रविवार, 23 मार्च 2025

नारीवाद का स्याह पहलू

आज एक ऐसा विषय मन को उद्वेलित कर रहा है जो एक नारी होने के बाद भी इस तथाकथित फ़ेमनिज़्म के विरुद्ध लिखने को बाध्य कर रहा है। नारीवाद का अर्थ यदि पहले स्त्रियों को स्वतंत्रता के नाम पर अर्धनग्न कर देना, फिर इंडिविजुअल आइडेंटिटी के नाम पर उन्मुक्त पशु बना देना, आधुनिकता के नाम पर अवर्णनीय हद तक पतित होने की आज़ादी है तो इस नारीवाद को  समेटने में ही समाज की भलाई है। 




स्वतन्त्रता चरित्र और व्यक्तित्व के विकास के लिए आवश्यक है जिससे एक व्यक्ति अपनी प्राकृतिक और सामाजिक भूमिकाओं के साथ न्याय कर सके। चयन की स्वतंत्रता एक नारी की सामाजिक शक्ति का प्रतीक होती है,लेकिन तमाम जगहों पर इसके बाद भी स्त्रियां क्या कर रहीं हैं उन्हें एक पल  रुक कर सोचने की आवश्यकता है। पहनावा,खानपान,विवाह,सन्तान,संपत्ति  सभी मामलों में अधिकांश जगह पुरुष समाज ने अपनी सोच बदली है और स्त्री की राय को, उसके हक को उचित स्थान दिया है। देखा जाए तो आज के युवक ने इस उदारता से अपने लिए अकेलापन चुन लिया है। आधुनिक महिलाएं अपनी आज़ादी का सबसे बड़ा शत्रु पति के परिवार को ही मानती हैं और पति से उसके परिवार को अलग करने में ही तमाम ऊर्जा खर्च करती हैं। फिर न जाने कब परिवार के कटा हुआ पति ही उनका सबसे बड़ा दुश्मन हो जाता है पता ही नहीं चलता। 


ये ठीक है कि दुनिया भर की स्त्रियां ऐसी नहीं है लेकिन इनकी संख्या चिंताजनक रूप से बढ़ रही है। आज के माता पिता को भी आत्मावलोकन की आवशयक्ता है क्या सिखा रहें है अपने बच्चों को? यदि विवाह संस्था में आस्था नहीं है, विवाह के साथ आई जिम्मेदारियों को निभाने की क्षमता नहीं हैं, परिवार बनाने के लिए संबंधों को निभाने का धैर्य नहीं है, तो विवाह करने की आवश्यकता ही क्या है?  ये फ़ेमनिज़्म क्या अकेले रहने का नैतिक साहस नहीं देता? यदि विवाह के बाद भी तथाकथित फ़ेमनिज़्म आपको घुटन,गुलामी आदि आदि का अहसास करवाता है तो विवाह से बाहर आने का विकल्प खुला है। कानून और समाज दोनों ही इस हेतु मार्ग दे चुके हैं, तो ऐसे वहशीपन की क्या ज़रूरत है? उठा लीजिए फ़ेमनिज़्म का झण्डा और जो चाहे कीजिये। बक्श दीजिये रिश्तों को,कम से कम कई घर बर्बाद होने से तो बच जाएंगे।


22.03.2025

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