विगत तीन वर्षों से चल रहे रूस
यूक्रेन युद्ध में भयानक विनाश और जनहानि के बाद भी किसी प्रकार की निर्णायक
स्थिति नहीं बन सकी है. इस युद्ध में यूक्रेन को झुकाने के न केवल रूस के बल्कि
विश्व के बहुत सारे देशों के अपने-अपने अनुमान ध्वस्त हो गए. जल्द से जल्द यूक्रेन
को झुका देने के जिस विश्वास के साथ रूस ने युद्ध आरम्भ किया था आज वह खुद एक जड़
स्थिति में फँस गया है. यद्यपि रूस ने यूक्रेन की बहुतायत भूमि पर अपना कब्जा जमा
रखा है तथापि वह उसे झुका नहीं पा रहा है. भूमि और जनसंख्या पर नियंत्रण स्थापित
कर रूस भविष्य की किसी भी शांति वार्ता के लिए अपना पक्ष दृढ़ कर रहा है, जिससे
उसकी शर्तों पर समझौते को लागू किया जा सके. यूक्रेन के राष्ट्रपति ज़लेंसकी इस रणनीति को
समझ रहे हैं, इसके फलस्वरूप यूक्रेन के वर्तमान आक्रमणों को रूस की इस रणनीति के
काउंटर अटैक के रूप में हम देख सकते है.
वर्तमान में
यूक्रेन द्वारा अपनी युद्ध नीति में बदलाव कर उसको आक्रामक रणनीति के रूप में अपना
चुका है. एक तरफ तरफ वह ड्रोन हमलों से कम हानि की स्थिति पर रूसी शहरों को
निशाना बनाने का प्रयास कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ वह रूसी ज़मीन पर कब्ज़ा करने का
भी प्रयास कर रहा है. क़ुर्स्क, खारकीव, डोनेस्क में दोनों
देशों द्वारा ज़मीन पर कब्जे के प्रयास इसी रणनीति का हिस्सा हैं. फिलहाल यूक्रेन
की 20 प्रतिशत भूमि पर रूस का
नियंत्रण है. इसके चलते लगभग 3.5 मिलियन जनसंख्या रूसी आधिपत्य में रहने को विवश है. इसके सापेक्ष यूक्रेन
द्वारा रूस के शहर क़ुर्स्क के 1200 वर्ग किमी क्षेत्र पर कब्जा करने में आश्चर्यजनक रूप से सफलता प्राप्त की है किन्तु
उसे कई स्थानों से पीछे भी हटना पड़ा है.
रूस-यूक्रेन युद्ध
में रूस को मनचाही सफलता न मिलने के बाद अब उसके द्वारा एक अलग तरह की रणनीति
अपनाई गई है. रूस द्वारा नाटो देशों को उलझाने के लिए पश्चिम एशिया, ईरान, सीरिया आदि में उलझाव बढाने का प्रयास किया जा रहा
है, जिससे नाटो देशों का ध्यान
इन क्षेत्रों की तरफ जाने से उनके हथियारों और संसाधनों से यूक्रेन को वंचित किया
जा सके. वर्तमान में इस्राइल, ईरान, सीरिया में जो कुछ
भी हो रहा है वह इन्हीं भू-राजनीतिक समीकरणों को साधने का प्रयास है. रूस इस बात
को भली भांति समझता है कि जब तक नाटो से यूक्रेन को हथियारों की आपूर्ति होती
रहेगी, तब तक तबाह होते जा रहे यूक्रेन को समझौते की मेज पर लाया नहीं जा सकेगा. रूसी राष्ट्रपति
पुतिन नाटो देशों पर दबाव और उलझाव बढाना चाहते हैं, जिससे यूक्रेन की वित्तीय और हथियारों की मदद रोकी जा सके.
उधर अमेरिका में डोनाल्ड ट्रंप की वापसी भी पुतिन की नीति को संबल देने वाली है.
अमेरिका 'दूसरों के युद्ध न लड़ने की नीति' पर वापस आ सकता है. ट्रम्प पहले ही यह स्पष्ट
कर चुके हैं कि इस युद्ध को बंद होना चाहिए अब ये बोझ अमेरिका नहीं उठाना चाहता. नाटो देश भी संशय की
स्थिति में हैं. वे भी चाहते हैं कि यूक्रेन मोलभाव करने की स्थिति में आ जाये तब
समझौते की बात हो. लेकिन इस तरह की तमाम भू-राजनीतिक उठापटक और विनाश के बाद भी शांति की राह
कठिन है. पुतिन क्रीमिया और पूर्वी यूक्रेन के हिस्सों से नहीं हटेंगे. वह इन
हिस्सों पर रूसी नियंत्रण को स्वीकार करवाना चाहेंगे. संधि की दूसरी बड़ी शर्त
यूक्रेन का नाटो से हटना होगा जो शायद एक बार संभव भी हो जाये किंतु यूक्रेन अपनी
संप्रभुता से कैसे समझौता करेगा? पुतिन के इस संदेश कि किसी भी समझौते में वास्तविक भौगोलिक स्थिति को नजरअंदाज
किया जा सकता, उनकी मंशा को स्पष्ट करता है. यदि अमरीका और उसके दबाव में नाटो देश
यूक्रेन को दी जा रही मदद बन्द करेंगे तो यूक्रेन को झुकना ही होगा. इसी कारण वह भी रूसी
भूमि पर कब्जे की लड़ाई लड़ रहा है जिससे अपनी स्थिति को कुछ मोलभाव करने योग्य बना
सके.
वैश्विक समुदाय
में भू-राजनीतिक स्थिति क्या है, रूस, यूक्रेन, अमेरिका सहित नाटो देशों की
अपनी-अपनी रणनीति क्या है, इस युद्ध से कौन लाभ, हानि की स्थिति में होगा इसका आकलन तमाम महाशक्तियाँ, रणनीतिकार, रक्षा विशेषज्ञ विगत तीन वर्षों से करते
आ रहे हैं. वर्तमान वैश्विक सन्दर्भों में शांति आवश्यक है. युद्ध अंतहीन नहीं हो
सकते. ऐसी स्थिति में रूस और यूक्रेन के बीच संधि होना अत्यंत आवश्यक है. इस
आवश्यकता के बीच दुनिया को यह निश्चित करना होगा कि कहीं इन दोनों देशों की संधि
वर्साय की संधि न साबित हो. स्थाई शांति के लिए सम्मानजनक समझौता होना चाहिए.
सभी पक्षों को यह याद रखना होगा कि शक्ति के बल पर न्यायपूर्ण अधिकारों को अनंतकाल
के लिए कुचला नहीं जा सकता.

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