विगत कुछ दिनों से
मालदीव और भारत के मध्य सोशल मीडिया पर एक पर्यटन युद्ध सा चल रहा है. पहले पहल तो
सोशल मीडिया पर चल रहा यह युद्ध जैसा माहौल प्रधानमन्त्री नरेन्द्र मोदी के आकर्षण
के वशीभूत एक तरह की ‘पिक्चर वॉर’ जैसा समझ आ रहा रहा था किन्तु जब इस युद्ध जैसी
स्थिति में मालदीव के कुछ मंत्रियों द्वारा खुलेआम भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र
मोदी पर टिप्पणी की गई तो लगा कि ये सोशल मीडिया का उद्वेग मात्र नहीं है वरन इससे
कहीं अलग एक तरह का कूटनीतिक युद्ध ही है. जो अब दोनों देशों के कूटनीतिक संबंधों पर भी प्रभाव
डालता दिख रहा है.
दरअसल इसी वर्ष जनवरी
के प्रथम सप्ताह में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा केन्द्रशासित प्रदेश
लक्षद्वीप की यात्रा की गई. ‘वोकल फॉर लोकल’ की नीति और उद्देश्य के चलते उनका प्रयास क्षेत्रीयता को
बढ़ावा देने का रहता है. राज्य की, सम्बंधित क्षेत्र की
विशेषता को उनके द्वारा प्रोत्साहित करने का कार्य सतत रूप में किया जाता रहता है.
इसी कड़ी में क्षेत्रीय पर्यटन को प्रोत्साहन देने के लिए प्रधानमंत्री द्वारा लक्षद्वीप
के समुद्री तटों की, वहाँ की प्राकृतिक सुन्दरता और पर्यटन गतिविधियों
से सम्बंधित कुछ फोटो सोशल मीडिया पर डाले गए. लक्षद्वीप के नैसर्गिक सौन्दर्य
वाली इन फोटो का और प्रधानमंत्री की इस पहल का भारतीय समर्थकों द्वारा खुले हृदय
से स्वागत किया गया. उत्साही भारतीयों द्वारा अपने देश में इस तरह के नैसर्गिक
सौन्दर्य से भरे स्थलों के समर्थन में अन्यत्र पर्यटन पर जाने के स्थान पर
लक्षद्वीप जाने जैसे विचार सोशल मीडिया पर खुल कर व्यक्त किये गए.
प्रधानमंत्री की
फोटो और भारतीयों की पर्यटन सम्बन्धी पोस्ट आने के बाद मालदीव के कुछ मंत्रियों द्वारा
आपत्तिजनक नस्लीय टिप्पणियाँ भारतीय प्रधानमंत्री के लिए की गईं. इन टिप्पणियों को
सीधे-सीधे भारतीयता के विरुद्ध, भारत के विरुद्ध समझा गया और इसके पश्चात सोशल मीडिया
पर एक युद्ध सा आरम्भ हो गया. इस युद्ध जैसे वातावरण में भारतीय समर्थकों द्वारा बायकॉट
मालदीव नाम से एक मुहिम छेड़ दी गई. कुछ पर्यटन सम्बन्धी कंपनियों द्वारा मालदीव की
बुकिंग रद्द कर दी गईं. पर्यटन के उद्देश्य से मालदीव जाने की योजना बनाने वाले
बहुतायत भारतीय इसी के चलते दूसरे विकल्पों का चयन करते नजर आने लगे हैं. बहुत से
भारतीयों द्वारा मालदीव के स्थान पर लक्षद्वीप जाने की सलाह भी पर्यटकों को दे
डाली. निश्चित ही यह किसी न किसी रूप में मालदीव पर्यटन को झटका लगने जैसा ही है. हालाँकि
भारत ओर से तीव्र प्रतिक्रिया मिलने के पश्चात मालदीव सरकार द्वारा प्रधानमंत्री मोदी
पर आपत्तिजनक टिप्पणी करने वाले तीनो मंत्रियों मरियम शिउना, अब्दुल्ला महज़ूम, मलासा शरीफ को बर्खास्त कर दिया गया है. मालदीव के पूर्व
राष्ट्रपति इब्राहिम मुहम्मद सालेह द्वारा भी इसकी निंदा की गई है.
मालदीव हमारा सामुद्रिक
पड़ोसी देश है, जो भारत के लक्षद्वीप राज्य से मात्र 70 नॉटिकल मील दूर है. मालदीव की आय का एक बहुत बड़ा स्रोत
पर्यटन है, जिसमें सबसे ज्यादा
पर्यटक भारतीय होते हैं. भारत से करीब दो लाख से ज्यादा लोग हर साल मालदीव की यात्रा
करते हैं. मालदीव में उपस्थित भारतीय उच्चायोग के आँकड़ों के अनुसार वर्ष 2022 में
2.41 लाख भारतीय पर्यटकों ने और वर्ष 2023 में 2.09 लाख भारतीय पर्यटकों ने मालदीव
की यात्रा की है. ऐसे में यदि भारतीयों द्वारा, यहाँ के पर्यटकों द्वारा देश के लक्षद्वीप जैसे द्वीपों को पर्यटन
के लिए प्रोत्साहित किया जाने लगा तो निश्चित ही भारत से मालदीव जाने वाले लोगों की
संख्या में कमी आएगी. इसका विपरीत असर मालदीव के पर्यटन पर पड़ेगा. इसी आशंका से वहाँ
के मंत्री भड़के हुए हैं और इसे देखते हुए मालदीव के भारत विरोधी तंत्र द्वारा इस
तरह का विवाद खड़ा किया गया.
वैसे यदि मालदीव
में भारत विरोधी माहौल को देखा जाये तो ऐसा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा
लक्षद्वीप की फोटो डालने के बाद से आरम्भ नहीं हुआ. भारत विरोधी माहौल का वहाँ पर
बनना उसी समय से आरम्भ हो गया था जबकि पिछले वर्ष चीन समर्थित मोहम्मद मोइजु मालदीव
के राष्ट्रपति बने थे. वहाँ के राष्ट्रपति चुनाव के दौरान भारत विरोधी वातावरण को
खुलकर हवा दी गई, यहाँ
तक कि उस चुनाव में ‘इंडिया आउट’ नाम से एक अभियान भी शुरू किया गया था. मालदीव का
वर्तमान सत्ताधारी गठबंधन चीन की तरफ झुकाव रखता है, ऐसे में भारत विरोधी वातावरण
का नजर आना कोई आश्चर्य नहीं है. इसी झुकाव के चलते मालदीव सरकार द्वारा भारत को अपनी
सैन्य उपस्थिति हटाने को भी कहा गया है.
भारत सरकार द्वारा
इस पूरे मामले में सख्त किंतु सधी हुई नीति का पालन किया जा रहा है. सरकार की मंशा
से स्पष्ट है कि वह उसी नीति का पालन करना चाहती है जो भारतीय हितों के पक्ष में हो.
चूँकि मालदीव की स्त्रातजिक स्थिति उसे हिन्द महासागर में महत्वपूर्ण बनाती है,
ऐसे में भारत के साथ उसके अच्छे संबंध हिन्द महासागर क्षेत्र में भारत के व्यापारिक
हितों के लिए और चीन को संतुलित रखने के लिए आवश्यक हैं. भारत की ओर से मालदीव में
लगभग 400 मिलियन डॉलर की परियोजनाओं
पर कार्य चल रहा है, कुछ भारतीय
कंपनियाँ भी वहाँ कार्यरत हैं. ऐसे में इस निवेश और व्यापारिक हितों की रक्षा करना
भारत की प्राथमिकता है. भारत अपने हितों की रक्षा को लेकर और मालदीव में चीनी गतिविधियों
को लेकर पूरी तरह से सजग है. उसकी ठोस और सटीक नीति ने मालदीव सरकार को स्पष्ट रूप
से भारतीय रुख से परिचित करवा दिया है. फिलहाल तो यह विवाद सुलझता नजर आ रहा है और
वैसे भी इसे तूल न देना ही दोनों देशों के दीर्घकालिक हित में है.

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