मंगलवार, 26 सितंबर 2023

भारत की साख से खिलवाड़

अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर जी-20 के सफल आयोजन के तुरंत बाद ही कनाडा के साथ भारत का सम्बन्ध वैश्विक चर्चा का विषय बना. जो समय जी-20 जैसे वैश्विक आयोजन की सफलता, उसके क्रियान्वयन, उसके उद्देश्य में निकलना चाहिए था, वह भारत-कनाडा संबंधों की चर्चा में व्यतीत हो रहा है. ऐसी चर्चा को हवा उस समय मिली जबकि इसी सितंबर में कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रुडो ने एक बयान देकर भारत की एजेंसियों पर खालिस्तानी आतंकी हरदीप सिंह निज्जर की हत्या का आरोप लगा डाला. यह आश्चर्य का विषय हो सकता है कि जिस व्यक्ति की हत्या का आरोप कनाडा के प्रधानमंत्री द्वारा लगाया जा रहा है वह कोई सभ्रांत नागरिक नहीं बल्कि एक खालिस्तानी आतंकी था, जो भारत से 1996 में भाग कर कनाडा में आ गया था. हरदीप सिंह को कनाडा की नागरिकता भी प्राप्त थी. वर्ष 2012 में  उसे पाकिस्तान में हथियारों और आईईडी धमाके करने की ट्रेनिंग दी गई थी. निज्जर को 200 हत्याओं में संलिप्त रहे गुरदीप सिंह का सहयोगी बताया जा रहा है. इसके अलावा निज्जर को कनाडा में फिरौती, केटीएफके लिए नेटवर्क बनाना, ड्रग तस्करी आदि के द्वारा भारत विरोधी गतिविधियों के लिए धन जुटाने में भी सक्रिय समझा जा रहा था. इस सन्दर्भ में 2018 में भारत सरकार द्वारा एक डोजियर कनाडा सरकार को सौंपा गया था और वर्ष 2020 में गृह मंत्रालय द्वारा UAPA के तहत उसे आतंकी भी घोषित किया गया था. 




इसके पहले नवम्बर 2014 में निज्जर के विरुद्ध भारत द्वारा इंटरपोल रेड कॉर्नर नोटिस भी जारी किया गया था. भारत द्वारा कनाडा के अधिकारियों को समय-समय पर सूचित किया जाता रहा कि निज्जर खालिस्तान टाइगर फ़ोर्स, जो एक प्रतिबंधित आंतकी संगठन है, को कनाडा की ज़मीन से चला रहा है. कनाडा सरकार को इसके लिए भी आगाह किया जा चुका था कि निज्जर का पासपोर्ट फ़र्ज़ी है और उसने गलत तरीके से नागरिकता प्राप्त की है. इसके बाद भी कनाडा सरकार द्वारा उसे उड़ान से प्रतिबंधित करने के अतिरिक्त कुछ नहीं किया गया. निज्जर खालिस्तान आंदोलन को निरंतर आईएसआई के सहयोग और निर्देश पर चला रहा था. भारतीय दूतावासों पर हमलों, राजनयिको को धमकियां जैसे कार्यों में वह संलिप्त रहा मगर कार्यवाही करने के बजाय ट्रुडो सरकार उसे संरक्षण देती रही.


गौर करने योग्य है कि 19 सितंबर तक कनाडा की सरकार न तो निज्जर के हत्यारों को पहचान सकी और न ही इस मामले में मुखर हुई. जी-20 सम्मेलन के पश्चात जस्टिन ट्रुडो अचानक ही भारत के विरुद्ध आक्रामक हो उठे और हाउस ऑफ कॉमन्स में सीधे-सीधे भारत की एजेंसियों को आरोपित कर बैठे. अंतर्राष्ट्रीय मामलों में बयान देने से पहले ट्रुडो को इतनी समझ होनी चाहिए थी कि किसी राष्ट्र को सीधे-सीधे आरोपित करने से पहले पुख्ता सबूत दिए जाएं. ट्रुडो घरेलू राजनीति के दबाव के चलते अथवा जी-20 सम्मेलन के दौरान आतंकियों को संरक्षण देने के मुद्दे पर भारत के कठोररवैये के कारण न सिर्फ सम्मेलन में अलग-थलग पड़े बल्कि इससे उनको उनके ही देश में आलोचना का शिकार होना पड़ा. इस दबाव और कुंठा से उबरने के लिए उन्होंने भारत को निज्जर हत्याकांड में आरोपित कर दबाव बनाने का प्रयास किया.


कनाडा जो जी-7 का सदस्य है,अर्थव्यवस्था में दृढ़ है, अमेरिका का घनिष्ठ सहयोगी है, आसूचना के एक मजबूत नेटवर्क 5-आई का सदस्य है. ऐसे में बिना सबूत के ही भारत पर आरोप लगा रहा है. यह और कुछ नहीं बल्कि जी-20 की सफलता के पश्चात् भारत की वृहद अंतर्राष्ट्रीय भूमिका के दावे को कमज़ोर करने की रणनीति मात्र है. भारत सयुंक्त राष्ट्र संघ के विस्तार और वीटो की माँग कर रहा है. जी-20 सम्मेलन में अफ्रीकी यूनियन को शामिल कर वह तृतीय विश्व की आवाज़ बन उभरा है. यह पश्चिमी देशों के लिए एक अप्रिय स्थिति है. ऐसी स्थिति में ब्रिटेन के भारत की तरफ झुकाव ने इनकी चिंताओं को और भी बढ़ा दिया है. असल में आज अमेरिका सहित अन्य देशों को चीन के विरुद्ध भारत एक शक्तिशाली विकल्प दिख रहा है. ऐसे में उन्हें भारत की आवश्यकता तो है पर एक ऐसे भारत की जो वैश्विक शक्तिक्रम में नीचे भी रहे और सयुंक्त राष्ट्र में उनका मोहताज़ भी रहे. इसके लिए खालिस्तान के मुद्दे पर भारत को उलझाना उनको सरल लगा.


जस्टिन ट्रुडो मोहरा बन कर पश्चिमी शक्तिओं की उस सोच को सामने रख रहे हैं जो पूरी तरह से भारत को अन्तर्राष्ट्रीय संधियों के उल्लंघनकर्ता, सम्प्रभुता का सम्मान न करने वाला, मानवाधिकारों का दोषी सिद्ध कर  भारत की सयुंक्त राष्ट्र संघ की स्थायी सदस्यता के दावे को कमज़ोर करने के लिए रची गई है. फ्रीडम ऑफ स्पीच, रूल ऑफ लॉ, डेमोक्रेटिक वैल्यूज जैसे शब्दों के पीछे जस्टिन ट्रुडो अपनी निम्न स्तरीय राजनीति और अपरिपक्व सोच को छुपा नहीं सकते. खालिस्तानी आतंकियों को शरण देकर वे पाकिस्तान जैसे दिख रहे हैं. पाकिस्तान का हश्र उनके सामने हैं, उन्हें उससे कुछ सीखने की ज़रूरत है. यहाँ विचारणीय है कि खालिस्तान के लिए जनमत संग्रह करवाने वाले क्यूबेक के लिए जनमत संग्रह क्यों नहीं करवाते? कानून के शासन का दम भरने वाले आतंकियों के लिए सुरक्षित गढ़ क्यों बने हुए है? अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर भारत के विभाजन की चाह रखने वालों को पालना किस संप्रभुता की मर्यादा का पालन है?


वॉर अगेंस्ट टेरर के नाम पर 2001 से 2021 तक अमेरिका अफगानिस्तान में बैठा रहा. इराक में सद्दाम हुसैन की सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए 2003 से 2011 तक इराक में बैठा रहा. यह साबित करता है कि आतंकवाद के मुद्दे पर पश्चिमी देशों की कथनी और करनी में अंतर है. भारत सरकार निज्जर की हत्या में अपनी किसी भी भूमिका से इंकार कर चुकी है. अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को ट्रुडो से यह अवश्य पूछना चाहिए कि आतंकवाद को संरक्षण देने की यह रणनीति उन्हें किधर ले जाएगी? भारत अपनी सुरक्षा करने में सक्षम है फिर चाहे वह संकट सीमा पर हो या अन्य किसी प्रकार का. खालिस्तान भारत में तो नहीं बनेगा, हाँ, ट्रुडो चाहें तो उसे कनाडा की धरती पर बनवा सकते हैं. सुरक्षा का नैसर्गिक अधिकार प्रत्येक राष्ट्र को प्राप्त है और उस पर आने वाले हर खतरे से निपटने के लिए हमारा भारत हमेशा तैयार है.


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