खींच दी गई 2047,एक बड़ा सपना दिखा दिया गया विकसित भारत...

लेकिन ये कैसे पूरा होगा यह बजटीय प्रावधानों में कहीं दिखता नहीं। 

आलोचना करने वालों को भी 2047 तक रुकने की सलाह दी जा सकती है।आखिर ये बजट दूर की कौड़ी निकालने वाला जो है।

कुल मिला कर खोदा पहाड़ निकली चुहिया ही इस बजट के लिए उत्तम उक्ति है।


इति

02.02.26