पिछले दिनों कश्मीर
के पहलगाम में एक दुर्दांत आतंकी हमले में कई पर्यटक मार दिए गए. आतंकियों ने धर्म
पूछने और धार्मिक पहचान सुनिश्चित करने के बाद हिन्दू पर्यटकों को मार दिया. 28 लोगों की जान लेने के बाद आतंकी भागने में सफल
भी हो गए, जिनके लिए सर्च ऑपरेशन्स
चल रहे हैं. यह हमला कश्मीर के खूनी इतिहास में एक और दर्दनाक अध्याय है, जिसने कुछ
बहुत गंभीर प्रश्न हमारे समक्ष खड़े किये हैं.
पहला प्रश्न ये कि
आज़ादी के बाद से कश्मीर लगातार भारत और पाकिस्तान के बीच खूनी मसला रहा है. इस मुद्दे के कारण कभी
भी भारत और पाकिस्तान के संबंध सामान्य नहीं हो सके और दोनों देशों के बीच चार बड़े
युद्ध हो चुके हैं. इतने सालों के बाद, कई युद्धों के बाद, तमाम उच्च स्तरीय वार्ताओं के
बाद भी यह मुद्दा सुलझाया नहीं जा सका. आखिर इसके कारण क्या हो सकते हैं? दूसरा प्रश्न ये कि भारत को कमज़ोर करने के लिए
पाकिस्तान शुरुआत से ही छद्म युद्ध में लिप्त है, फिर भी हम इसके विरुद्ध माकूल रणनीति
नहीं अपना सके. आखिर एकतरफा सौहार्द्र निभाने की बेतुकी ज़िद आखिर क्यों? तीसरा प्रश्न उठता है कि इतनी गंम्भीर सुरक्षा चुनौतियों,
इंटेलिजेंस आउटपुट के बाद भी इतनी बड़ी
चूक कैसे हो गई? आतंकी पूरी
निश्चिंतता के साथ न सिर्फ जघन्य वारदात को अंजाम देते रहे बल्कि भागने में भी सफल
रहे. आखिर ये सब कैसे सम्भव हुआ? अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न, क्या हमारी सेना संसाधनों की कमी,
लगातार सँख्या बल में कटौती और अग्निवीर
जैसी निम्नस्तरीय योजनाओं के साथ पाकिस्तान को सबक देने के लिए किसी बड़ी मुहिम को अंजाम
देने में सक्षम है? याद रखना होगा
कि पाकिस्तान के खिलाफ कोई भी निर्णायक सैन्य कार्यवाही तभी की जा सकेगी जब हम चीन,
बांग्लादेश और पाकिस्तान के साथ एक साथ
कई मोर्चो पर लड़ सकें. इसके साथ-साथ भारत के अंदरूनी गद्दारों पर भी कार्यवाही
करने में, उनको नियन्त्रित करने
में सक्षम हों. यहाँ ध्यान रखना होगा कि पाकिस्तान की आईएसआई और कुख्यात आतंकी संगठन
हमास एकसाथ मिलकर भारत के विरुद्ध कार्य कर रहे है.
भारत की तरफ से सैनिक
कार्यवाही क्या और किस स्तर की होगी यह अभी घोषित नहीं है. इस बारे में मात्र अनुमान
ही लगाए जा रहे हैं किन्तु यह निश्चित है कि युद्ध भारत और पाकिस्तान की दहलीज पर आ
खड़ा हुआ है. पाकिस्तानी सत्ता हमेशा से एक छाया सरकार रही है, जिसे पाकिस्तान की सेना नियंत्रित करती है,
उसके द्वारा बड़े-बड़े दावे करके भारत को डराने और स्वयं को सहज दिखाने का प्रयास किया जा
रहा है. इस तरह के प्रचार युद्ध के द्वारा पाकिस्तानी सरकार का प्रयास भारत को अपने
निर्णय से पीछे हटाने का है, जो अब सम्भव नहीं दिख रहा है. भारत के लिए पीछे हटने और
नाममात्र की कार्यवाही के विकल्प शेष नहीं बचे हैं. आखिर कब तक कोई देश निरन्तर हमले झेलते हुए चुप
रह सकता है? ऐसे में जबकि देश में प्रतिदिन
औसतन तीन सैनिक छद्म-युद्ध की भेंट चढ़ रहे हों; अपने ही देश मे नागरिकों की हत्याएँ धर्म पूछ
कर की जा रही हों; लगभग सभी सीमावर्ती राज्य आतंकवाद और हिंसा से पीड़ित हों; इन सभी समस्याओं में कहीं
न कहीं पाकिस्तान का खुला हाथ हो तब इस स्थिति को कब तक अनदेखा किया जा सकता है? इसी कारण भारत ने पहलगाम हमले के बाद बेहद सख्त
राजनयिक कदम उठाए हैं एवं सैन्य कार्यवाही के भी संकेत दे दिए हैं. सिंधु जल संधि,
जिसे आज तक किसी भी युद्ध के दौरान हथियार नहीं बनाया गया, भारत द्वारा फिलहाल स्थगित
कर दी गई है. इसके बेहद दूरगामी प्रभाव पड़ेंगे. सिंधु जल संधि द्वारा पाकिस्तान की 33 प्रतिशत कृषि भूमि की सिंचाई होती है जो पंजाब
के खेतों में सिंचाई का प्रमुख स्रोत है. इस क्षेत्र की अधिकांश भूमि के स्वामी पाकिस्तानी
सेना के उच्चाधिकारी हैं. पंजाब की अर्थव्यवस्था पर चोट करने का अर्थ पाकिस्तान की
अर्थव्यवस्था और सेना पर सीधी चोट करना है क्योंकि यहाँ की कुल जीडीपी का 25 प्रतिशत पंजाब से आता है.
इसमें कोई दोराय
नहीं कि पाकिस्तान एक असफल राष्ट्र है. वर्तमान में वह बलूचिस्तान के मुद्दे पर बहुत
पस्त है; आर्थिक रूप से लगभग दिवालियेपन की स्थिति में खड़ा है; सेना के नियंत्रण में कठपुतली राज्य है,
बावजूद इसके पाकिस्तान मुस्लिम देशों और चीन से मदद पाने के लिए भारत को घाव देता रहेगा.
पाकिस्तान जानता है कि कश्मीर को सैन्य ताकत के बल पर भारत से छीना नहीं जा सकता लेकिन कश्मीर में लगातर
खून बहाते रहने से भारत को गुलाम कश्मीर वापस लेने के प्रयासों से दूर रखा जा सकता
है. आतंक से भारत को घाव देकर देश का ध्यान भटकाया जा सकता है कि गुलाम कश्मीर भारत
का हिस्सा है और उसपर अवैध रूप से पाकिस्तान का कब्ज़ा है. पंजाब और कश्मीर में आतंकवाद
के द्वारा पाकिस्तान अपने लक्ष्य में लगभग सफल रहा है. दरअसल पाकिस्तान का मूल लक्ष्य
कश्मीर पाना नहीं बल्कि मुसलमानों को भड़काना और आतंकवाद ज़िंदा रखना मुख्य लक्ष्य
है, जिससे गुलाम कश्मीर पर उसके अवैध कब्जे और उसको खाली करने की बात ही न उठे. रूस-यूक्रेन
युद्ध, पश्चिम एशिया में संघर्ष,
चीन-अमेरिका ट्रेड वॉर आदि भूराजनीतिक
परिस्थितियों के मध्य भारत को अनसुलझे कश्मीर मुद्दे को निर्णायक रूप से सुलझाने का
वक़्त आ चुका है. इज़राइल का सबसे बड़ा शत्रु हमास पाकिस्तानी सेना और आईएसआई के साथ मिल
कर कार्यवाही कर रहा है. इज़राइल के दुश्मन पाकिस्तान में पाले-पोसे जा रहे हैं और वे
ही भारत पर हुए इस हमले के जिम्मेदार हैं.
कश्मीर को लेकर शुरू
से ही हमारी नीति सरासर गलत रही है. इस मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र में ले जा कर खतरनाक
भूल की जा चुकी है, जिसके कारण न सिर्फ गुलाम कश्मीर (जिसमें गिलगित, बाल्टिस्तान भी शामिल हैं) की ज़मीन पर पाकिस्तान
को सुरक्षित अड्डा मिला बल्कि चीन के साथ गठजोड़ करने का मौका भी प्राप्त हो गया.
ऐसी स्थिति के चलते हमारी ही भूमि को हमारे विरुद्ध प्रयोग किया जा रहा है. संयुक्त
राष्ट्र के निर्णय की प्रतीक्षा करते वर्षों बीत चुके, अब गुलाम कश्मीर जो हमारी ज़मीन है, उस
पर पूर्ण नियंत्रण के प्रयास होने चाहिए. पाकिस्तान के विरुद्ध प्रभावी सैन्य कार्यवाही
हो, जो न सिर्फ गुलाम कश्मीर, गिलगित, बाल्टिस्तान को वापस ले बल्कि पाकिस्तान के बलूचिस्तान को भी आज़ाद कराने पर केन्द्रित
होनी चाहिए. पाकिस्तान की परमाणु क्षमता को बर्बाद करने और उसको सैनिक रूप से कमज़ोर
किये बगैर पूरे दक्षिण एशिया को कभी भी सुरक्षित नहीं किया जा सकता. यह कार्य एकमात्र
भारत ही कर सकता है.
किसी भी सैनिक कार्यवाही
को करते समय यह ध्यान में रखना होगा कि पाकिस्तान की मदद के लिए चीन और बांग्लादेश
सीमा पर हमारे विरुद्ध मोर्चे खोले जा सकते हैं. उनसे निपटने के लिए मानव बल की आवश्यकता होगी,
अतः सैनिकों की संख्या कम करने की मूर्खतापूर्ण नीति का परित्याग करना होगा. लटके हुए
रक्षा सौदों को तत्काल प्राप्त करने की कोशिश करनी होगी. आतंकवाद के विरुद्ध प्रतिरक्षात्मक
नीति ने हमें हमेशा गहरे घाव ही दिए हैं इसलिए अब आक्रामक रणनीति ही अपनानी होगी. देश ने अपने ऊर्जा एवं
संसाधनों को लगातार बर्बाद ही किया है किन्तु कश्मीर मुद्दे का स्थायी समाधान नहीं
किया जा सका है. यह एक अवसर है जिसके द्वारा अनसुलझे मुद्दों, समस्याओं का स्थायी समाधान
करके स्थायी शांति स्थापित की जा सकती है.

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