जम्मू-कश्मीर के
पहलगाम में इस्लामिक आतंकियों द्वारा हिन्दुओं की हत्या के बाद एक तरफ देश में पकिस्तान
के खिलाफ, आतंकवादियों के खिलाफ, कट्टर इस्लामिक मंसूबों के खिलाफ माहौल बना हुआ है वहीं दूसरी तरफ इस्लाम के
नाम पर धर्मान्तरण करने वाले अपना खेल दिखाने में लगे हुए हैं. पिछले दिनों उत्तर
प्रदेश के कानपुर में कुछ मुस्लिमों द्वारा तीन हिन्दू युवतियों और दो हिन्दू
युवकों का इस्लाम में धर्मान्तरण कराने का कारनामा अंजाम दिया जा रहा था. इस मामले
की जानकारी मिलने पर जब पुलिस द्वारा जाँच की गई तो वहाँ इन पाँच हिन्दुओं को कलमा
पढ़ने का अभ्यास करवाते हुए उनको मुसलमान बनाया जा रहा था. देश में धर्मान्तरण को
लेकर समय-समय पर न्यायालयों द्वारा टिप्पणी करते हुए निर्णय दिए जाते रहे हैं इसके
बाद भी देश भर में चोरी-छिपे धर्मान्तरण का खेल चलता रहता है.
धर्मांतरण को लेकर
अभी हाल ही में इलाहाबाद उच्च न्यायालय द्वारा एक फैसला सुनाया गया, जिसमें न्यायालय ने कहा है कि धोखे और दबाव में
किया गया धर्मांतरण गैरकानूनी तथा गंभीर अपराध है. ऐसे मामलों में दो पक्षों में
समझौते के आधार पर मामले को रद्द नहीं किया जा सकता. न्यायाधीश मंजू रानी चौहान की बेंच ने कहा है कि
इस्लाम धर्म में परिवर्तन तभी वास्तविक माना जा सकता है जब कोई बालिग व्यक्ति साफ
मन और अपनी इच्छा से पैगंबर हजरत मोहम्मद में विश्वास रखता हो. इस्लाम के
सिद्धांतों से प्रभावित होकर उसने सच्चे मन से हृदय परिवर्तन किया हो. न्यायालय ने
इन्हीं दलीलों के आधार पर झूठ बोलकर धर्मांतरण कराने और शादी के नाम पर रेप करने
के आरोपी को कोई राहत देने से मना कर दिया.
इसी तरह एक मामले
में सर्वोच्च न्यायालय ने धर्मान्तरण पर गम्भीर टिप्पणी की थी. एक याचिका पर सुनवाई
करते हुए न्यायमूर्ति एम.आर. शाह और न्यायमूर्ति हिमा कोहली की बेंच ने जबरन, लालच, धोखेवश किये गए धर्मपरिवर्तन
को अनुच्छेद 14, 21 तथा 25 का उल्लंघन माना. याचिका पर स्पष्टीकरण देते
हए सर्वोच्च न्यायालय ने इसे अंतरात्मा की आवाज़ के अधिकार का हनन माना है.
न्यायालय ने टिप्पणी की कि जबरन धर्मान्तरण अंततः राष्ट्र की सुरक्षा, धर्म की स्वतंत्रता
और नागरिकों की अंतरात्मा को प्रभावित कर सकता है. इस तरह की घटनाएँ न सिर्फ धर्मान्तरित
व्यक्ति की धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन करती हैं अपितु ये हमारे धर्मनिरपेक्ष ताने-बाने
के भी विरुद्ध हैं. सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को भी उन कदमों की जानकारी देने
का निर्देश दिया है जो वे जबरन धर्मपरिवर्तन को रोकने के लिए उठाने जा रहे हैं. ये
अनुच्छेद धर्म को मानने, प्रचार करने, अभ्यास करने एवं सभी धर्मों के लोगो को धर्म
प्रबंधन की अनुमति सार्वजनिक व्यवस्था, स्वास्थ्य और नैतिकता के नियमों के अधीन रहते
हुए प्रदान करता है तथापि ये अनुच्छेद कहीं भी जबरन, धोखे से अथवा लालच देकर धर्मपरिवर्तन की अनुमति
नही देते. जबरन धर्मपरिवर्तन का प्रयास आईपीसी धारा 295ए, 298 के तहत संज्ञेय अपराध है.
वास्तव में यह राष्ट्रीय
अखंडता को उत्पन्न सबसे गंभीर खतरों में से एक है, जहाँ इस देश के बहुसंख्यक हिंदू
समाज को निशाने पर रखते हुए जिहादी शक्तियाँ एवं ईसाई मिशनरियाँ बड़े पैमाने पर धर्मान्तरण
करने में लगी हैं. उत्तर-पूर्व के राज्यों में धर्मपरिवर्तन की इस रणनीति के तहत इन
क्षेत्रों के धार्मिक समीकरणों में बहुत अंतर आ चुका है. ईसाई आबादी कई जनजातीय राज्यों
में बहुसंख्यक हो चुकी है. तमिलनाडु, कर्नाटक के समुद्री बेल्ट में भी इनकी आबादी
अप्रत्याशित दर से बढ़ रही है. भारत का हिन्दू समाज मुस्लिम जेहादियों के निशाने पर भी है. मुस्लिम आबादी इस देश की दूसरी
सबसे बड़ी आबादी है और यह आबादी भी धर्मान्तरण के खेल में शामिल है. उत्तर प्रदेश में
तो इसके विरुद्ध उत्तर प्रदेश धर्मपरिवर्तन निषेध अध्यादेश 2020 नामक एक कानून
भी लाना पड़ा है. जिसकी धारा 3 विवाह द्वारा व्यक्ति के धर्मपरिवर्तन को अवैध घोषित
करती है. धर्म का चयन अवश्य ही व्यक्तिगत पसंद का विषय हो सकता है किंतु एक सोची-समझी
रणनीति के तहत धर्मान्तरण के षड्यंत्र को भी नकारा नही जा सकता है. यह देश की एकता, अखंडता के लिए बेहद
गंभीर चुनौती है. बड़े पैमाने पर इन शक्तियों को विदेशों से धन प्राप्त हो रहा है.
जिसका प्रयोग जनजातीय समूहों और गरीब वर्ग को अनेक प्रकार के लालच देकर दूसरे धर्म
में परिवर्तित करने का खेल चल रहा है.
वर्तमान में देश
को धर्मान्तरण पर केन्द्र सरकार को एक सार्थक कदम उठाने की आवश्यकता है. यह
निश्चित रूप से यह गंभीर मुद्दा है जो राष्ट्रविरोधी शक्तियों द्वारा धर्म के आधार
पर देश को बाँटने के विकल्प के रूप में प्रयोग में लाया जा रहा है. ऐसे में
केन्द्र सरकार और राज्य सरकारों को मिलकर काम करना होगा. किसी भी तरह के भ्रम और दुरुपयोग
से बचने के लिये सभी राज्यों में एकसमान नियम बनाये जाने चाहिए. शिक्षण संस्थानों
के द्वारा शिक्षा और जागरूकता को बढ़ावा दिया जाना चाहिए, इससे भी धर्मांतरण रोकने में महत्वपूर्ण सहायता मिल सकती है. स्पष्ट है कि
कानून और जनसहभागिता के समन्वित रूप से ही धर्मान्तरण पर नियन्त्रण सम्भव है. इस
ओर न केवल सरकारों को बल्कि सामाजिक संस्थानों, शैक्षणिक संस्थाओं, धार्मिक संस्थाओं, बुद्धिजीवियों आदि को भी सजगता के साथ कार्य करने की आवश्यकता है.

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