अपने चुनावी
प्रचार के दौरान रूस-यूक्रेन युद्ध को समाप्त करने का दावा करने वाले डोनाल्ड ट्रम्प ने अमेरिका की सत्ता सँभालते ही
एक नए तरह का युद्ध छेड़ दिया है. डोनाल्ड ट्रम्प की जब से अमरीकी चुनावों में जीत हुई
तभी से आयातित सामानों पर किसी देश द्वारा आरोपित किया जाने वाले प्रशुल्क (टैरिफ)
को लेकर कुछ बेहद सख्त नीतियों की सुगबुगाहट होने लगी थी. टैरिफ वॉर के रूप में
सामने आई इस नीति के बारे में उन्होंने अपने चुनाव प्रचार के दौरान ही संकेत कर
दिया था. चुनावी बहस के दौरान ट्रम्प का स्पष्ट संदेश था कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था में
सब कुछ सही करने के लिए वो सख्त नीतियाँ अपनाने से गुरेज नहीं करेंगे. टैरिफ को
लेकर चुनावी प्रचार में भी ट्रम्प ने कहा था कि ये शुल्क आपके लिए कोई लागत नहीं होंगे,
यह एक दूसरे देश के लिए लागत होगी. दुनिया
भर के तमाम अर्थशास्त्रियों ने ट्रम्प के इस फैसले पर हैरानी जताई. उनका कहना है कि
ट्रम्प का ये कदम अन्य देशों के लिए तो नुकसानदेह है ही लेकिन ये आम अमेरिकियों के
लिए भी एक बड़ा खतरा है.
ट्रम्प द्वारा
किसी भी स्थिति की परवाह किये बिना टैरिफ नीति को अमल में लाना शुरू कर दिया गया है.
सबसे पहले कनाडा, मैक्सिको और चीन
के व्यापार शुल्क अथवा टैरिफ में बढ़ोत्तरी की गई है. यह दर कनाडा और मैक्सिको के लिए
25 प्रतिशत और चीन के आयातित सामानों
पर 10 प्रतिशत है. इसके लागू होते
ही इन तीनों देशों द्वारा अमरीकी सामानों पर प्रतिरोधक शुल्क लगाने की चेतावनी दी गई,
जिसके चलते कुछ समय के लिए इन बढ़ी हुई
दरों को स्थगित कर दिया गया है. बावजूद इस कदम के अमरीका द्वारा स्पष्ट संकेत दिया
जा रहा है कि शीघ्र ही जापान, दक्षिण
कोरिया, एशिया और यूरोपियन यूनियन
के देशों के टैरिफ में भी बढ़ोत्तरी की जा सकती है. दरअसल अमरीका में सबसे अधिक निर्यात
चीन, मैक्सिको और कनाडा द्वारा
किया जाता है. निर्यात के प्रमुख क्षेत्र ऑटोमोबाइल, फार्मास्युटिकल हैं. इन क्षेत्रों में अमरीकी आयात निर्यात
में घोर असंतुलन है जो अर्थव्यवस्था पर एक बोझ है. इस क्षेत्र की अमरीकी कम्पनियाँ
भी घाटे का सामना कर रही हैं. इन सबके बीच अमेरिका के सामने सबसे बड़ी चुनौती अवैध रूप
से रह रहे लोगों को नियंत्रित करना भी है, जिनकी गैरकानूनी गतिविधियों के कारण अमेरिका ड्रग्स और हिंसा का
केन्द्र बनता जा रहा है. चीन से आयात होने वाला फेंटनाइल का बड़े पैमाने पर मादक
द्रव्य के रूप में अवैध तरीके से प्रयोग हो रहा है. इसको नियंत्रित करने के उद्देश्य
से भी चीन के सामानों पर व्यापार शुल्क बढ़ाया जा रहा है, जिससे इन पदार्थों के आयात
को हतोत्साहित किया जा सके. अमेरिका की इस वर्तमान नीति को संरक्षणवाद और असम्बद्ध
अंतरदेशीय विवादों के प्रतिकार के रूप में विश्लेषित किया जा रहा है. विश्व व्यापार
संगठन का सदस्य होने के बाद भी अमेरिका संरक्षणवाद के मार्ग पर पुनः लौट रहा है,
जिसमें इसकी आर्थिक विवशता दिखती है.
डोनाल्ड ट्रंप अपने
इस कार्यकाल में वित्तीय बोझ को कम करने, आय बढ़ाने के अपारंपरिक और जोखिम भरे उपायों को अपनाने का प्रयास कर रहे हैं. वे
अमरीकी अर्थव्यवस्था को मज़बूत करने के लिए टैरिफ आय को बढ़ा कर 60 प्रतिशत तक ले जाना चाहते हैं, जिससे इसे राजस्व का प्रमुख स्रोत बनाया
जा सके. ट्रम्प राजस्व के एक प्रमुख स्रोत आयकर को समाप्त कर अमरीकी मध्यम वर्ग को
राहत देने की नीति पर चल रहे हैं. इस कारण भी आयकर से होने वाली आय का विकल्प बढ़े हुये
व्यापार शुल्क से लिये जाने का विचार है. यह विचार चुनाव प्रचार के दौरान अथवा अब
ट्रम्प के राष्ट्रपति बनने के बाद भले ही जनता को लुभावना लगे किन्तु इसके प्रभाव नकारात्मक
और घातक होंगे. अंततः ये अमरीका के लिए भी सही सिद्ध नहीं होंगे. वर्तमान टैरिफ प्रस्ताव
तीन ट्रिलियन डॉलर के व्यापार चक्र को प्रभावित करने वाले हैं. उच्च टैरिफ दर नकारात्मक
और प्रतिगामी आर्थिक प्रक्रियाओं को बढ़ा देगी. यदि अमरीका किसी देश के सामान पर आयात
शुल्क को बढ़ा सकता है तो वह देश भी अमरीकी सामानों पर उच्च शुल्क आरोपित कर सकता है.
ऐसा करने की घोषणा चीन, कनाडा और मैक्सिको द्वारा की जा चुकी है. इसके अतिरिक्त इस मुद्दे पर अमरीका की विश्व व्यापार संगठन में भी किरकिरी हो सकती है.
अमरीकी राष्ट्रपति की इस नीति का वैश्विक आर्थिक गतिविधियों पर भी नकारात्मक प्रभाव
पड़ सकता है. विकासशील देशों की अर्थव्यवस्थाएँ इन संरक्षणवादी नीतियों के समक्ष ठहर
नहीं पाएँगी. ऐसे में उनका आर्थिक ढाँचा डगमगाने का खतरा भी उत्पन्न हो सकता है.
स्पष्ट है कि आयात शुल्क बढ़ने से विश्व व्यापार बुरी तरह प्रभावित होगा. आयात आधारित
व्यापार संकुचित होने लगेगा, जिससे नौकरियों और उत्पादन में कमी आएगी. वस्तुओं, उत्पादों,
सेवाओं आदि की कीमतें बढ़ेंगी और मुद्रास्फीति अपने चरम पर आ जायेगी. डॉलर की स्थिति
भुगतान असंतुलन को जन्म देगी जो वैश्विक व्यापार को मंदी की स्थिति में ले जाएगी. कुल
मिलाकर अमरीका स्वयं भी इन नकारात्मक प्रभावों से बच नहीं पायेगा.
उच्च प्रशुल्क के दुष्परिणामों
के रूप में इसे नकारा नहीं जा सकता है कि टैरिफ वार किसी उग्र युद्ध में परिवर्तित
हो सकता है. युद्ध की विभीषिका से जूझ रही वर्तमान विश्व अर्थव्यवस्था पहले से ही दबाव
में है, उस पर ट्रम्प का टैरिफ बम किसी हमले से कम नहीं है. इस तरह से आक्रामक प्रशुल्क
नीति न केवल अमेरिका के बल्कि वैश्विक आर्थिक चक्र को ध्वस्त कर देगी. यह स्थिति अमरीका
के लिए भी घातक सिद्ध होगी. आखिर अपने उत्पादन को बेचने के लिए अमरीका को भी वैश्विक
बाजार की आवश्यक्ता है. यदि अमरीका अपने बाजार को दूसरे देशों के लिए कठिन बना कर हतोत्साहित
करेगा तो उसे भी इस स्थिति का सामना करना पड़ेगा. बेहतर है कि अमरीकी राष्ट्रपति कुछ
बेहतर और संतुलित नीतियों को अपनाएँ, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था को टैरिफ युद्ध में
जाने से रोका जा सके.
