गुरुवार, 29 दिसंबर 2022

क्या सर्दियाँ करेंगी रूस-यूक्रेन युद्ध का निर्णय?

फ़रवरी 2022यही वो तारीख है जब रूस ने अपने दक्षिणी-पश्चिमी सीमा पर स्थित राज्य यूक्रेन पर बड़े पैमाने पर हमला बोला था. आज दस माह से भी अधिक होने को आया किन्तु युद्ध किसी निर्णायक मोड़ पर नहीं आ सका. जैसा पहले अनुमान लगाया जा रहा था कि यूक्रेन बहुत लम्बे वक़्त तक रूस की सैन्य शक्ति का मुकाबला नहीं कर सकेगा. जबरदस्त सैन्य आक्रमण के चलते शीघ्र ही समझौते की कोई स्थिति बन जायेगी किन्तु सैन्य शक्ति में अत्यंत बलशाली रूस भले ही यूक्रेन पर प्रारंभ में भारी पड़ा हो और वह यूक्रेन की भूमि पर कब्ज़ा करने में सफल भी हुआ हो किन्तु अब तक वो न कोई निर्णायक स्थिति में पहुँच पाया है और न ही यूक्रेन का मनोबल तोड़ सका है. यूक्रेन के शहरों को राख का ढेर बनाने के बाद भी जेलेंसकी को रूस के द्वारा पराजित नहीं किया जा सका है. तमाम आलोचनाओं को जेलेंसकी के नेतृत्व ने गलत साबित कर दिया है. जेलेंसकी का यह बयान कि “मै जिंदा हूँ, मुकाबला कर रहा हूँ..... दुश्मन की सैनिक ताकत को हमारे मनोबल से टकराना होगा” यूक्रेन की ताकत बना हुआ है.


अभी हाल में विश्व ने यूक्रेन के राष्ट्रपति ब्लादिमीर जेलेंसकी को खेरसोंन में विजेता की भांति यूक्रेन के सैनिको के साथ देखा. खेरसोंन यूक्रेन का दक्षिणी शहर है जो काला सागर और नीपर नदी का एक महत्वपूर्ण बंदरगाह है. यह क्रीमिया के उत्तर में स्थित है तथा इस इलाके और खेरेसोंन ओब्लास्ट पर रुसी सेना ने नियंत्रण कर लिया था. यह यूक्रेन का पहला महत्वपूर्ण क्षेत्र था जो रूस के कब्जे में चला गया था, जिसे हाल में ही रूसी कब्जे से मुक्त करा लिया गया है. फिलहाल रूसी सेनाएं खेरेसोंन से पीछे हट चुकी हैं और डेनिपर नदी के पूर्वी किनारे पर प्रतिरक्षात्मक स्थिति में हैं.


रूसी सेनाओं के खेरसोंन से पीछे हटने की घटना मास्को में भूचाल लाने वाली रही. रूस में जहाँ एक तरफ राष्ट्रपति पुतिन ने अपने सेनाअध्यक्ष को बदल जनरल सेर्वोइकिन को युद्ध की कमांड सौंपी है, वहीं दूसरी तरफ नये सिरे से रूसी रणनीति पर काम आरम्भ हो रहा है. इस घटना के बाद ब्लादिमीर पुतिन की नेतृत्व-क्षमता सवालों के घेरे में आ गई है. देश में उन्हें आलोचनाओ का शिकार होना पड रहा है. यूक्रेनी सेना रूसी सेनाओं को पीछे धकेलने में सफल हो रही हैं. वे चुन-चुन कर सटीक प्रहार कर रहे हैं. कुल मिला कर अभी तक रूस की अपराजेयता का भ्रम टूट चुका है.


यूक्रेन की उलझाव की रणनीति सफल होती दिख रही है. इस उलझाव की रणनीति में मौसम अब यूक्रेन का साथ देता दिख रहा है. बर्फीली सर्दियाँ रूसी युद्ध मशीन को फ्रीज़ कर देंगी और रूस के बचे खुचे मनोबल को भी. बर्फ की चादर से यूक्रेन की वॉर साइट्स ढक चुकी है. ऐसी स्थिति में जानलेवा सर्दियाँ टैंकों को बेकार कर देगी. उनको वहाँ से सुरक्षित निकालना भी आसान नहीं होगा. अभी तक एक अनुमान के अनुसार इस युद्ध पर रूस 8000 अरब रुपए फूँक चुका है. इतनी कीमत के बाद उसकी सामर्थ्य इस तरह की नहीं बची है कि उसके द्वारा यह कीमत लगातार वहन की जा सके. रूस अब किसी भी प्रकार से अपना चेहरा बचाना चाहता है. इस कारण से उसके द्वारा वार्ता के लिये माहौल बनाने का प्रयास होता दिखने लगा है. पुतिन इस बात को भली-भांति जानते हैं कि जल्द ही उनको अपने सैनिकों को वापस बुलाना होगा नहीं तो ऋणात्मक तापमान उनको बिना युद्ध के ही ख़तम कर देगा. अपनी भूमि गँवा चुके युक्रेन के लिए नदियों का जम जाना, समुद्र का जम जाना आगे बढने के लिए एक लाभदायक स्थिति हो सकता है. यदि यूक्रेन के सैनिक किसी भी तरह यह कर पाने में सफल हुए तो रूस को बहुत ही अपमानजनक ढंग से यूक्रेन से वापस आना होगा.


युद्ध को लम्बा घसीट कर पुतिन ने वही भूल कर दी है जो कभी नेपोलियन और हिटलर ने सोवियत भूमि की बर्फ में फँस कर की थी. सन 1981 में एलन फेहव ने ‘फाइटिंग दी रस्सियंस इन विंटर्स’ नाम से एक केस स्टडी की, जिसमें जर्मन सोवियत युद्ध अनुभवों, 44वी रायफल डिवीज़न के विनाश, सर्दियों में रूस में अभियानों की जटिलता पर प्रकाश डालते हुए यह माना कि ‘सायबेरिया की बर्फ सेनाओं की कब्र है.’ नेपोलियन और हिटलर दोनों के ही सोवियत अभियानों की विफलता का कारण जनरल विंटर (सर्दियों) को ही माना जाता है. निश्चित रूप से मौसम की मार दोनों ही तरफ से युद्ध की तीव्रता को कम करने को विवश करेगा किन्तु इस स्थिति में फँसना रूस के लिए बहुत शर्मिंदगी का कारण बनेगा. रूस अपने रणनीतिक लक्ष्यों में कोई भी हासिल नहीं कर सका है. उसके द्वारा न तो वो जेलेंसकी को गिराया जा सका है, न ही भूमि पर नियंत्रण रखा जा सका है और न ही नाटो फोर्सेज को यूक्रेन की मदद करने से रोक पाया है.


देखा जाये तो इस युद्ध का अंजाम महज यही दोनों देश नहीं भुगत रहे हैं बल्कि समूचा विश्व इसके अंजाम को भुगतने पर विवश है. इस युद्ध के चलते 32 लाख करोड़ रुपये की कीमत दुनिया दे चुकी है. रूस की अर्थव्यवस्था से दुगनी कीमत रूस द्वारा दी जा चुकी है. यदि अब भी कोई समझौता न हो सका तो आने वाला वर्ष और भी तबाही देखेगा. क्या ये सर्दियाँ मास्को को कोई सबक दे पाएंगी? क्या जेलेंसकी का नेतृत्व यूक्रेन को यूँ ही खड़ा रख पायेगा? क्या पुतिन अगले हिटलर साबित होंगे? इन सभी के उत्तर भविष्य के पास हैं, जो निश्चित ही यह सिद्ध करेगा कि युद्ध अहंकारों की पुष्टि का साधन नहीं है. इसलिए यथार्थवादी दृष्टि रखते हुए समझौते का प्रयास किया जाना चाहिए. यह तो साबित ही हो चुका है कि सैनिक शक्ति अपराजेय नहीं है और न ही इसके बल पर किसी को झुकाया जा सकता है. संभव है कि प्रकृति ही इस युद्ध को निर्णायक मोड़ पर ले जाये.

   

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