हमारे पड़ोसी देश बांग्लादेश
में जो कुछ विगत दिनों घटित हुआ वो भारत के लिए बेहद चिंताजनक है. बांग्लादेश की प्रधानमंत्री
को इस्तीफा देकर देश छोड़कर भारत आने को विवश होना पड़ा. माह जून से ही बांग्लादेश में
लगातार हिंसक प्रदर्शन चल रहे हैं, जिनमें 300 लोग मारे जा चुके हैं. मरने वालों में अधिकांश ढाका यूनिवर्सिटी के
छात्र हैं. इस हिंसक आंदोलन के कारण एक चुनी हुई सरकार जा चुकी है और उसके नेता को
देश छोड़ना पड़ा. हिंसक प्रदर्शन में शेख मुजीब की प्रतिमा तक जनता के निशाने पर है.
प्रधानमंत्री आवास पर जनता का कब्ज़ा है और चार लाख प्रदर्शनकारी ढ़ाका की सड़कों पर हैं.
सेना तख्तापलट कर एक बार फिर सत्ता पर नियंत्रण कर चुकी है.
इन स्थितियों के पीछे
बांग्लादेश उच्च न्यायालय का वो फैसला है जिसमें 2018 में सरकारी नौकरियों में रद्द किए गए आरक्षण को फिर
से बहाल कर दिया गया. इस फैसले से सरकारी नौकरियों में आरक्षण की सीमा को बढ़ा कर 56 प्रतिशत कर दिया गया. इसमें 30 प्रतिशत आरक्षण मुक्ति योद्धा के नाम पर 1971 के स्वतंत्रता सेनानियों के परिवारों को देने
की बात कही गई. यही आरक्षण रोष का प्रमुख कारण बना, जिसके इतने गंभीर परिणाम सामने
आए. इस फैसले के विरुद्ध छात्रों में तीव्र प्रतिक्रिया हुई और ढाका मार्च का आह्वान
किया गया. आंदोलन की अगुआई ढाका यूनिवर्सिटी के नाहिद इस्लाम नामक छात्र ने की और 8 जुलाई से देश में तालाबन्दी की घोषणा की.
जुलाई से आंदोलन ने
गति पकड़ ली और देश भर से प्रदर्शनकारी ढाका में इकट्ठे होने लगे. शेख हसीना के नेतृत्व
वाली अवामी लीग की सरकार ने आंदोलन को दमन करने का प्रयास किया. बड़े पैमाने पर छात्रों
की गिरफ्तारियां हुई और बल प्रयोग किया गया. आन्दोलनकारी हसीना के इस्तीफे की मांग
पर अड़ गए. हसीना सरकार ने यद्यपि सुप्रीम कोर्ट में हाइकोर्ट के फैसले के विरुद्ध अपील
की जिस पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इस आरक्षण को निरस्त भी कर दिया,
लेकिन तब तक देर हो चुकी थी. सरकार द्वारा
प्रदर्शनकारियों से निपटने के गलत तरीकों ने अवामी लीग की ज़मीन सरका दी. पार्टी विरोधी
दल, जमात के स्लीपर सेल,
आईएसआई तब तक आंदोलन में घुस चुके थे.
छात्रों का आंदोलन जो आरक्षण की चिंगारी से भड़का अब वो किसी और ही दिशा में किसी और
लक्ष्य के लिए कार्य कर रहा था. शेख हसीना की चुनी हुई सरकार को निर्वासित कर सेना
और कट्टरपंथियों ने सत्ता पर नियंत्रण लिया. ये सब कुछ वैसे ही हुआ जैसे कुछ समय पहले
अफगानिस्तान, श्रीलंका, म्यांमार में हुआ था.
यह आंदोलन एक वैश्विक
मोडस ऑपरेंडी के अनुसार है, ठीक वैसे ही जैसे अमरीका में ट्रंप के चुनाव हारने के बाद,
भारत में किसान विरोधी आंदोलन और सीएए
के विरोध के समय देखा गया. अंतर सिर्फ इतना है कि भारत और अमेरिका में प्रजातन्त्र
की जड़ें गहरी हैं और सेना सत्ता पर नियंत्रण का लक्ष्य नहीं रखती बल्कि नागरिक नियंत्रण
में कार्य करने की अभ्यस्त है. अन्यथा अफगानिस्तान, म्यांमार, पाकिस्तान, मालदीव,
श्रीलंका और बांगलादेश की भांति यह प्रयोग
यहां भी सफल होता. बांग्लादेश में फिलहाल शेख हसीना को आर्मी ने डील करके सेफ पैसेज
दे दिया है, जिससे वो भारत आ सकी. ऐसा ही कुछ श्रीलंका और अफगानिस्तान में किया गया था.
यहाँ कहने का आशय यह है कि ये सारा घटनाक्रम और कार्यशैली संयोगवश एक जैसे नहीं हैं
बल्कि इनके गहरे खतरनाक अर्थ हैं. भारत के चारों तरफ सभी पड़ोसी देशों में ये सब किया
जा रहा है, भारत के राज्यों- उत्तर-पूर्व
एवं पश्चिम बंगाल में भी ये इस्लामिक आव्रजन और पिछले कुछ समय से मणिपुर में चल रही
घटनाएं किसी एक पटकथा के भाग हैं, जिन्हें धीरे-धीरे लागू करने का प्रयास किया जा रहा
है.
दरअसल बांग्लादेश में
कोटा सिस्टम तो एक बहाना ही है. जब फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने निरस्त कर दिया तो आंदोलन
भी समाप्त हो जाना चाहिए था पर ऐसा नहीं हुआ. इसके पीछे और भी वृहद स्ट्रेटेजी काम कर रही
है. भारत के चारों तरफ सरकारों का पतन होना और सेना के हाथों में सत्ता नियंत्रण
होना यूं ही नहीं हो रहा. मणिपुर के बहाने भारत में भी जनसंघर्ष के द्वारा सत्ता बेदखली
का प्रयोग किया जा रहा है. उत्तर-पूर्व में ये घटना गम्भीर खतरे पैदा करेगी. उनसे निपटने
की कोशिश में ऐसे ही उबाल हमारी सड़कों पर भी देखने को मिलेंगे. इस्लामिक कट्टरपंथ का
जिन्न पश्चिम एवं मध्य एशिया के बाद बांग्लादेश के बहाने पूर्व एशिया में घुस आया है.
भारत के लिए ये सभी
स्थितियां चिंताजनक हैं क्योंकि न सिर्फ सुरक्षा बल्कि व्यावसायिक दृष्टि से भी बांग्लादेश
का पतन हमारे हितों के विरुद्ध है. यदि कट्टरपंथी ताकतवर होंगे तो वृहत्तर इस्लामिक
बांग्लादेश की योजना पर कार्य करेंगे, जिससे हमारी उत्तर-पूर्वी सीमा दबाव में आ जायेगी.
आव्रजन के बहाने इस्लामिक आबादी को भारत में ठेला जाएगा जो अन्ततः संघर्ष में परिणित
होगा. इन शरणार्थियों के नाम पर आने वाले मुस्लिमों को रोकने की कोशिश में सरकार को
हमारे देश के भीतर से ही चुनौतियां दी जाएगी. हमारी सड़कों पर भी इस्लामी जिन्न खून
की होली खेलने की कोशिश करेगा. भारत को बेहद सतर्क और सधे हुए तरीके से इस समस्या से
निपटने की आवश्यकता है. देश को अपने हितों की रक्षा के लिए सतर्क रहना होगा.

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