शुक्रवार, 19 दिसंबर 2025

हिज़ाब कांड

 नीतीश कुमार द्वार एक महिला के हिज़ाब खींचे जाने की घटना राजनीतिक बयानबाजी और सोशल मीडिया की एक प्रमुख घटना बनी हुई है। कई तरह की प्रतिक्रियायें सामने आ रहीं जिनमे से कुछ बेहद असभ्य और अशालीन हैं। मैं एक महिला हूँ और किसी भी रूप में पर्दे को उचित नहीं मानती क्योंकि पर्दा महिलाओं के सामाजिक विकास का सबसे बड़ा अवरोध है। पर्दा प्रथा ने महिलाओं को मात्र उनकी लैंगिक पहचान के कारण यौन संतुष्टि का एक साधन बना कर निरन्तर शोषण किया है। फिर भी एक राज्य के मुख्यमंत्री हो कर भी नीतीश कुमार ने जो आचरण किया उसे सही नही कहा जा सकता। ये तो कुछ वैसे ही हुआ कि किसी की पोशाक हमें पसंद न आये तो जबरन सभा मे उतरवाने लगेंगे। यदि सुरक्षा एवं पहचान की जानकारी आवश्यक थी तो ये प्रोटोकॉल मंच पर आने से पहले निपटा लिए जाने थे। भले ही हिज़ाब मजहबी गुलामी का प्रतीक हो, किसी महिला की धर्मिक,सामाजिक मजबूरी विवशता का प्रतिबिंब हो फिर भी जबरन उसे घसीट कर किसी और के द्वारा उतारने की कोशिश उचित नहीं दिखती। गुलामी की बेड़िया स्वयं काटनी होती हैं। आपको वो अवसर और वातावरण बनाने की आवश्यक्ता है जहाँ सामाजिक सुधार स्वयं पीड़ितों के ह्रदय में जगह बना लें। ध्यान रहे जबरन कोई सामाजिक सुधार नहीं किये जा सकते।अगर किये जा सकते तो जागरूकता की कोई आवश्यकता ही नहीं होती। मुस्लिम समाज, हिन्दू समाज से सामाजिक रूप से अधिक पिछड़ा और दकियानूसी है इसी कारण सामाजिक सुधारों की राह अधिक कठिन और सुस्त है। इस सुस्त प्रक्रिया को निरन्तर बनाये रखना है जिससे धीमा ही सही बदलाव होता रहे। वैसे भी महिलाओं की प्रगति तो दो पीढ़ी के बाद दिखती है। मेरी दादी और मेरी जीवन शैली में बहुत अंतर दिखता है जिसकी नींव कभी दो पीढ़ी पहले ही मेरी दादी और मां द्वारा डाली गई। मुस्लिम समाज की महिलाएं भी ये बेड़ियां तोड़ देंगी,आज़ादी की हवा में खुलकर सांस लेगी जरा उनके हाथ और जेब मजबूत तो होने दीजिए। ये पहली पीढ़ी है जो मजबूरी में हिज़ाब में डॉक्टर और इंजीनियर बन रही है।इनकी बेटियों और उनकी बेटियों के आने तक बदलाव दिखेगा थोड़ा धैर्य रखें। आपका अशालीन, उतावला व्यवहार कहीं उन बेटियों को वापस घरों में कैद न कर दें जिन्हें कम से कम पढ़ने का मौका तो मिला है।

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