कुछ खबरें जिनका
व्यक्तिगत रूप से खुद से कोई सम्बन्ध नहीं होता है, इसके बाद भी वे ख़बरें गहराई तक प्रभावित करती हैं. इनमें ख़ुशी
देने वाली खबरें आसमान की ऊँचाई तक मन को प्रसन्न करती हैं तो खबर यदि दुखद है तो सागर
की गहराई तक दिल को दुखी कर जाती है. हृदय को दुखी करने वाली एक ऐसी ही खबर कि टाटा
समूह के चेयरमैन रतन टाटा नहीं रहे आज दिल-दिमाग को सुन्न कर गई. इस खबर ने जन-जन
को संवेदनात्मक रूप से प्रभावित किया है और इसका उदाहरण सोशल मीडिया बना हुआ है.
पूरे सोशल मीडिया में किसी न किसी रूप में रतन टाटा के निधन की खबर सुर्खियों में
बनी हुई है. देश में बहुत से प्रतिष्ठित लोग रहे हैं, इनमें
राजनीतिज्ञ, फ़िल्मी कलाकार, क्रिकेट
खिलाड़ी रहे हैं जिनसे सम्बंधित खबरों पर मीडिया में, सोशल
मीडिया में जबरदस्त उफान दिखाई देता है. ऐसा संभवतः पहली बार है कि किसी उद्योगपति
के लिए लोगों के हृदय का अनन्य प्रेम सहज ही देखा जा सकता है. ये ही कमाई है उस व्यापारी
की जिसने एक विशाल साम्राज्य खड़ा किया लेकिन अपनी साख को कभी दाँव पर न लगाया.
रतन टाटा नाम की
साख सिर्फ देश में ही नहीं वरन वैश्विक स्तर पर है. यही कारण है कि टाटा समूह की 30 सूचीबद्ध कम्पनियाँ पूरे विश्व मे फैली हुई
हैं. जगुआर, लैंड रोवर, एयर इंडिया, टाटा स्टील, टाटा मोटर्स आदि-आदि कुछ बड़े नाम हैं जो
टाटा समूह के स्वामित्व में हैं. किसी समय में टेल्को के द्वारा आरम्भ हुआ उनका
औद्योगिक सफ़र विस्तार पाकर सम्पूर्ण विश्व को अपने प्रभाव में ले लेगा ऐसी कल्पना
किसी के द्वारा नहीं की गई थी. टाटा के नाम की साख, गुणवत्ता, पारदर्शिता आदि के चलते इस
समूह ने जहाँ आर्थिक स्वामित्व का विस्तार किया वहीं जनसमुदाय के हृदय में अपनी
पैठ बनाई. अपने व्यापारिक कौशल के कारण यह समूह 34 लाख करोड़ की संपत्ति का स्वामी है और इसके स्वामित्व
की कम्पनियों का मार्केट कैप 403 अरब डॉलर का है. इसके अलावा यदि अकेले रतन टाटा की नेटवर्थ का आकलन किया जाये
तो वह 3800 करोड की है. इन
सबके बाद भी टाटा समूह की, रतन टाटा की प्रतिष्ठा का आधार ये आर्थिक सशक्तिकरण नहीं वरन इन सबसे इतर
टाटा समूह को विशेष बनाता है उनका सैद्धान्तिक, सहयोगी और उदार होना.
यदि धनवान होने की
स्थिति का आकलन किया जाए तो आर्थिक स्थिति के मामले में रतन टाटा 421 वें नंबर पर आते हैं. उनके द्वारा अपनी कमाई
का बड़ा भाग चैरिटी और स्टार्टअप्स को बढ़ावा देने में खर्च किया जाता रहा है.
सामाजिक क्षेत्र में सक्रियता से अपनी भागीदारी निभा रहा टाटा समूह द्वारा संचालित
कैंसर अस्पताल इसका सशक्त उदाहरण है. इसके अतिरिक्त आदिवासी और नक्सल प्रभावित क्षेत्रों
में भी यह समूह कई परियोजनाओं को धन उपलब्ध कराता है. देश के विकास की मजबूत नींव रखने
वाले टाटा समूह ने सदैव राष्ट्रीय आपातकाल में आगे बढ़ कर अपनी भूमिका निभाई है. उनके
द्वारा धन का भोंडा प्रदर्शन करने के बजाए देश हित में अपना कर्तव्य करने को
प्रमुखता दी गई. टाटा समूह ने सिर्फ व्यापार नहीं किया है बल्कि राष्ट्रीय स्वाभिमान
को भी दृढ़ किया है. टाटा स्टील हो, फोर्ड की लैंड रोवर हो या जगुआर का अधिग्रहण, उन्होंने
इसके द्वारा भारतीय कौशल और नेतृत्व क्षमता को प्रतिष्ठित किया है.
यह कहना किसी भी
रूप में अतिश्योक्ति नहीं है कि जिस भी क्षेत्र में टाटा समूह ने कदम रखा वहाँ गुणवत्ता
असंदिग्ध हो गई. जो कहा, जितने
पैसे लिए, वही बेचा. वर्तमान गलाकाट प्रतियोगिता के दौर में व्यापारिक प्रतिस्पर्धा
के नाम पर आज एक भी प्रतिष्ठित ब्रांड अपनी गुणवत्ता को बनाये नहीं रख सका है.
अनेक बड़े-बड़े औद्योगिक नामों के द्वारा व्यापार के नाम पर लोगों के धन की खुली लूट
हो रही है. इन सारी स्थितियों को, क़दमों को ये बड़े व्यापारिक घराने बिजनेस टैक्टिस समझते हैं.
यदि वास्तविक बिजनेस टैक्टिस देखना और समझना हो तो उसके लिए टाटा के किसी भी
उत्पाद की तरफ दृष्टि डालनी होगी. टाटा का नमक हो या सरिया, टाइटन की घड़ी हो या तनिष्क का सोना, होटल ताज हो या टाटा मोटर्स अथवा इनके अलावा
कोई भी दूसरा उत्पाद हो,
यदि उसमें टाटा की मोहर लगी है तो वह असंदिग्ध रूप से विश्वसनीय है.
एक बड़े औद्योगिक घराने
के लिए धन कमाना तो आसान है पर ऐसा विश्वास कमाना बहुत ही मुश्किल, जैसा कि रतन
टाटा ने कमाया है. आज के दौर में रतन टाटा उन तमाम भारतीयों के लिए एक आदर्श हैं जो
सिद्धांतों पर विश्वास रखते हैं, जो समाज के प्रति अपने उत्तरदायित्व से कभी मुँह नहीं मोड़ते. रतन टाटा जैसे कुछ
ही ऐसे विरले हैं जो जिस पात्र में आते हैं, कहानी उसके इर्द-गिर्द घूमने लगती है. ऐसे व्यक्तित्व को सादर नमन.

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