रविवार, 14 जनवरी 2024

पुनर्स्थापित होती सनातन प्रतिष्ठा

आने वाले समय में 22 जनवरी को कैलेण्डर में उल्लेख योग्य तिथि बने रहने से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण तिथि के रूप में आने वाली पीढ़ियों द्वारा याद किया जायेगा. एक ऐसा स्वप्न जिसे ऐसी आँखों ने देखा जो तुष्टिकरण की गोलीबारी के शोर में असमय बंद हो गईं; एक ऐसा प्रण जो उन युवाओं ने लिया जिनकी आयु अपने भविष्य के प्रति प्रण लेने की थी, वो सब आने वाली 22 जनवरी को सत्य होने जा रहा है. आने वाली तिथि को अयोध्या में पाँच सौ वर्षों की प्रतीक्षा को स्थायित्व प्राप्त होने वाला है. ‘रामलला हम आयेंगे, मंदिर वहीं बनायेंगे का संकल्प जो एक आन्दोलन के रूप में भारतीय जनमानस के बीच उभरा, उसकी साकार छवि अब दिखाई देने लगी है. अब गहरी पीड़ा, दर्द, तिरस्कार, अपमान, आँसुओं के बाद श्रीराम जन्मभूमि स्थल पर प्रभु श्री राम के बाल्य रूप की प्रतिष्ठा होने जा रही है. रामलला का अपने भव्य-दिव्य रूप में प्राण-प्रतिष्ठित होना सदियों की प्रतीक्षा है और करोड़ों आँखों का स्वप्न है जो पूर्ण होने जा रहा है.

 



श्रीराम जन्मभूमि पर बने एक प्राचीन मंदिर, जो इस भूमि की आस्था का प्रतीक था, को बर्बर आक्रांताओं द्वारा मिट्टी में मिलाकर उस पर तत्कालीन आक्रांता के नाम का ढाँचा निर्मित कर दिया गया. इस तरह के कुकृत्य को करने का उद्देश्य सनातन संस्कृति को रौंदना था. इसके लिए 1527 ई० में मुगल शासक बाबर द्वारा अपने सैनिकों, गुलामों को आदेश दिया गया था. हुक्म की तामील करना गुलामों की मजबूरी हुआ करती है और यदि उस आदेश का मकसद संस्कृतियों का क्षरण करना हो तो इन आक्रान्ताओं द्वारा कभी भी विचार नहीं किया गया. श्रीराम जन्मभूमि पर बने मंदिर को नष्ट करना, उसका ध्वंस करना, उस पर बाबरी ढाँचा बनाना ही आक्रान्ताओं का एकमात्र उद्देश्य नहीं था. असल में भगवान श्रीराम जो उत्तर भारत के प्राण, विचार, आस्था एवं विश्वास के प्रतीक हैं, जनमानस के सबसे प्रिय राजा और नायक हैं, प्रत्येक हिन्दू की मर्यादा और धर्म के आदर्श हैं, भारतीय संस्कृति के गौरव हैं, सनातन रूप में मर्यादा पुरुषोत्तम हैं उनके मंदिर को ध्वस्त करना किसी इमारत को ध्वस्त करना मात्र नहीं था. 


विधर्मी शासकों द्वारा एक संस्कृति के, एक सभ्यता के, हिंदुत्व के, एक विशाल जनसमुदाय के महाविश्वास पर प्रहार कर उस जनमानस की मनोशक्ति को पैरों तले रौंदना उनका मकसद था. यह कृत्य केवल ईंट-गारे से बने पावन भवन को, मंदिर को गिराना मात्र नहीं था वरन मंदिर के भग्नावेशों पर अपनी मस्जिद तान कर हिन्दू धर्म पर इस्लाम की विजय की उद्घोषणा करना था. मंदिर पर मस्जिद के निर्माण के द्वारा हिन्दू धर्म पर इस्लामिक मजहब की विजय का नाद भी किया गया, उसका प्रदर्शन भी किया गया. इस कृत्य का विरोध करने वालों के प्राण लिए गए, समर्पण करने वालों को धर्म परिवर्तन करना पड़ा. आने वाली शताब्दियों तक प्रत्येक हिन्दू आस्था के प्रतीकों को ऐसे ही प्रहारों का सामना करना पड़ा. उत्तर भारत के सभी तीर्थ स्थलों का ध्वंस किया गया, मंदिरों के ऊपर मस्जिदों के गुम्बद तान दिए गए. अयोध्या, काशी, मथुरा जैसी अनेक कहानियाँ अन्याय और बर्बरता के दम पर लिखी गईं. हिन्दुओं ने सबकुछ खामोश रहकर, खून के घूँट पीकर सहा भी, देखा भी.

 

हिन्दू सत्ता से दूर हो चुके थे, संस्कृति को ध्वंस किया जा रहा था, समाज को पददलित कर कमजोर और लाचार किया गया. किसी सभ्यता को पददलित करने की इससे बर्बर कथा कहीं और नहीं मिलेगी. इसे मात्र सत्ता हस्तांतरण या जय-पराजय का राजनीतिक घटनाक्रम मानना एक बड़ी भूल के अतिरिक्त कुछ और नहीं कहा जा सकता. अंग्रेजों के भारत में स्थिर हो जाने के बाद इस जिहादी बर्बर अन्याय को ऐतिहासिक आख्याओं के द्वारा परिवर्तित अर्थों में प्रतिष्ठित किया गया. राम, कृष्ण को काल्पनिक साबित करने के लिए इनको कहानियों के रूप में स्थापित कर दिया गया. हिन्दू विश्वासों को अतार्किक एवं अंधविश्वास से युक्त सिद्ध कर दिया गया. यह सब सभ्यताओं के संघर्ष की वह कष्टकारी यात्रा है जिसमें भारत भूमि पर ही उसके सभी विश्वासों और अधिष्ठाताओं कुचल दिया गया, जिससे इस सभ्यता और संस्कृति के संवाहकों को सदा के लिए पददलित किया जा सके.

 

मर्यादा पुरुषोत्तम राम जो जन-जन में बसे हैं, उनके मंदिर की उसी भूमि पर हिन्दू स्वाभिमान की पुनर्स्थापना की एक सांस्कृतिक पुनर्स्थापना है. जन्मभूमि स्थल पर मंदिर का निर्माण उत्कर्ष है भारतीय संस्कृति की अपराजेयता की. यह उत्कर्ष है उस अपराजेयता का, उस जिजीविषा का जो पाँच सौ वर्षों तक न्याय के लिए संघर्ष करती है पर मर्यादा नहीं खोती है. वो राम को नकारने वालों से, बाबरी मस्जिद को मुगलिया शौर्य के रूप में प्रचारित करने वालों से, हिन्दुओं को काफिर-कायर बताने वालों से कानूनी जंग तो लड़ता है पर बहुसंख्यक होने के बाद भी अल्पसंख्यक मुस्लिमों के समूल नाश पर उतारू नहीं होता है. न्याय के दीर्घकालिक मार्ग को अपनाता है मगर कभी भी असहिष्णुता का सहारा लेकर ध्वंस के रास्ते पर नहीं बढ़ता है. भारत के अलावा ये सब कहीं भी हुआ होता तो अल्पसंख्यकों का नामोनिशान मिलना मुश्किल हो जाता. श्रीराम का पुनरागमन यह बताता है कि सभ्यताएं कुचलने से नष्ट नहीं हुआ करती, सत्य लाख तहों के नीचे रहने पर भी मरता नहीं. जो सत्य है, सनातन सत्य है वो पलट कर वापस उठता है और अन्याय के विरुद्ध प्रतिष्ठित होता है. सनातन सत्य, सनातन संस्कृति उसी तरह पूर्ण वैभव और पावनता के साथ वैसे ही प्रतिष्ठित होते हैं जैसे कि एक बार पुनः रामलला प्रतिष्ठित हो रहे हैं अपनी अयोध्या में.


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