वैश्विक समाज जिस
तेजी से विकास की राह पर अग्रसर है, उसी तेजी से सामाजिक ढाँचे में, सामाजिकता में, रिश्तों में नकारात्मकता देखने को मिल रही है. जाते हुए वर्ष के अंतिम
महीने में रिश्तों के, संबंधों के मध्य की बुनियाद को, उनके
मध्य के विश्वास को, मर्यादा को झकझोरने वाला उदाहरण देखने
को मिला. एक मामला दिसम्बर माह के पहले सप्ताह में भोपाल न्यायालय के समक्ष आया.
इस मामले में एक दम्पत्ति द्वारा तलाक के लिए मुकदमा किया गया. यहाँ तलाक का मामला
झकझोरने वाला नहीं और न ही इसमें कुछ अजब सा है. इसमें कुछ अजीब सा जुड़ा हुआ एक
दूसरा तथ्य है, एक अचंभित कर देने वाली माँग का होना है. तलाक के इस मुकदमे में वादी
पत्नी की माँग कुछ अजीब कही जा सकती है. वादी पत्नी ने न्यायालय से आग्रह किया कि तलाक
से पहले माननीय अदालत उसके पति को स्पर्म डोनेट करने का आदेश दे, जिससे वह अपना आई.वी.एफ. ट्रीटमेंट जारी रख सके
और सन्तान प्राप्त कर सके. आई.वी.एफ. एक प्रकार की चिकित्सकीय प्रक्रिया है या
कहें कि प्रजनन सम्बन्धी उपचार है, जिसकी सहायता से निःसंतान दम्पत्ति संतान
प्राप्त कर सकते हैं.
तलाक का यह मुकदमा
हजारों की संख्या में चल रहे मुकदमों की तरह बिना चर्चा में आये अपने परिणाम को
प्राप्त कर जाता मगर इसके साथ जुड़ी माँग ने इसे चर्चा का विषय बना दिया. इस मुकदमे
में की गई माँग ने कुछ ऐसे प्रश्नों पर सोचने को विवश किया है जो आज की एक सच्चाई बनते
जा रहे हैं. आज समाज की एक कड़वी सच्चाई विवाह की बुनियाद का हिल जाना है. समाज में
वैवाहिक संबंधों में गिरावट और तलाक के मामलों में लगातार बढ़ोत्तरी देखी जा रही है.
आज विवाह विच्छेद सिर्फ उच्च परिवारों का मसला नहीं है, यह समस्या मध्यम वर्ग और प्रत्येक
वर्ग में देखने को मिल रही है. इसका एक बड़ा कारण महिलाओं का अपने अधिकारों के प्रति
जागरूक होना और अपने ही परिवार में हाशिये पर रह कर शोषण न सहने की सोच है. शिक्षा, कैरियर,
रोजगार, व्यवसाय, स्वतंत्र व्यक्तित्व
के चलते महिलाओं में उत्पन्न महत्वाकांक्षी सोच के कारण उनके द्वारा कई बार स्थापित
सामाजिक मान्यताओं के विपरीत जाना भी वैवाहिक संबंधों की विफलता का, तलाक का एक कारण बना है. इसके अलावा विवाहेतर संबंध भी तलाक का एक बड़ा कारण
बन रहे हैं.
यह देखने में आया
है कि समाज में आश्चर्यजनक रूप से विवाह विच्छेद को सामाजिक स्वीकार्यता तो प्राप्त
होती जा रही है किंतु परिवार की पारंपरिक परिकल्पना में परिवर्तन नहीं दिख रहा है.
आज की स्थिति में पति-पत्नी दोनों ही विवाह से जुड़े लाभ तो चाहते हैं किंतु वैवाहिक
सम्बन्ध जिस निष्ठता और समर्पण से मजबूत होता है, उसे कोई नहीं निभाना चाहता. इसी
कारण से कई बार विवाह उस सामाजिक परिपाटी को निभाने के लिए कर लिया जाता है जो एकाकी
जीवन को स्वीकार नहीं करती. विचारणीय है कि ऐसे अधूरे समर्पण और दबाव से होने वाले
विवाह सुखद कैसे हो सकते हैं?
इसके अलावा एक दूसरी तरह की स्थिति यह भी देखने को मिल रही है कि विवाह न करने वाले अथवा
एल.जी.बी.टी. समुदाय के लोग भी ऐसे ही परिवार की चाह रखते हैं जिसमें बच्चे हों.
भोपाल उच्च न्यायालय
के समक्ष आये तलाक के मामले में पति के स्पर्म को सुरक्षित रखने वाली माँग उसी सोच
को उजागर करती है. इस मामले में एक दंपत्ति को विवाह टूटने से गुरेज नहीं है किंतु वादी
पत्नी जिस पति से तलाक लेना चाहती है, उसी पति की संतान को आई.वी.एफ. के द्वारा जन्म
देना चाहती हैं. अब ऐसे में अनेक प्रश्न उठते हैं कि क्या जिससे कोई लगाव ही शेष न
बचा हो, जिसके साथ संबंध विच्छेद
होने की कगार पर हैं उसकी संतान क्यों चाहिए? क्या
पुरुष या स्त्री सिर्फ सन्तान पैदा करने की मशीन हैं? क्या सामाजिक दबाव के लिए एक परिवार बनाया जाना चाहिए
और ऐसी स्थितियों में जन्म पाए बच्चे का भविष्य क्या है?
तमाम तरह के आई.वी.एफ.
सेंटर्स ऐसे पारंपरिक और गैर-पारम्पारिक यौन व्यवहार वाले व्यक्तियों के लिए एक विकल्प
बन कर खड़े है, जो अपनी सुविधाओं
और उत्पादों को बड़ी कीमत पर ग्राहकों को बेच रहे हैं. तमाम बड़े सेलिब्रिटीज जो इसी
श्रेणी में आते हैं इन सविधाओं (सेरोगेसी, स्पर्म/ओवम डोनेशन) के द्वारा सन्तान प्राप्त कर चुके हैं. किसी सेलिब्रिटी
द्वारा ऐसा कदम उठाया जाना प्रश्नों को रोक नहीं देता है. क्या समाज के मुँह पर ताला
लगाने के लिए ही सन्तान को जन्म दिया जाना चाहिए, यह प्रश्न अपनी जगह है. हो सकता है
एक सन्तान किसी के एकाकी जीवन, सामाजिक दबाव को कम कर दे लेकिन उस सन्तान के भविष्य, उसके व्यक्तित्व पर इनका कितना और किस प्रकार का प्रतिकूल
प्रभाव पड़ेगा इस पर भी विचार किया जाना चाहिए. बच्चे के पालन-पोषण के लिए एक स्वस्थ
परिवार की आवश्यकता से इनकार नहीं किया जा सकता है. संतान न तो कोई खिलौना है जिसे
मन बहलाने के लिए किसी भी तरह से दुनिया मे लाना है और न ही अहं की पुष्टि का साधन
है.
फिलहाल अदालत ने तलाक
के इस मुकदमे को रोक रखा है. इस मुक़दमे का और इसमें की गई माँग पर न्यायालय का
निर्णय क्या रहता है, यह
तो भविष्य के गर्भ में है किन्तु बेहतर यही है कि आज की पीढ़ी यह समझे कि विवाह की मर्यादा
में रह कर ही वह घर बनता है जिसके आँगन में बच्चों को सुंदर भविष्य दिया जा सकता है.

गंभीर विषय उठाया गया है. वर्तमान भागते समाज की त्रासदी है यह कि वह सबकुछ संभालने का दम भरता है और अपना ही घर संभाल नहीं पा रहा है.
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