बुधवार, 19 नवंबर 2025

लाल आतंक पर निर्णायक प्रहार

दशकों से सुरक्षा बलों के लिए चुनौती बने नक्सल आन्दोलन के सबसे दुर्दांत चेहरे, माड़वी हिड़मा को 18 नवम्बर 2025 को मार गिराया गया. इसे निम्न तीव्रता संघर्ष और प्रतिविद्रोह की रणनीति में एक निर्णायक मोड़ कहा जा सकता है. आंध्र प्रदेश के अल्लूरी सीताराम राजू जिले के घने जंगलों में हुई भीषण मुठभेड़ में सुरक्षा बलों ने न केवल हिड़मा को मार गिराया बल्कि उसकी पत्नी और नक्सली कमांडर माड़कम राजे को भी मौत की नींद सुला दिया. इस सफलता को सुरक्षा विश्लेषक और छत्तीसगढ़ पुलिस द्वारा बस्तर में नक्सलवाद के ताबूत में आखिरी कील बताया जा रहा है. माड़वी हिड़मा और उसकी पत्नी का अंत बस्तर में रक्तपात के एक लम्बे युग की समाप्ति है. यह सुरक्षा बलों के अदम्य साहस और सटीक खुफिया तंत्र की जीत है.

 

छत्तीसगढ़ के सुकमा जिले के जगरगुंडा इलाके के पुवर्ती गाँव में जन्मे माड़वी हिड़मा का सम्बन्ध माड़िया (गोंड) जनजाति से था. जानकारियों के अनुसार हिड़मा नब्बे के दशक के अंत में नक्सली आंदोलन में शामिल हुआ. अपनी क्रूरता, जंगल युद्ध कौशल और रणनीतिक समझ के कारण वह संगठन में तेजी से ऊपर बढ़ा. इसी कारण वह न केवल प्रतिबंधित संगठन भाकपा (माओवादी) की सबसे घातक सैन्य इकाई पीपल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी की बटालियन नंबर-1 का प्रमुख बना बल्कि सदैव चतुर्स्तरीय सुरक्षा घेरे में रहने लगा. अपनी चतुर्स्तरीय सुरक्षा व्यवस्था के कारण हिड़मा को पकड़ना या मारना लगभग असंभव माना जाता था. इसके बावजूद एक संयुक्त ऑपरेशन में उसे मार गिराना केन्द्रीय गृह मंत्रालय और सैन्य बलों की सक्रियता के कारण सम्भव हो सका. पिछले दो वर्षों में केन्द्रीय गृह मंत्रालय की ‘ऑपरेशन कगार’ और ‘प्रहार’ जैसी रणनीतियों ने नक्सलियों को बैकफुट पर ला दिया है.

 



बस्तर में सुरक्षा बलों के बढ़ते दबाव के कारण हिड़मा लम्बे समय से छत्तीसगढ़ सीमा पार कर आंध्र प्रदेश में सुरक्षित ठिकानों की तलाश में था. खुफिया एजेंसियों से मिली जानकारी के आधार पर आंध्र प्रदेश पुलिस की विशेष इकाई 'ग्रेहाउंड्स' और सीआरपीएफ ने मारेदुमिली  के जंगलों में एक संयुक्त ऑपरेशन चलाया. इसी संयुक्त ऑपरेशन में माड़वी हिड़मा और उसकी पत्नी माड़कम राजे का भी मारा जाना नक्सली संगठन के शीर्ष नेतृत्व के पूर्ण सफाये का संकेत देता है. ऑपरेशन की योजना के अनुसार सुरक्षा बलों ने उसके गाँव पुवर्ती में कैम्प स्थापित कर उसकी रसद और सूचना तंत्र को काट दिया. इसके साथ-साथ छत्तीसगढ़ और पड़ोसी राज्यों (तेलंगाना, ओडिशा, आंध्र प्रदेश) की पुलिस के बीच बेहतर समन्वय ने उसे भागने का मौका नहीं दिया.

 

ये दोनों ही नक्सली संगठन के सदस्य मात्र नहीं थे बल्कि अनेक बड़े हमलों के मास्टरमाइंड थे. माड़वी हिड़मा पर 2010 के ताड़मेटला हत्याकांड, 2013 में झीरम घाटी हमला, 2017 का बुरकापाल हत्याकांड तथा 2021 की टेकलगुड़ा मुठभेड़ जैसे हमलों का मास्टरमाइंड होने का आरोप था. ताड़मेटला हत्याकांड भारत के इतिहास में सुरक्षा बलों पर सबसे बड़ा नक्सली हमला था, जिसमें सीआरपीएफ के 76 जवान शहीद हो गए थे. जीरम घाटी हमले ने छत्तीसगढ़ में कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व को समाप्त कर दिया था. इसमें विद्याचरण शुक्ल, महेंद्र कर्मा और नंदकुमार पटेल जैसे दिग्गज नेताओं की हत्या कर दी गई थी. सुकमा में हुए बुरकापाल हमले में सीआरपीएफ के 25 जवान शहीद हुए थे. बीजापुर-सुकमा बॉर्डर पर हुई टेकलगुड़ा मुठभेड़ में 22 सुरक्षाकर्मी शहीद हुए थे. यह हमला सीधे तौर पर हिड़मा की बटालियन द्वारा नियोजित किया गया था. भारतीय सुरक्षा बलों पर हुए सबसे घातक हमलों के पीछे हिड़मा का ही दिमाग माना जाता है. उसके इशारे पर हुए हमलों में सैकड़ों जवान शहीद हुए हैं. उस पर एक करोड़ रुपये से अधिक का इनाम घोषित था. इसी तरह माड़कम राजे हिड़मा की पत्नी मात्र ही नहीं थी बल्कि नक्सली संगठन में ‘डिविजनल कमेटी मेंबर’ के पद पर थी. वह संगठन के भीतर महिला कैडर को तैयार करने और रणनीतिक फैसलों में हिड़मा का साथ देती थी. यह ऑपरेशन केवल एक व्यक्ति के खिलाफ नहीं बल्कि उस ‘पावर सेंटर’ के खिलाफ था जो दशकों से राज्य के विरुद्ध हिंसा में लिप्त था.

 

हिड़मा आदिवासियों के बीच से निकला सबसे बड़ा चेहरा था. उसे नक्सलवाद का ओसामा बिन लादेन माना जाता था. एक तरफ वह अपनी रणनीति और क्रूरता के चलते नक्सलवाद के रूप में माओवादी विचारधारा के सैन्यीकरण का प्रतीक बन गया था वहीं दूसरी तरफ वह बस्तर में शांति बहाली की राह में सबसे बड़ा रोड़ा भी था. हालांकि हाल के वर्षों में सुरक्षा बलों ने 'ऑपरेशन प्रहार' और नई फॉरवर्ड ऑपरेटिंग बेस रणनीति के तहत नक्सलियों को सीमित क्षेत्र में समेट कर रख दिया है. ऐसे में हिड़मा का अंत न केवल सुरक्षा बलों के लिए एक बड़ी मनोवैज्ञानिक जीत होगी बल्कि यह मध्य भारत में वामपंथी उग्रवाद की कमर तोड़ने वाला कदम भी साबित होगा. राज्य के विरुद्ध संगठित हिंसा पर यह सबसे निर्णायक प्रहार है जो न सिर्फ इस लाल आतंक के आधारों तथा नेतृत्व को समाप्त कर देगा बल्कि उनकी जड़ो में तेज़ाब डालने का कार्य भी करेगा. ऐसी आशा की जा रही है कि इसके बाद बड़ी संख्या में नक्सली आत्मसमर्पण कर सकते हैं. भारत के गृहमंत्री अमित शाह द्वारा तीस नवम्बर तक सभी नक्सलियों को हथियार छोड़ने की चेतावनी दी गई है जो यह दर्शाती है कि भारत लाल आतंक के इस प्रहार को कुचलने की स्थिति में आ चुका है. इस चेतावनी के साथ माड़वी हिड़मा के मारे जाने की घटना ने नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई को एक निर्णायक अंत तक पहुँचा दिया है.

शुक्रवार, 14 नवंबर 2025

बिहार का जनादेश

 बिहार का जनादेश

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 एन डी ए की प्रचंड जीत ने एक बार फिर ईवीएम, चुनाव आयोग आदि आदि सभी को विपक्षियों की कुंठा का शिकार होने के लिए प्रस्तुत कर दिया। हारे हुए कुंठित चुनावबाज मुद्दों की चर्चा और सही कारण ढूंढने के बजाए चुनाव प्रणाली पर प्रश्नचिन्ह लगाने में पूरी शक्ति लगा देंगे। ये निराशा और शर्म को छुपाने के सबसे आसान, सस्ता, सुलभ साधन है बिल्कुल सुलभ शौचालय की भांति। ये इन चुनावबाजों के लिए सबसे सहज मार्ग है हार की कटु सच्चाई जिसका कारण वो सब जानते हैं पर व्यक्त नहीं कर सकते नहीं तो उनकी जुबान खींच कर गलियारों में टांग दी जाएगी। एन डी ए का चुनाव प्रचार व रणनीति जहाँ ज़मीनी हकीकत से जुड़ी और विपक्षियों के आपराधिक कार्यकाल को न भुलाने वाली रही,वह सफल रही। लोग जंगलराज को भूले नहीं हैं, इस राज के उत्तराधिकारी के रूप में आर.जे. डी और तेजस्वी से बिहार खाल नुचवाने को तैयार नहीं था। हर घर मे नौकरी, रुपयों का लालच सब कुछ जंगलराज के खूनी ज़ख्मो को भुलाने के लिए अपर्याप्त सिद्ध हुआ। जनसुराज पार्टी की दशा ने ये जता दिया कि चुनाव प्रबंधन में माहिर होना और चुनाव जीतने की कुव्वत होना दो अलग अलग बातें है। ज़मीनी नेताओं का मुकाबला कोई नहीं कर सकता। यही वजह है कि लालू के कुलदीपक,दीपिकाएँ हो या कांग्रेस के तथाकथित युवराज इस चुनाव में एक बार फिर असफल हो गए। ऐसा लगता है कि बड़े राजनीतिक घरानों ने अपनी पार्टियों की सुपाड़ी अपनी औलादों को दे रखी है। परिणाम जो भी है खानदान की राजनीति को पिटते या कहिए बुरी तरह पिटते देखना सुखद है। बिहारी जो तुलनात्मक रूप से राजनीति में गहरा रुझान और समझ रखते हैं उन्होंने उपलब्ध विकल्पों में सर्वोत्तम चुन लिया है। अब यह बनने वाली नई सरकार की जिम्मेदारी होगी कि इस विश्वास और लोकतंत्र को वो विजेता बना दें।

इति

14.11.25

सोमवार, 10 नवंबर 2025

आतंकी हमला है यह धमाका

देश की राजधानी दिल्ली, दिल्ली का सर्वाधिक ऐतिहासिक कहा जाने वाला स्थल लाल किला, यदि कहा जाये कि लाल किला दिल्ली का ही नहीं बल्कि देश का हृदय स्थल है तो इसमें कोई अतिश्योक्ति न होगी. देश के राष्ट्रीय पर्वों गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस पर पूरी आन-बान-शान के साथ यही लाल किला हम सबका गौरव प्रतीक तिरंगा के लहराने के साथ आनन्दित होता नजर आता है. देश के उसी हृदय स्थल लाल किला को एक धमाके के माध्यम से कलंकित करने का प्रयास किया गया. लाल किला मेट्रो स्टेशन के पास एक कार में बड़ा धमाका किया गया, जिसमें लगभग दर्जन भर लोगों के मारे जाने की खबर है.

 

यद्यपि इस हमले को लेकर अभी तक आधिकारिक रूप से पुष्टि नहीं की गई है तथापि इस कार धमाके को प्रथम दृष्टया आतंकी हमला माना जा रहा है. अभी भले ही आधिकारिक रूप से पुष्टि न की गई हो किन्तु इस घटना को आतंकी हमला इस कारण से माना जा रहा है क्योंकि इतनी तीव्रता का धमाका करना सामान्य तौर पर सम्भव नहीं होता है. इस एक सामान्य कारण के साथ-साथ एक महत्त्वपूर्ण कारण यह भी है कि बीते रविवार को ही जम्मू-कश्मीर पुलिस ने एक आतंकी नेटवर्क का खुलासा करते हुए कुछ लोगों की गिरफ्तारी अनंतनाग, शोपियां, गांदरबल, फरीदाबाद से की थी. इन तमाम जगहों से हुई गिरफ्तारियों के द्वारा 2500 किलो विस्फोटक तैयार करने की सामग्री और अन्य खतरनाक हथियार भी बरामद किए गए थे. इतनी बड़ी मात्रा में बरामद हुई विस्फोटक सामग्री से स्पष्ट संकेत मिलता है कि देश को दहलाने की, कुछ खूनी कृत्य करने की गहरी साजिश चल रही थी. इस धमाके के साथ एक और गम्भीर तथ्य यह छिपा है कि इस घटना को इन गिरफ्तारियों के बाद ही अंजाम दिया गया है.

 

इस धमाके की घटना के बाद पूरे एनसीआर में हाई अलर्ट लगा दिया गया है. इसके साथ-साथ गुजरात, कोलकाता, मुंबई आदि जैसे शहरों को भी हाई अलर्ट पर रखा गया है. आतंक की इस घटना ने आतंक के नए रूप पर ध्यान केंद्रित किया है. गिरफ्तार किए गए दो लोग डॉक्टर थे और जैश-ए-मुहम्मद और अंसार गज़वा-ए-हिन्द जैसे आतंकी संगठनों से जुड़े थे. इसमें विशेष बात ये है कि समाज के बीच वर्षों से रहने वाले ये सफेदपोश आतंकी सुरक्षित और कूटबद्ध बातचीत के द्वारा पाकिस्तान स्थित अपने आकाओं के निर्देश पर कार्य कर रहे थे. आतंकवाद की, आतंकियों की गहरी जड़ों की भयावहता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि इस नेटवर्क का विस्तार उच्च शिक्षित वर्ग, विश्वविद्यालय और अन्य व्यावसायिक वर्गों के उन लोगों तक है जिन्हें समाज में सफेदपोश माना जाता है. इस तरह की स्थितियाँ दर्शाती हैं कि वर्तमान दौर में आतंक और आतंकवादी अपना रूप बदल-बदल कर हमारे बीच में ही उपस्थित हैं. हम सबके बीच रहते हुए, हम सबके साथ घुल-मिल कर अपने खतरनाक इरादों को अंजाम देते रहते हैं. धर्मनिरपेक्षता के नाम पर पालने वाले ये दहशतगर्द किसी भी रूप में, किसी भी कीमत पर भारत को बर्बाद करने के लक्ष्य पर डटे हुए हैं. उनकी इस दहशतगर्दी में, उनके इन आतंकी इरादों में क्या डॉक्टर, क्या इंजीनियर, क्या शिक्षित वर्ग, क्या अशिक्षित वर्ग, देखा जाये तो सभी धार्मिक जिहाद की खूनी तलवार लिए आतंकी ही हैं.

 

आज के दौर में आतंक एक विश्वव्यापी समस्या है जो प्रत्येक उस देश को झेलनी पड़ रही है जहाँ इस्लाम है. अब केवल भारत ही नहीं बल्कि यूरोप हो या अमरीका या फिर विश्व का कोई भी देश, जहाँ इस्लामिक संगठनों ने अपनी उपस्थिति बना रखी है वे सबके सब सभी इस्लामिक आतंक के निशाने पर हैं. पूरे विश्व के आतंकी संगठन एक हैं और कमोबेश एक ही प्रकार की तकनीकें और कार्यशैली का प्रयोग करते हैं. यह जानने-समझने के बाद भी दुखद स्थिति यह है कि इनसे निपटने के लिए दुनिया एक नहीं है.सम्पूर्ण विश्व के इस्लामिक आतंकवाद के खिलाफ एकजुट न हो पाने का दुष्परिणाम यह है कि आज ये जिहादी मानसिकता वाले संगठन अमरीका के इस्लामीकरण, भारत के लिए गज़वा-ए-हिन्द जैसे लक्ष्यों पर केन्द्रित हैं, कार्यरत हैं और विडम्बना यह है कि वे ये सारा काम इन्हीं देशों में रह कर काम कर रहे हैं.

 

उदारवादी सोच और मानवतावादी कानूनों के सरंक्षण में जिहाद का ये दैत्य हमारी ज़मीन पर ही हमारे खिलाफ काम कर रहा और सरकारें लाचार हैं. गम्भीर आरोपों में जिन सफेदपोश आतंकियों की गिरफ्तारी की गई है, कल हमारी ही संसद में उनके समर्थन में अनेक बेशर्म आवाजें खुलकर उठेंगीं; उनको निर्दोष बताने वाले हमारे ही राजनैतिक व्यक्ति होंगे; उनके समर्थन में  रैलियाँ निकाली जाएँगी; सरकार की मंशा को कठघरे में खड़ा कर दिया जाएगा. यह सब एक सुनियोजित ढंग से चलाया जाएगा, जिससे सरकार की विश्वसनीयता को ही संदिग्ध कर दिया जाए. दिल्ली की घटना ये दर्शाती है कि आतंकी संगठन पर्याप्त रूप से मजबूत हैं. उनके पास न केवल सफेदपोश लोग हैं बल्कि संसाधन भी हैं और सुरक्षा सम्बन्धी रास्ते भी हैं. यह घटना बताती है कि हमारी सुरक्षा एजेंसियों द्वारा अनेक अवसरों पर ऐसी आतंकी साजिश को समय रहते नाकाम करने के बाद भी एक चूक कितनी खतरनाक हो सकती है.

 

फिलहाल, आतंक भी एक युद्ध है और घात-प्रतिघात इसका हिस्सा है. यहाँ सबक बस यह लेना है कि पूरी ताकत से जिहाद और आतंक को कुचलने का प्रयास होना चाहिए. इनके समर्थन में उठने वाली हर आवाज को, हर समर्थन को खत्म किया जाना चाहिए. आखिर बिना किसी दबाव के, एक देश के रूप में हमें अपने अस्तित्व की रक्षा का पूरा अधिकार है, इसके लिए भले ही कोई कीमत क्यों न चुकानी पड़े.