रविवार, 27 अप्रैल 2025

आक्रामक रणनीति से निकलेगा स्थायी समाधान

पिछले दिनों कश्मीर के पहलगाम में एक दुर्दांत आतंकी हमले में कई पर्यटक मार दिए गए. आतंकियों ने धर्म पूछने और धार्मिक पहचान सुनिश्चित करने के बाद हिन्दू पर्यटकों को मार दिया. 28 लोगों की जान लेने के बाद आतंकी भागने में सफल भी हो गए, जिनके लिए सर्च ऑपरेशन्स चल रहे हैं. यह हमला कश्मीर के खूनी इतिहास में एक और दर्दनाक अध्याय है, जिसने कुछ बहुत गंभीर प्रश्न हमारे समक्ष खड़े किये हैं.

 

पहला प्रश्न ये कि आज़ादी के बाद से कश्मीर लगातार भारत और पाकिस्तान के बीच खूनी मसला रहा है. इस मुद्दे के कारण कभी भी भारत और पाकिस्तान के संबंध सामान्य नहीं हो सके और दोनों देशों के बीच चार बड़े युद्ध हो चुके हैं. इतने सालों के बाद, कई युद्धों के बाद, तमाम उच्च स्तरीय वार्ताओं के बाद भी यह मुद्दा सुलझाया नहीं जा सका. आखिर इसके कारण क्या हो सकते हैं? दूसरा प्रश्न ये कि भारत को कमज़ोर करने के लिए पाकिस्तान शुरुआत से ही छद्म युद्ध में लिप्त है, फिर भी हम इसके विरुद्ध माकूल रणनीति नहीं अपना सके. आखिर एकतरफा सौहार्द्र निभाने की बेतुकी ज़िद आखिर क्यों? तीसरा प्रश्न उठता है कि इतनी गंम्भीर सुरक्षा चुनौतियों, इंटेलिजेंस आउटपुट के बाद भी इतनी बड़ी चूक कैसे हो गई? आतंकी पूरी निश्चिंतता के साथ न सिर्फ जघन्य वारदात को अंजाम देते रहे बल्कि भागने में भी सफल रहे. आखिर ये सब कैसे सम्भव हुआ? अंतिम और सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न, क्या हमारी सेना संसाधनों की कमी, लगातार सँख्या बल में कटौती और अग्निवीर जैसी निम्नस्तरीय योजनाओं के साथ पाकिस्तान को सबक देने के लिए किसी बड़ी मुहिम को अंजाम देने में सक्षम है? याद रखना होगा कि पाकिस्तान के खिलाफ कोई भी निर्णायक सैन्य कार्यवाही तभी की जा सकेगी जब हम चीन, बांग्लादेश और पाकिस्तान के साथ एक साथ कई मोर्चो पर लड़ सकें. इसके साथ-साथ भारत के अंदरूनी गद्दारों पर भी कार्यवाही करने में, उनको नियन्त्रित करने में सक्षम हों. यहाँ ध्यान रखना होगा कि पाकिस्तान की आईएसआई और कुख्यात आतंकी संगठन हमास एकसाथ मिलकर भारत के विरुद्ध कार्य कर रहे है.

 



भारत की तरफ से सैनिक कार्यवाही क्या और किस स्तर की होगी यह अभी घोषित नहीं है. इस बारे में मात्र अनुमान ही लगाए जा रहे हैं किन्तु यह निश्चित है कि युद्ध भारत और पाकिस्तान की दहलीज पर आ खड़ा हुआ है. पाकिस्तानी सत्ता हमेशा से एक छाया सरकार रही है, जिसे पाकिस्तान की सेना नियंत्रित करती है, उसके द्वारा बड़े-बड़े दावे करके भारत को डराने और स्वयं को सहज दिखाने का प्रयास किया जा रहा है. इस तरह के प्रचार युद्ध के द्वारा पाकिस्तानी सरकार का प्रयास भारत को अपने निर्णय से पीछे हटाने का है, जो अब सम्भव नहीं दिख रहा है. भारत के लिए पीछे हटने और नाममात्र की कार्यवाही के विकल्प शेष नहीं बचे हैं. आखिर कब तक कोई देश निरन्तर हमले झेलते हुए चुप रह सकता है? ऐसे में जबकि देश में प्रतिदिन औसतन तीन सैनिक छद्म-युद्ध की भेंट चढ़ रहे हों; अपने ही देश मे नागरिकों की हत्याएँ धर्म पूछ कर की जा रही हों; लगभग सभी सीमावर्ती राज्य आतंकवाद और हिंसा से पीड़ित हों; इन सभी समस्याओं में कहीं न कहीं पाकिस्तान का खुला हाथ हो तब इस स्थिति को कब तक अनदेखा किया जा सकता है? इसी कारण भारत ने पहलगाम हमले के बाद बेहद सख्त राजनयिक कदम उठाए हैं एवं सैन्य कार्यवाही के भी संकेत दे दिए हैं. सिंधु जल संधि, जिसे आज तक किसी भी युद्ध के दौरान हथियार नहीं बनाया गया, भारत द्वारा फिलहाल स्थगित कर दी गई है. इसके बेहद दूरगामी प्रभाव पड़ेंगे. सिंधु जल संधि द्वारा पाकिस्तान की 33 प्रतिशत कृषि भूमि की सिंचाई होती है जो पंजाब के खेतों में सिंचाई का प्रमुख स्रोत है. इस क्षेत्र की अधिकांश भूमि के स्वामी पाकिस्तानी सेना के उच्चाधिकारी हैं. पंजाब की अर्थव्यवस्था पर चोट करने का अर्थ पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था और सेना पर सीधी चोट करना है क्योंकि यहाँ की कुल जीडीपी का 25 प्रतिशत पंजाब से आता है.

 

इसमें कोई दोराय नहीं कि पाकिस्तान एक असफल राष्ट्र है. वर्तमान में वह बलूचिस्तान के मुद्दे पर बहुत पस्त है; आर्थिक रूप से लगभग दिवालियेपन की स्थिति में खड़ा है; सेना के नियंत्रण में कठपुतली राज्य है, बावजूद इसके पाकिस्तान मुस्लिम देशों और चीन से मदद पाने के लिए भारत को घाव देता रहेगा. पाकिस्तान जानता है कि कश्मीर को सैन्य ताकत के बल पर भारत से छीना नहीं जा सकता लेकिन कश्मीर में लगातर खून बहाते रहने से भारत को गुलाम कश्मीर वापस लेने के प्रयासों से दूर रखा जा सकता है. आतंक से भारत को घाव देकर देश का ध्यान भटकाया जा सकता है कि गुलाम कश्मीर भारत का हिस्सा है और उसपर अवैध रूप से पाकिस्तान का कब्ज़ा है. पंजाब और कश्मीर में आतंकवाद के द्वारा पाकिस्तान अपने लक्ष्य में लगभग सफल रहा है. दरअसल पाकिस्तान का मूल लक्ष्य कश्मीर पाना नहीं बल्कि मुसलमानों को भड़काना और आतंकवाद ज़िंदा रखना मुख्य लक्ष्य है, जिससे गुलाम कश्मीर पर उसके अवैध कब्जे और उसको खाली करने की बात ही न उठे. रूस-यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया में संघर्ष, चीन-अमेरिका ट्रेड वॉर आदि भूराजनीतिक परिस्थितियों के मध्य भारत को अनसुलझे कश्मीर मुद्दे को निर्णायक रूप से सुलझाने का वक़्त आ चुका है. इज़राइल का सबसे बड़ा शत्रु हमास पाकिस्तानी सेना और आईएसआई के साथ मिल कर कार्यवाही कर रहा है. इज़राइल के दुश्मन पाकिस्तान में पाले-पोसे जा रहे हैं और वे ही भारत पर हुए इस हमले के जिम्मेदार हैं.

 

कश्मीर को लेकर शुरू से ही हमारी नीति सरासर गलत रही है. इस मुद्दे को संयुक्त राष्ट्र में ले जा कर खतरनाक भूल की जा चुकी है, जिसके कारण न सिर्फ गुलाम कश्मीर (जिसमें गिलगित, बाल्टिस्तान भी शामिल हैं) की ज़मीन पर पाकिस्तान को सुरक्षित अड्डा मिला बल्कि चीन के साथ गठजोड़ करने का मौका भी प्राप्त हो गया. ऐसी स्थिति के चलते हमारी ही भूमि को हमारे विरुद्ध प्रयोग किया जा रहा है. संयुक्त राष्ट्र के निर्णय की प्रतीक्षा करते वर्षों बीत चुके, अब गुलाम कश्मीर जो हमारी ज़मीन है, उस पर पूर्ण नियंत्रण के प्रयास होने चाहिए. पाकिस्तान के विरुद्ध प्रभावी सैन्य कार्यवाही हो, जो न सिर्फ गुलाम कश्मीर, गिलगित, बाल्टिस्तान को वापस ले बल्कि पाकिस्तान के बलूचिस्तान को भी आज़ाद कराने पर केन्द्रित होनी चाहिए. पाकिस्तान की परमाणु क्षमता को बर्बाद करने और उसको सैनिक रूप से कमज़ोर किये बगैर पूरे दक्षिण एशिया को कभी भी सुरक्षित नहीं किया जा सकता. यह कार्य एकमात्र भारत ही कर सकता है.

 

किसी भी सैनिक कार्यवाही को करते समय यह ध्यान में रखना होगा कि पाकिस्तान की मदद के लिए चीन और बांग्लादेश सीमा पर हमारे विरुद्ध मोर्चे खोले जा सकते हैं. उनसे निपटने के लिए मानव बल की आवश्यकता होगी, अतः सैनिकों की संख्या कम करने की मूर्खतापूर्ण नीति का परित्याग करना होगा. लटके हुए रक्षा सौदों को तत्काल प्राप्त करने की कोशिश करनी होगी. आतंकवाद के विरुद्ध प्रतिरक्षात्मक नीति ने हमें हमेशा गहरे घाव ही दिए हैं इसलिए अब आक्रामक रणनीति ही अपनानी होगी. देश ने अपने ऊर्जा एवं संसाधनों को लगातार बर्बाद ही किया है किन्तु कश्मीर मुद्दे का स्थायी समाधान नहीं किया जा सका है. यह एक अवसर है जिसके द्वारा अनसुलझे मुद्दों, समस्याओं का स्थायी समाधान करके स्थायी शांति स्थापित की जा सकती है.


बुधवार, 23 अप्रैल 2025

पहलगाम हमला

 'Let's bleed India by thousand cuts' को अपना मिशन मानने वाली पाकिस्तानी सत्ता और फौज के गठजोड़ का भारत द्वारा जो राजनयिक प्रतिक्रिया आज दी गई उससे बिगड़ क्या जाएगा?  सिंधु जल समझौता, भारतीय वीजा,भारत के साथ दौत्य संबंध यदि पाकिस्तान के लिए इतने ही महत्वपूर्ण होते तो भारत पाकिस्तान संबंध इतने बदशक्ल न होते। पाकिस्तान का निर्माण ही भारत या हिंदुत्व के विरोध पर हुआ है। 


पाकिस्तान का कोई राष्ट्रीय चरित्र मज़हब से अलग करके उकेरना असंभव है। पाकिस्तान एक जिहादी मुस्लिम,आतंकी राष्ट्र है,हम हिन्दू बहुल होने के नाते उसके दुश्मन थे और रहेंगे। इस सत्य को स्वीकार कर आगे बढ़ने की आवशयक्ता है। पाकिस्तान की सत्ता कभी भी इस जिहादी चरित्र को नहीं छोड़ सकती। अब ऐसी मानसिकता वाले आतंकी देश से डील करते समय राजनयिक रास्ते व्यर्थ हैं। यदि कश्मीर पाकिस्तान को नहीं दिया जा सकता, यदि भारत को शरिया कानून में नहीं लाया जा सकता, यदि देश की बहुसंख्यक हिन्दू आबादी को जीने का अधिकार है तो पाकिस्तान से डील करने का तरीका वही होना चाहिए जो इस्राइल ने फिलिस्तीन,हमास के लिए अपना रखा है। 


1 के बदले 100 मारो, बरसाओ शहरों पर मिसाइलें, धूल में मिला दो बस्तियों को। कोई कानून एकतरफा मानने की आवश्यकता नहीं है। जिस दिन इन जिहादियों की लाशों से सड़के पटने लगेगी खुद ही बिलबिला के अपने नेताओं और फौजियों को मारेंगे। कोई बात नहीं, खून का बदला सिर्फ खून होगा है ये सबक हर पाकिस्तानी के ज़ेहन में चिपकाने का वक़्त आ चुका है।


23.04.2025

गुरुवार, 10 अप्रैल 2025

आपराधिक प्रवृत्ति में घिरता पारिवारिक ढाँचा

विकास की तीव्रतम गतिमान अवस्था में गति बनाये हुए समाज में आजकल कहीं भी नज़र डालिये विकास के साथ-साथ अपराध भी अपनी गति बनाये हुए हैं. देश में कहीं भी दृष्टिपात किया जाये, किसी भी सामाजिक स्तर पर ध्यान केन्द्रित किया जाये, सभी जगह सम्बन्धों पर जघन्य अपराध का साया दिखता है. इस खतरनाक आपराधिक साये की चपेट में विशेष रूप से पति-पत्नी के सम्बन्ध हैं, साथ ही इनसे जुड़े हुए अन्य रिश्ते-नाते भी आपराधिक कृत्यों से घिरे नजर आते हैं. वर्तमान परिदृश्य में इस तरह की घटनाओं की, अपराधों की बाढ़ सी आ गई है जिनके केन्द्र में स्त्री और पुरुष हैं. इन आपराधिक कृत्यों में दुखद पहलू ये है कि ये स्त्री-पुरुष अनजान नहीं, अजनबी नहीं बल्कि आपस में पति-पत्नी हैं. ये स्थिति एक तरह की विद्रूपता सी नजर आती है जहाँ पति और पत्नी आपस में ही एक-दूसरे के विरुद्ध आपराधिक कृत्यों में संलिप्त हैं.   

 

वर्तमान सन्दर्भों में विमर्श को आगे बढ़ाने के पहले समाज को अपनी ही उस स्थिति पर विचार करना होगा जहाँ कि महिलाओं को हाशिए का व्यक्ति समझा जाता था. यह अत्यंत दुखद स्थिति है किन्तु हमारे समाज की कटु सच्चाई भी है कि महिलाओं को उनके ही तथाकथित परिवारों में दरकिनार किया जाता रहा है. पारिवारिक निर्णयों की बात हो, परिवार के सन्दर्भ में किसी गम्भीर विषय पर विचारों का आदान-प्रदान हो अथवा अन्य कोई भी स्थिति हो, परिवार की महिलाओं को नगण्य ही समझा जाता रहा है. यह स्थिति किसी वर्ग विशेष की नहीं, किसी जाति विशेष की नहीं बल्कि प्रत्येक सामाजिक आय-वर्ग में एवं विभिन्न जाति समूहों में कमोबेश एक जैसी रही है.

 



महिलाओं के प्रति विभेद भरे माहौल के चलते एक ऐसा जमाना भी गुजरा था जब दहेज़ के लालच में अनगिनत बहुओं की जान उनके पतियों और परिजनों द्वारा संगठित रूप से ले ली गई. कानून भी ऐसे हत्यारों के समक्ष बहुत लम्बे समय तक अप्रभावी रहा. नब्बे के दशक में दहेज विरोधी कानून को सख्त बनाया गया. सख्त कानून के अमल में आने पर, सरकार द्वारा सख्त रवैया अपनाने के कारण पुलिस और प्रशासन त्वरित रूप से इन मामलों में कार्यवाही करने लगा. शासन-प्रशासन द्वारा सक्रियता दिखाने से अपराधियों पर कार्यवाही होने लगी, लोगों में कानून का भय पैदा हुआ लेकिन अपराध के मूल कारण, समाज की सोच में अपेक्षित बदलाव नहीं आ सका.

 

सामाजिक रूप से समाज ने जहाँ एक ही परिवार में लड़का-लड़की का भेद बनाया वहीं विवाह पश्चात् भी इस विभेदपूर्ण स्थिति में परिवर्तन नहीं आने दिया. समाज ने विवाहित स्त्री और उसके मायके से सम्बन्धित परिजनों और पुरुषों के परिवार की भांति कभी नहीं स्वीकारा. पारम्परिक भारतीय परिवारों में लड़की के परिवार का हस्तक्षेप नगण्य ही बना रहा. यद्यपि प्रत्येक परिवार बहू के शोषण और अत्याचार में लिप्त नहीं रहा तथापि इनकी संख्या चिंताजनक बनी रही. महिलाओं के प्रति अपराधों, घरेलू हिंसा ने एक रुग्ण सोच वाले समाज को जन्म दिया है. पुरुष इस हिंसा को अपनी सामाजिक श्रेष्ठता की विरासत समझ कर आत्ममुग्ध मनोरोगी बने घूमते रहे वहीं महिलाओं पर होती हिंसा ने महिलाओं की सोच को बदल दिया. यह सामाजिक रुग्णता आज की स्त्री को उस उस मोड़ पर ले आई है जहाँ वह अपने ही पति और उसके परिवार के प्रति गहरी आशंका से ग्रसित है. इस तरह की शंका के साथ एक महिला पूर्वाग्रह से मुक्त होकर नए जीवन में प्रवेश नहीं कर पा रही, भले ही परिवार कैसा भी हो, पति कितना भी सुलझा क्यों न हो.

 

महिलाओं की इस बदली हुई सोच और आधुनिक जीवन शैली के मध्य हमारी सामाजिक, पारिवारिक अवधारणाओं पर गहरा आघात लगा है. एक तरफ जहाँ परिवार का ढाँचा विकृति का शिकार हुआ है वहीं दूसरी तरफ विवाह संस्था भी विखंडित होने वाली स्थिति में है. स्त्री एवं पुरुष, दोनों में ही मूल्य एवं समर्पण का अभाव दिखता है. वे दोनों ही एक-दूसरे के प्रति संशय, हिंसा, असहयोग आदि की भावना से ग्रसित हैं. एक स्वस्थ परिवार की नींव रखने के लिए पति-पत्नी दोनों में ही आपसी समझ, आपसी समन्वय, परस्पर सहयोग, समर्पण, विश्वास आदि का होना आवश्यक है. आधुनिक नारी जैविक निर्धारणवाद को खारिज करते हुए फेमिनिज़्म का झण्डा बुलंद करने को अपनी तथाकथित जीत मान बैठी है. इसका सीधा असर घरों में हो रही घटनाओं में देखा जा सकता है. विवाह से जुड़े फैसलों में आज स्त्री-पुरुष दोनों ही परिवार की मर्जी के आगे झुकने की सोच नहीं रखते हैं. अपने मनपसंद जीवनसाथी का चुनाव करने के बाद भी विवाह के सफल होने की दर गिरती ही जा रही है. अनेक मामलों में विवाह के कुछ दिनों बाद ही सम्बन्ध इस हद तक खराब हो जाते हैं कि निभाना असंभव हो जाता है. इसका दुष्परिणाम कुछ इस रूप में सामने आ रहा है कि विवाह समाप्ति के अनेक वैध विकल्प होने के बाद भी पति या पत्नी द्वारा अमानुषिक तरीकों से अपने जीवनसाथी की हत्या तक किये जाने की घटनाएँ सामने आने लगी हैं. इन घटनाओं के लगातार बढ़ने ने एवं महिलाओं द्वारा भी ऐसे आपराधिक कृत्यों में शामिल होने की प्रवृति ने विवाह संस्था के औचित्य पर ही प्रश्नचिन्ह लगा दिया है. विवाह जो सुरक्षा और स्थिरता का पर्याय था, आज खतरे और परेशानी का कारण बनता जा रहा है.

 

सोचने वाली बात है कि किसी बीमार सोच भरे समाज से निकलने वाले स्त्री-पुरुष मिल कर एक स्वस्थ घर कैसे बना सकते हैं? मूल्यविहीन, उपभोक्तावादी जीवनशैली और उससे उत्पन्न पीढ़ी में धैर्य का नितांत अभाव है. आज की पीढ़ी बहुत जल्दी किसी सम्बन्ध में आना तो चाहती है लेकिन उस सम्बन्ध के साथ आने वाली जिम्मेदारियों को निभाने का धैर्य एवं नैतिक साहस नहीं रखती है. ऐसे में वैवाहिक सम्बन्ध जो परिवार का आधार है, उसे यूज़ एंड थ्रो मानसिकता से कैसे चलया जा सकता है? वर्तमान पीढ़ी की ख़ुशी और उनकी जीवन-शैली की दृष्टि से यदि विवाह के औचित्य को समाप्त ही मान लिया जाए तो क्या यह पीढ़ी जीवन भर ट्रायल और एरर थ्योरी पर चल कर जीवन बिता पाएगी? क्या यूज एंड थ्रो की मानसिकता के साथ वह स्थिर सामाजिक ढाँचे का निर्माण कर पाएगी? क्या वह अपने ही जीवन में कभी स्थिरता को प्राप्त कर पाएगी? ऐसी असामान्य स्थिति के बारे में स्त्रियों को, पुरुषों को, समाजशास्त्रियों को, परिवारों को, समाज को अत्यन्त गम्भीरता से विचार करने की आवश्यकता है. कहीं ऐसा न हो कि विद्वेष, हिंसा, अपराध के चंगुल में फँसते जा रहे परिवारों की तीव्रता, रफ़्तार देखते हुए सुधारात्मक सम्भावना हाथ से निकल जाये.