विगत कुछ समय से चल रहे मानसून सत्र में एक बात दुखी करती है, तमाम महत्वपूर्ण मुद्दों और विधेयकों पर उस प्रकार से चर्चा नही हुई जैसे होनी चाहिए थी। माना सदन में सरकार संख्या बल में बेहद मजबूत स्थिति में है किंतु किसी भी बिल को इतनी आसानी से पास करा लेना ये दर्शाता है कि विपक्ष भी होमवर्क नही करता। माना विपक्ष बिल को गिराने की स्थिति में नही है किंतु क्या विपक्ष किसी विधेयक जो पास होकर कानून बन जायेगा उसके सभी नैतिक और कानूनी पक्षों को उस प्रकार से सदन में रख पाता है, जैसे उसे रखना चाहिए। याद कीजिये श्री सोमनाथ चटर्जी,श्री प्रणव मुखर्जी, श्री अटल बिहारी वाजपेयी, श्रीमती सुषमा स्वराज जैसे सदस्यों को, जो सरकार के पसीने छुड़वा देते थे।
आज के ये वातानुकूलित पीढ़ी के सांसद न ही संसद में शिष्ट और प्रभावशाली तरीके से सरकार की कमियां रखने में सक्षम है और न ही उनमें इतना माद्दा है,कि सरकार की तानाशाही के सामने जे.पी.की तरह एक दीवार बन कर खड़े हो सकें। संसद की ये पीढ़ी न तो कलम से मजबूत है और न ही सर पे धूप खा सकती है।
ये बिना लड़े ही हथियार डालने वाले लोग हैं।
सत्ता को आरोपित करने वालों को खुद का मूल्यांकन भी करना चाहिए।
विपक्ष में हताशा अधिक है और सिर्फ सत्ता चाहते हैं। ऐसे में स्वाभाविक है कि कदम डगमग करेंगे।
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