व्हाइट हाउस में
यूक्रेन के राष्ट्रपति ब्लादिमीर ज़ेलेंस्की के साथ अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड
ट्रंप की बातचीत के तरीके ने कूटनीतिक व्यवहार के सन्दर्भ में पूरी दुनिया का
ध्यान अपनी ओर आकृष्ट किया. इसी के साथ अमेरिका द्वारा यूक्रेन को दी जा रही मदद
बंद करने की मंशा व्यक्त किये जाने के पश्चात वैश्विक राजनीति के पटल पर
अंतरराष्ट्रीय सम्बन्धों को लेकर एक नई बहस छिड़ गई है. यह बहस यूरोप और अमेरिका के
सम्बन्धों को लेकर है. प्रारम्भ से ही अमेरिका और यूरोप की सुरक्षा अविभाजित सोवियत
संघ के विरोध एवं साम्यवाद के फैलाव को रोकने से सम्बंधित रही है. इस उद्देश्य की
पूर्ति हेतु 29 अगस्त 1949 में उत्त्तरी अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) का गठन किया
गया. शीत युद्ध की शत्रुता, साम्यवाद से यूरोप के बचाव हेतु इस सैनिक संगठन के गठन
ने यूरोप एवं अमेरिकी हितों में साम्यता स्थापित कर दी. इस संगठन के बजट का एक
बहुत बड़ा भाग अमेरिका द्वारा वहन किया जाता रहा है. अब डोनाल्ड ट्रंप अपने दूसरे
कार्यकाल में यूरोप की सुरक्षा में हो रहे अमरीकी व्यय को नियंत्रित करना चाह रहे हैं,
इसी कारण नाटो और यूक्रेन को दी जा रही वित्तीय मदद में कटौती के प्रयास हो रहे हैं.
यूक्रेन को अमेरिका
द्वारा बेहद सख्त लहजे में स्पष्ट सन्देश दिया जा चुका है कि वह अब युद्ध को रोककर
रूस के साथ समझौता करे. यूक्रेन को अब अमेरिका से कोई वित्तीय मदद नहीं दी जाएगी.
इस घोषणा से यह तय हो चुका है कि यूक्रेन के लिए मुश्किलें बढ़ चुकी हैं. इस फैसले
से उत्पन्न स्थितियाँ रूस के पक्ष में हैं. रूस के राष्ट्रपति पुतिन ने भी रूस-अमेरिका
संबंधों पर नये सिरे से काम करने की बात कही है. ये सारी स्थितियाँ दो चिर
प्रतिद्वंदियों के समीप आने के संकेत देती हैं. यदि रूस और अमेरिका के सम्बन्ध
सामान्य हो जाते हैं, भले ही इसकी कीमत यूक्रेन ही क्यों न हो, तो नाटो की
उपादेयता पर, उसके अस्तित्व पर प्रश्नचिन्ह लग जाएगा. ध्यातव्य है कि नाटो का गठन अमेरिका
और यूरोप के प्रति रूस की आक्रामकता (वैचारिक और सैन्य) को रोकने हेतु किया गया था.
फिलहाल रूस अपनी रणनीति में सफल दिख रहा है. अमरीकी राष्ट्रपति रूस के हित की बात
कर रहे हैं और अपने पुराने यूरोपीय साथियों से दूर जाते दिख रहे हैं.
जिस नाटो को कभी अविभाजित
सोवियत संघ के विरुद्ध खड़ा किया गया था, जिससे वो एकजुट होकर सोवियत खतरे का सामना
कर सकें आज वही संगटन रूस के कारण ही दो-फाड़ हो चुका है. अमरीकी नीति में
परिवर्तन, वर्तमान भूराजनीतिक कारणों से ब्रिटेन, फ्रांस और यूरोपियन यूनियन के
सदस्य देशों की सुरक्षा संकट में आ चुकी है. इस आसन्न संकट को समझते हुए फ्रांस,
ब्रिटेन और यूरोपियन यूनियन ने तत्काल ‘यूरोप के शस्त्रीकरण’ की योजना पर कार्य
शुरू कर दिया है. 02 मार्च 2025 को यूरोपियन काउंसिल की आयुक्त ‘उर्सला वान डेर
लिएन’ ने सभी सदस्य देशों को अपना सुरक्षा बजट बढाने और शस्त्रीकरण करने को कहा है.
यूरोप की ‘शस्त्रीकरण योजना’ हेतु 800 बिलियन यूरो का बजट निर्धारित किया गया है. इसमें
से 150 बिलियन यूरो को शस्त्रीकरण एवं सुरक्षा के
आधारभूत ढाँचे के विकास के लिए आसान कर्ज़ के रूप में प्रदान करने की व्यवस्था है.
यूरोप अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित दिख रहा और यह चिंता स्वाभाविक भी है. अब तक
नाटो के कुल बजट का लगभग 45 प्रतिशत हिस्सा अमेरिका अकेले ही वहन करता रहा है, रूस-
यूक्रेन युद्ध में भी अकेले अमेरिका द्वारा 180 अरब डॉलर से अधिक की मदद दी गई है,
जिसमें 66.5 अरब डालर सिर्फ सैन्य सहायता के रूप में उपलब्ध करवाए गये हैं.
यूक्रेन को नाटो देशों से जो हथियार प्राप्त हुए हैं उनमें भी 20 प्रतिशत अकेले
अमेरिका ने उपलब्ध करवाए हैं. अब ट्रंप प्रशासन अमरीकी हितों को अनदेखा कर नाटो या
यूरोप के देशों का बोझ उठाने के मूड में नहीं है. शीत युद्ध के बाद से अमेरिकी
नीति में यह बहुत बड़ा बदलाव है, जब भूराजनीतिक समीकरणों में अमेरिका के लिए उसके
यूरोपीय साथी बोझ बन चुके हैं. यूक्रेन की आग में अमेरिका अपने हाथ नहीं जलाना
चाहता, वह वियतनाम या अफगानिस्तान की कोई भी रणनीतिक भूल दोहराने से बच रहा है और
यह अमेरिका के दृष्टिकोण से उचित भी प्रतीत होती है. ट्रेड वार में उलझे अमरीका को
कोई परम्परागत सैनिक मोर्चा नहीं चाहिए न स्वयं के लिए और न ही तथाकथित महाशक्ति
के टैग के लिए. यह सत्य है कि इस महाशक्ति की भूमिका हेतु अमेरिका ने बोझ उठाया और
यूरोपियन यूनियन के देशों ने सुरक्षा से निश्चिन्त हो व्यापार और अर्थव्यवस्था में
उन्नति की.
गहनता से विचार
किया जाये तो समझ आता है कि नाटो देशों में गहरी दरार पड चुकी है. ज़ेलेंस्की को जब
अमेरिका से खाली हाथ भेज दिया गया तब यूके एवं फ्रांस में उनका स्वागत ही यह
दिखाने के लिए काफी है कि अब नाटो की एकता और अस्तित्व दोनों ही समाप्ति की राह पर
हैं. यूरोप के शस्त्रीकरण का आह्वान यह दर्शाता है कि यूरोप अब अमेरिका के भरोसे
बैठा नहीं रह सकता. ब्रिटिश प्रधानमंत्री स्टार्मेर, फ्रेंच राष्ट्रपति मैक्रॉन
द्वारा यूके-फ्रांस शांति सेना बनाने की घोषणा की गई है, जिसमें यूरोपियन यूनियन सहित
20 देश सम्मिलित होना चाह रहे हैं. यह संघ यूक्रेन को सैनिक सहायता उपलब्ध कराने
के अलावा अमेरिका को यह दिखाना चाहता है कि वे चुनौतियों के लिए तैयार हैं. इस सम्बन्ध
में अमेरिका ने एक तरह का कदम उठा भी लिया है. फ्रांस की घोषणा ‘सेव यूक्रेन सेव यूरोप’
का जवाब 24 घंटे के अंदर देते हुए ट्रंप ने यूरोपियन यूनियन पर 25
प्रतिशत टैरिफ लगा दिया गया है, जो यह स्पष्ट करता
है कि अब वापसी मुश्किल है. रणनीतिक रूप से नाटो सदस्यों की राहें अलग हो चुकी हैं,
तभी वे नाटो का एक नया विकल्प फिलहाल नाटो में रहते हुए बना रहे हैं. यदि अमेरिका नाटो
से अलग होता है तो 30 सदस्यीय इस संगटन का अस्तित्व समाप्त हो जाएगा. यद्यपि नाटो
के अन्य देश भी सैनिक शक्ति के रूप में सक्षम हैं तथापि उनके पास अमेरिका की तरह
विश्व्यापी सैन्य अड्डों का जाल नहीं है. इसके साथ-साथ वे पूरे भूमंडल पर सैनिक
कार्यवाही करने की क्षमता भी नहीं रखते है. देखा जाये तो अकेले यूरोप की सुरक्षा
में ही नाटो के अंतर्गत 80,000 से अधिक अमरीकी सैनिक तैनात हैं.
रूस एवं अमेरिका
यदि फरवरी 2022 से चल रहे रूस-यूक्रेन युद्ध को रूस की आशानुरूप समझौता करवाने में
सफल हुए तो इन ऐतिहासिक शत्रुओं द्वारा नये युग का आरंभ होगा. जिसके परिणामस्वरूप
नाटो संगटन का औचित्य ही समाप्त हो जायेगा. यह ठीक वैसे ही होगा जैसे पूर्वी यूरोप
में लोकतान्त्रिक क्रांतियों और सोवियत संघ के विघटन के कारण नाटो के विरुद्ध बनाई
गई वारसा संधि औचित्यहीन हो गई थी तथा
जुलाई 1991 को चेकोस्लोवाकिया में इसे अस्तित्वहीन घोषित कर दिया गया था. कुछ
ऐसा ही भविष्य नाटो का भी हो सकता है. वैसे भी नाटो रूस-यूक्रेन युद्ध में अप्रभावी
ही रहा है. नाटो की आधी-अधूरी मदद के कारण यूक्रेन अब तक युद्ध में खड़ा है किन्तु
न तो वो रूस को अपनी भूमि से धकेल सका है और न ही सम्मानजनक समझौते के लिए कोई
सैनिक बढ़त बना पाया है. नाटो के आश्वासनों ने ज़ेलेंस्की को यह समझने का मौका ही
नहीं दिया कि कब उन्हें आत्मसमर्पण कर देना चाहिए था. उनका यह विश्वास कि नाटो की
सेना सीधे-सीधे उनका युद्ध लड़ेगी, गलत साबित हुआ और वे नाटो की अंदरूनी राजनीति का
शिकार हो दोनों हाथ जला बैठे. आज नाटो से मिलने वाली मदद के बदले उनसे कुछ लाभ
प्राप्त करने के प्रयास हो रहे हैं. युद्ध जीतने वाला राष्ट्र तो युद्ध हर्जाना
लेगा ही, युद्ध सहायता के नाम पर उनके साथ खड़े देश भी युद्ध की कीमत वसूल करेंगे. भविष्य
में क्या परिस्थितियाँ बनेगीं यह इस युद्ध की समाप्ति पर निर्भर करेगा किन्तु यह
तय है कि अमरीका रूस को उसके अनुसार समझौता करने की खुली छूट दे देगा भले नाटो के
अन्य सदस्य इसके पक्ष में न हों. आंतरिक सत्य यही है कि नाटो विघटित हो चुका है,
इसकी औपचारिक घोषणा मात्र ही शायद शेष रह गई है.

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