शुक्रवार, 13 जून 2025

परमाणु भयादोहन

 क्या परमाणु भयादोहन अब बीते समय की बात हो गई है?

इस्राएल और ईरान के मध्य शुरू हो गए संघर्ष ने दुनिया भर के रणनीतिकारों के मध्य इस बहस को तीव्र कर दिया है कि परमाणु अस्त्र शस्त्र जो उन्नीस सौ पैतालिस के जापान और हिरोशिमा की तबाही के बाद से ही भयादोहन का साधन माने जाते रहे, इनकी उपलब्ध्ता ने राज्यों को शक्ति क्रम में ऊपर कर दिया। इन हथियारों के बल पर महाशक्तियों ने विश्व राजनीति को अपने अपने स्वार्थों के अनुरूप जैसे चाहा वैसे चलाया। दक्षिण एशिया, पश्चिम एशिया इस राजनीति का सबसे भयानक शिकार रहे। अमरीका और पूर्व सोवियत संघ की प्रतिद्वंद्वी राजनीति ने परमाणु अप्रसार के जितने प्रयास किये उतना ही इनका फैलाव हुआ। कुछ परमाणु कार्यक्रम घोषित रहे और कुछ अघोषित। दोनों महाशक्तियों द्वारा अपने साथियों को परमाणु सहायता और हथियार उपलब्ध करवाए गए जिसके परिणाम स्वरूप परमाणु शस्त्र होड़ बढ़ती गई। चीन के परमाणु शक्ति और साम्राज्य वादी नीतियों के कारण भारत को भी परमाणु सुरक्षा की आवश्यकता हुई और भारत ने परमाणु बम बनाया भी। पश्चिम की राजनीति ने शांतिप्रिय भारत के परमाणु कार्यक्रम जो मात्र आत्मरक्षा के लिए था को रोकने के तो हर संभव प्रयास किये, किंतु पाकिस्तान के परमाणु कार्यक्रम को अनदेखा कर उसे परमाणु बम तक पहुंचने दिया। वही अमरीका ईरान के परमाणु कार्यक्रम को इज़राइल के माध्यम से रोकने की पूरी कोशिश कर रहा है। इस्राइल के कल के हमलों में ईरान में भयानक तबाही हुई है और सबसे महत्वपूर्ण बात ये कि इस्राइल द्वारा ईरान के परमाणु केंद्रों पर सीधा हमला किया गया है। ऐसा ही कुछ हमने ऑपरेशन सिन्दूर के समय देखा था जब भारत ने पाकिस्तान की परमाणु कमान पर सीधा हमला कर दिया था। भारत ने परमाणु भयादोहन को किनारे करने का जो दुस्साहस दिखाया उसने परमाणु ब्लैकमेल की रणनीति को क्या शून्य कर दिया है? ईरान हमला अवश्य करेगा और देखना होगा कि ये संघर्ष परमाणु संघर्ष तक पहुँचेगा अथवा नहीं। भारत के सैन्य रणनीतिकारों ने

ऑपरेशन सिंदूर के दौरान नए मानक तय कर दिए हैं परमाणु हमले के प्रयास को दुश्मन की ज़मीन पर ही खत्म कर देना। इस दक्षता के द्वारा ही परमाणु हमले के खतरे को उदासीन किया जा सकता है। शायद इस्राएल इसी रणनीति पर काम कर ऐसा दुस्साहस दिखा रहा है। खैर जो भी हो परमाणु हथियार,परमाणु धमकी अब मनमानी करने की गारंटी नहीं रही ऐसा भारत और इस्राइल के कदमों को देख कर कहा जा सकता है।

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