उमेश पाल हत्याकांड के गवाहों की खुलेआम हत्या ने उत्तर प्रदेश में अपराधियों के बेख़ौफ़ होने का दृश्य प्रस्तुत किया था. इस हत्याकांड के बाद प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भरे सदन में अपराधियों के विरुद्ध सरकार के कठोरता से खड़े होने की बात कही थी. उन्होंने सरकार की जीरो टोलरेंस की नीति पर चलने की इच्छाशक्ति को स्पष्ट रूप से जाहिर करते हुए माफियाओं को मिट्टी में मिला देने की कसम खाई थी. यह स्थिति एक प्रकार से प्रदेश सरकार और माफियाओं के बीच एक खुली जंग का ऐलान जैसा था. उमेश पाल हत्याकांड के गवाहों की हत्या में प्रदेश में आतंक का पर्याय रहे अतीक अहमद का नाम स्पष्ट रूप से सामने आया था. ऐसा माना जा रहा था कि राजनैतिक संरक्षण पाए अतीक के खिलाफ सरकार शायद ही कठोर कदम उठा सके. इस असमंजस जैसी स्थिति के साथ-साथ आमजनमानस में एक बात बहुत विश्वास के साथ चर्चा में थी कि योगी सरकार निश्चित ही जीरो टोलरेंस की नीति पर चलते हुए माफियाओं को अवश्य ही मिट्टी में मिला देगी. जनमानस का इस विश्वास के पीछे वर्तमान प्रदेश सरकार की वे कार्यवाहियाँ रही हैं, जिनमें अपराधियों की कमर तोड़ने में योगी आदित्यनाथ पीछे नहीं रहे हैं. उनके सख्त तेवर के चलते प्रशासन भी लगातार सख्ती से काम करने में लगा हुआ है. उमेश पाल हत्याकांड गवाहों की हत्या के मामले में भी कमोबेश सरकार बेधड़क होकर कार्य करती दिख रही थी.
हत्यारों को पकड़ने के लिए लगातार छापेमारी की गई. योगी सरकार की जनलोकप्रिय कार्यवाही बुलडोजर का चलना भी बराबर बना रहा. जहाँ-जहाँ से भी गुंजाइश समझ आ रही थी, वहाँ-वहाँ हत्यारों को पकड़ने के लिए प्रशासन लगातार सक्रिय बना था. इसी सक्रियता का परिणाम यह रहा कि अपराधियों को संरक्षण देने वाले, अपराधी न केवल गिरफ्तार किये गए बल्कि कुछ भगोड़े अपराधियों के एंकाकाउंटर भी हुए. इसी एंकाउंटर में अतीक का बेटा और उसका एक शूटर भी मारा गया. ये पुलिस की सबसे बड़ी कार्यवाही मानी जा रही थी. इससे पूर्व अतीक को गुजरात के उत्तर प्रदेश लाये जाने के दौरान लगातार इस आशंका को बल मिलता रहा कि पूर्व की कुछ घटनाओं की तरह गाड़ी पलटने जैसा सीन दोहराते हुए अतीक को न मार दिया जाये. तमाम सारी आशंकाएँ धूमिल हुईं और न अतीक की कार पलटी और न ही उसका एंकाउंटर हुआ. मीडिया की सतत निगरानी में अतीक की यात्रा बिना कार पलटे तो सुरक्षित ढंग से गुजर गई मगर उसी मीडिया के कैमरों और माइक के सामने अतीक और उसके भाई की हत्या कर दी गई. पुलिस सुरक्षा घेरे में मेडिकल जाँच के लिए लाए गए अतीक अहमद और उसके भाई अशरफ की हत्या कुछ सिरफिरे युवाओं ने गोली मार कर कर दी गई. यह सब उस समय हुआ जबकि अतीक और उसका भाई मीडिया के सामने बेख़ौफ़ बयानबाजी करने में लगे थे. इस हत्याकांड से एक तरफ जनमानस ने अपराधियों के मारे जाने पर राहत की साँस ली मगर दूसरी तरफ न केवल बहुत से प्रश्नों को खड़ा किया बल्कि पुलिस की कार्यशैली पर प्रश्नचिह्न लगा दिए.
इस हत्याकांड के बाद अब मीडिया में हाय तौबा मची है, तमाम राजनैतिक प्रवक्ता आपने-अपने हिसाब से बयानबाजी करते दिख रहे हैं. इस घटना को सरकारी साजिश बताया जा रहा है. पुलिस द्वारा जानबूझकर ढील रखने, गोली चलाने वाले युवाओं पर किसी तरह की जवाबी कार्यवाही न करने को सन्देश के घेरे में खड़ा किया जा रहा है. जाहिर है कि इस घटना के बाद सरकार को बहुत सारे प्रश्नों के ज़वाब यहाँ से लेकर अदालत तक देने होंगे. कानून के शासन के नाम पर सरकार और पुलिस को एक लंबा ट्रायल अभी देखना बाकी है. अपराधी इन घटनाओं से भले ही डरे हों लेकिन अपराधियों और राजनीति के गठजोड़ से पनपने वाली जमात चुप बैठने वाली नहीं है. एक लोकतांत्रिक राज्य में पुलिस को तत्काल न्याय करने का साधन बना देना उचित नहीं कहा जा सकता है; एक संविधानसम्मत प्रक्रिया के पालन द्वारा न्याय की स्थापना किसी सरकार का लक्ष्य होना चाहिये, ये बातें कहने-सुनने में बहुत आसान हैं और आदर्शवाद की परिचायक हैं किन्तु अपराधियों और राजनीतिक गठजोड़ के इस युग में इस तरह का आदर्शवाद सिर्फ और सिर्फ माफियाओं को, अपराधियों को ही मजबूत कर रहा है. इसके चलते अपराधी बेख़ौफ़ हो गए थे. उनको पता था कि पुलिस यदि जान की बाजी लगाकर भी उन्हें कानून के समक्ष खड़ा भी कर दे, तब भी कानूनी प्रक्रिया से वास्तविक न्याय मिलना सक्षम नहीं है. यदि कोई सरकार वास्तव में जनता को सुरक्षित वातावरण देना चाहे, अपराध पर नियंत्रण लगाना चाहे, माफिया को कुचलना चाहे तो क्या वास्तव में उसके पास वर्तमान परिदृश्य में कोई विकल्प शेष है?
ऐसे में सरकार क्या करे? तथाकथित रूल ऑफ लॉ की आड़ लेकर ऐसे दुर्दांत अपराधियों को पनपने दे? पुलिसबल जीवन का बलिदान देकर इन्हें पकड़े फिर इन्हीं को कानून की धज्जियां उड़ाते हुए ऐश करते देखे? छोटे, टुटपुंजिया अपराधियों को राजनीतिक शरण में माननीय बनते देखे और सलाम ठोंके? सदन, जहाँ जनता की आवाज़ उठनी चाहिए वहाँ इन माफियाओं को बचाने के लिए आवाजें उठें. पुलिस के जवान मारे जाएँ. गवाहों की खुलेआम हत्या हो जाये. अपराधी बेखौफ होकर जो चाहें करें. मीडिया के भाट बैठ कर इनकी दलाली करें. बेचारी जनता इस तथाकथित जनता के शासन में डर-डर कर जिये, इसे भी तो कानून का, न्याय का शासन नहीं कहा जा सकता.
जिस तरह से पुलिस की कतिपय कार्यवाहियाँ संदेह के घेरे में रही हैं, खुलेआम अतीक की हत्या आदि को यद्यपि तत्काल न्याय की परिपाटी कहना उचित नहीं है, फिर भी ऐसी घटनाएँ अपराध की दुर्गंध को कम करने वाली ज़रूर हैं. यह वक़्त है सभी को एक साथ बैठ कर यह सोचने का कि यदि न्याय सही तरीके से, उचित समय पर नहीं दिया जा सकता तो वह अन्याय को बढ़ने का, उसको जीतने का मार्ग देता है. अतीक-अशरफ हत्याकांड के बाद माननीय अदालतों द्वारा पुलिस और सरकार की फजीहत होने वाली है, लेकिन क्या एक बार रुक कर वह अपने गिरेबान भी झाँकने का साहस करेगी? उनकी कार्यशैली ने आम आदमी का विश्वास अदालतों से उठा दिया है. अनावश्यक देरी से लोगों का न्याय व्यवस्था पर भरोसा नहीं रह गया है. समूचे तंत्र के लगभग असफल होने के चलते जनता में पनपते आक्रोश ने इस घटनाक्रम का खुला समर्थन किया है, जो यह बताने के लिए काफी है कि लोग समझ चुके हैं कि अदालतों से न्याय की अपेक्षा जन-न्याय उचित है. एक व्यवस्था का प्रदर्शन न कर पाना, उचित निष्पादन न दे पाना तमाम इतर व्यवस्थाओं को जन्म देगा मगर इस पर सवाल पूछने वालों को इसका उत्तर भी खोज लेना चाहिए.

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