देश अठाहरवीं लोकसभा चुनाव के लिए तैयार है. इस बार के लोकसभा चुनाव में इतिहास बनना निश्चित है. मोदी जी निर्बाध रूप से युवाओं, महिलओं, शहरी क्षेत्रों, ग्रामीण भारत और पहली बार वोट देने वालों की पहली पसंद बने हुए हैं. लोकसभा चुनावों में उनकी जीत उनको पहला गैर-कांग्रेसी नेता बना देगी जो लगातार तीन बार प्रधानमंत्री पद को सुशोभित करेंगे. इससे पहले किसी भी गैर-कांग्रेसी को ऐसा अवसर नहीं मिला है. जवाहर लाल नेहरू के अतिरिक्त किसी अन्य नेता को लगातार तीन बार प्रधानमंत्री बनने का अवसर नहीं मिला है. इस कीर्तिमान को पाना मोदी के लिए दुष्कर नहीं है मगर जिस दूसरे लक्ष्य पर उनकी नजर है वो कठिन हो सकता है. 17वीं लोकसभा के अपने अंतिम सम्बोधन में मोदी जी ने ‘अबकी बार चार सौ पार’ की पंचलाइन चुनावी मैदान में छोड़ दी. चार सौ सीटें पाने का लक्ष्य भाजपा के लिए कठिन हो सकता है. दरअसल राष्ट्रीय स्तर पर इस तरह का जनाधार पाने के लिए एक प्रकार की लहर की आवश्यकता होती है, जैसे कि 1984 के चुनावों में कांग्रेस के पास थी. 1984 के चुनावों में कांग्रेस द्वारा 414 सीटें जीतना इंदिरा गांधी की हत्या से उपजी सहानुभूति की लहर का परिणाम था. इस विशाल आँकड़े को पार करने के लिए निश्चित रूप से राजग अथवा भाजपा को ऐसी ही कोई लहर होनी चाहिए.
वर्तमान में मोदी
के पक्ष में आँकड़े और जनमानस को पसंद आने वाले मुद्दे हैं. इनमें चाहे धारा 370 का
हटाना हो, कोरोनाकाल में सरकार के प्रयास रहे हों, तीन तलाक का मामला रहा हो,
तीव्र गति से दिखने वाले विकास कार्य हों, अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य एवं मूलभूत
सुविधाओं की उपलब्धता आदि रहा हो. इन विषयों में अब सबसे ऊपर राम मंदिर का मुद्दा
है, जिसने पूरे देश को भावनात्मक और आस्था के दृष्टिकोण
से नरेन्द्र मोदी के साथ बाँध दिया है. मंदिर निर्माण का अपना वचन पूरा कर भाजपा
ने जनमानस में अनन्य विश्वास बनाया है. इस कारण से समान नागरिक संहिता और
काशी-मथुरा के मुद्दे पर भी जनता का रुख भाजपा के ही साथ है. भाजपा ने सनातनी
आस्था पर एक लहर का निर्माण अपने पक्ष में किया है जो फिलहाल विपक्ष की सबसे बड़ी
मुसीबत है.
यह चुनाव मोदी
बनाम विपक्ष बना हुआ है. विपक्ष उन मुद्दों को चुनावी विमर्श के केन्द्र में लाना
चाहता है जिनके द्वारा मोदी के विरोध का आधार तैयार हो सके. इसलिए भाजपा को चार सौ
पार जाने के लिए एक ठोस रणनीति चाहिए. 2019 के चुनावों में भाजपा ने 435 सीटों पर
चुनाव लड़ते हुए 303 (37.36 प्रतिशत) सीटें जीतीं जबकि राजग ने 353 (44.84 प्रतिशत)
सीटों पर विजय हासिल की थी. यदि चार सौ सीट के सन्दर्भ में चुनावी गणित को समझें
तो 1984 के चुनावों में कांग्रेस ने 414 सीटों को 49.1 प्रतिशत मतों के साथ जीता
था. ऐसे में यदि भाजपा राम लहर और कार्यों के चलते राजग के जनाधार को 4.34 प्रतिशत
तक और बढ़ा सके तो वह कांग्रेस के 1984 के आँकड़े को छू सकती है.
2019 के लोकसभा
चुनावों में यदि भाजपा के क्षेत्रवार प्रदर्शन को देखें तो उसने उत्तर भारत में
151 सीटें (81.1 प्रतिशत), दक्षिण भारत में 30 सीटें (22.7 प्रतिशत), पूर्वी भारत
में 67 सीटें (47.1 प्रतिशत) और पश्चिमी भारत में 51 सीटें (65.3 प्रतिशत) जीती
थीं. इस दृष्टि से भाजपा की रणनीति ऐसी हो कि उसे पूर्वी भारत और दक्षिणी राज्यों
में अधिक सफलता मिल सके. इसके लिए तमिलनाडु की 39, आंध्रप्रदेश की 25 और केरल की
20 लोकसभा सीटों पर ध्यान लगाना होगा. उत्तर प्रदेश, गुजरात, मध्यप्रदेश, बिहार, झारखण्ड,
कर्नाटक, असम, हरियाणा में अपने प्रदर्शन को दोहराना होगा. पिछले चुनावों में 72
सीटें ऐसी थी जिनमें भाजपा प्रत्याशी बहुत कम अंतर से हारे थे. उन सीटों पर विशेष रूप
से कार्य करना होगा.
2024 के लोकसभा
चुनावों में 96.88 करोड़ मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करेंगे. महिलाएँ (47.15 करोड़)
और पहली बार मतदान कर रहे युवा (1.85 करोड़) प्रभावी भूमिका निभा सकते हैं. मोदी
सरकार की सभी महत्वपूर्ण योजनाओं के केंद्र में ये दो वर्ग प्रमुखता से रहे हैं. हिंदुत्व,
राष्ट्रवाद, समान नागरिक संहिता, तुष्टिकरण, कश्मीर का मुद्दा कांग्रेस और अन्य
विपक्षी दलों के गले की फाँस बना रहेगा जो भाजपा के लिए लाभदायक हो सकता है.
विपक्ष का लचर नेतृत्व, उनकी फूट भाजपा को बहुमत से दूर तो नहीं कर पायेगी. इसमें
कोई संदेह नहीं कि भाजपानीत सरकार को कामकाज के मुद्दे पर जनसमर्थन प्राप्त है. बेरोजगारी
और मँहगाई बड़े मुद्दे हैं लेकिन विपक्षी गठबंधन में इतनी क़ाबलियत नहीं कि इसका लाभ
उठा सके. कुल मिला कर यह तय है कि नरेन्द्र मोदी अपने तीसरे कार्यकाल में पूर्ण
बहुमत के साथ प्रवेश करेंगे. फ़िलहाल ये देख्नना दिलचस्प होगा कि ‘अबकी बार चार सौ
पार’ की पंचलाइन के लिए वे कौन सा जादू बिखेरते हैं?

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