शुक्रवार, 20 सितंबर 2024

तकनीक के नए आसमान पर युद्ध

बीते दिनों अचानक से एक अनोखी खबर वैश्विक स्तर पर सामने आई कि लेबनान और सीरिया में पेजर फटने लगे. दो हजार से अधिक घटनाएँ पेजर ब्लास्ट की हुईं, जिसके बाद यह समझना मुश्किल नहीं था कि यह कोई दुर्घटना नहीं बल्कि सोचा-समझा हमला है. शक की सुई इज़राइल पर जा टिकी जो बाद में सही साबित भी हुई. पेजर ब्लास्ट की इस घटना ने हिज़्बुल्लाह के लड़ाकों को निशाना बनाया. उनके 450 लड़ाके अपनी आँखें खो बैठे, घायल हुए, चेहरे और पेट पर गहरी चोटें आई. इससे कुछ मौतें भी हुई लेकिन इन सब से ऊपर इसका जो मनोवैज्ञानिक प्रभाव हुआ वो शब्दों से परे है. पल भर को सोचिए उस दहशत भरे माहौल के बारे में जिससे लेबनान और सीरिया के इलाकों में भगदड़ सी मच गई. ये भगदड़ ब्लास्ट से अधिक तो इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को बाहर फेंकने को लेकर थी.

 

हिजबुल्ला की जो कार्य-शक्ति अस्पतालों में पड़ी है. इन लोगों को संचार और पुर्नगठन का अब क्या तरीका हो, ये समझ नहीं आ रहा. इसके अलावा ये लोग अगला हमला कब, कैसे, कहाँ होगा के बारे में पागलों की तरह कयास लगाने में लगे हैं. इन क्षेत्रों में फैली ये बदहवासी इजरायल की शानदार युद्ध रणनीति की महज एक झलक है. उसकी सशक्त और दूरदर्शी रणनीति की इस सफलता के बारे में इसी से समझा जा सकता है कि इस पूरे खेल में खेल का मैदान और नीति दोनों ही इजरायल द्वारा तय की गईं. जब हिजबुल्लाह ने साइबर अटैक के डर से मोबाइल की जगह पेजर को संचार के लिए प्रयोग करने की सोची तो उसे लगा होगा कि उसने इजरायल को बेवक़ूफ़ बनाते हुए बहुत बड़ा किला फतह कर लिया. उधर इजरायल ने तू डाल-डाल, तो मैं पात-पात की क्षमता दर्शाते हुए न सिर्फ हिजबुल्लाह की आपूर्ति श्रृंखला में सेंधमारी की बल्कि पाँच हजार से अधिक पेजरों में आईईडी लगा कर उचित समय पर दुश्मन के हौसले पर जबरदस्त धमाका किया. इजरायल के एक प्रवक्ता ने इशारा किया कि जो चरण सामने दिख रहा है उससे भी कई चरण आगे का काम हो चुका है. वॉकी-टॉकी, रेडियो, टीवी, राउटर, फ्रिज, वाशिंग मशीन कुछ भी फट सकता है. एक पल को भले ही ये मज़ाक लगे किन्तु हिजबुल्लाह के साथ जो हुआ वो मज़ाक बिल्कुल नहीं है. यह तकनीक और रणनीति का बेहतरीन प्रयोग है जो दुश्मन का मनोबल तोड़ देगा, उन्हें संचार विहीन करके संगठित नहीं होने देगा.

 



इन घटनाओं ने युद्ध के नए स्वरूप और उसके सम्भावित प्रभावों पर चर्चा आम कर दी है. डिफेन्स एंड स्ट्रेटजी के विशेषज्ञ कहते हैं सबसे बेहतरीन स्ट्रेटजी दुश्मन से हमेशा दो कदम आगे रहना और उसे अचंभित कर देना है, इस्राइल ने यही करके दिखाया है. अपने ऊपर हुए हमास के हमले के बाद से इजरायल लगातार हमास और उनके समर्थकों को अचंभित, भयग्रस्त कर रहा है. युद्ध अपने स्वरूप को नित बदल रहा है और आने वाले दिनों में बदलती तकनीक इसमें और भी परिवर्तन लायेगी. आज दुश्मन को परास्त करने का रास्ता तकनीक पर पकड़ ही है. युद्ध मैदानों में तो लड़ा ही जायेगा पर परिणाम प्रयोगशालाओं में तय होंगे. भौतिक जीत के लिए डिजिटल वर्चस्व चाहिए होगा. अंतरिक्ष, सायबर स्पेस और व्यापक जनसंहार के शस्त्रों की लंबी मारक क्षमता ही युद्ध में परिणाम को अपने पक्ष में बदलने वाली होगी.

 

तकनीक और इच्छाशक्ति के इस मिश्रण के प्रभाव पर गौर करना बेहद दिलचस्प है. हमास और हिज़्बुल्लाह की समस्त रणनीति युद्ध के इस सायबर आयाम के आगे बेकार साबित हो गई. जो आतंकी बंकर, टनल बनाकर शहरों में छुपे थे, उन्हें ड्रोन और गाइडेड मिसाइलों के द्वारा तबाह किया गया. यदि तकनीक इतनी उन्नत नहीं होती तो सीधी लड़ाई में सफलता की दर न के बराबर होती. इजरायल की सेना इसी में उलझ जाती, जो हमास के लिए ही फायदेमंद साबित होती. सायबर अटैक की संभावना को कम करने हेतु ही हिज़्बुल्लाह ने अपने आतंकी नेटवर्क को पुरानी संचार तकनीक- पेजर पर ले जाने का फैसला किया. इजरायल ने इसका क्या हाल किया, इसे पूरी दुनिया देख रही है. युद्ध में जीत कुछ मोर्चों पर हार-जीत से तय नहीं होती बल्कि दुश्मन के हौसले को ध्वस्त करने, संचार और पुनर्गठन के रास्ते बंद करने से होती है.

 

इस हमले के बाद कैसे हिज़्बुल्लाह और मोसाद के लड़ाकों को संगठित किया जाएगा? एक अनियमित युद्धकर्म के लिए गठित दल बिना संचार/सूचना/आदेशों के कार्य कैसे करेंगे? इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को फेंकने की हड़बड़ी दिखाने वाले ये लड़ाके क्या पत्र युग मे वापस लौटेंगे? यदि छापामार समूहों, आतंकी दस्तों को नियमित सेनाओं में बदला जाए तो आतंक को हथियार बना कर तबाही फैलाने वालों की वहन क्षमता इसकी अनुमति नहीं देती. और फिर तकनीक इन समूहों के छुपने की जगहों, प्रशिक्षण स्थलों, एकत्र होने के स्थानों को आसानी से निशाना बना लेगी. तकनीक के चलते ही अब आसमान से पाताल तक हथियारों की अचूक रेंज में हैं. चुन-चुन कर मारने से इकठ्ठे निशाना बनाना अधिक आसान होगा. इजरायल की अदम्य इच्छशक्ति ऐसा कर भी सकती है, इसमें किसी को संदेह नहीं होना चाहिए.

 

आतंक से जूझते देशों के लिए फिलहाल तो इजरायल की सोच अपने दिल-दिमाग में उतारने लायक है, क्रियान्वित करने योग्य है. इसमें मैदान भी देश तय करेगा और खेल भी. तकनीक के प्रयोग और सुगमता ने आतंकी दस्तों के कार्य को आसान बनाया है. इंटरनेट, जीपीएस, संचार साधनों और तमाम उपकरणों की सहायता से आतंकी समूह खतरनाक चुनौतियाँ दे रहे हैं. इन सबका एक ही इलाज है जो इजरायल ने कर दिखाया कि इनको तकनीक के द्वारा ही ट्रैक करो, मारो और पहुँचा दो आदम युग में, तकनीक-विहीन, संचार-विहीन संसार में.


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