शुक्रवार, 20 जून 2025

क्या अमेरिका पर विश्वास कर इज़राइल फंस गया?

इजराइल-हमास संघर्ष के समय से ही ईरान द्वारा इसमें हस्तक्षेप करने की आशंका बनी हुई थी. बदलती परिस्थितियों में ईरान की परमाणु परियोजना रोकने के प्रयासों में इजराइल ने ईरान पर हवाई हमले कर दिए. इजराइल-ईरान युद्ध की ऐसी स्थिति में पश्चिम एशिया से आ रही खबरों में इस समय ईरान के पलटवार की खूब चर्चा है. ईरान के जोरदार हमलों से इज़राइल को काफी नुकसान हुआ है. उसकी वायु रक्षा प्रणाली ईरान की बैलिस्टिक मिसाइल का सामना नहीं कर पा रही है. ईरान द्वारा किये जा रहे ताबड़तोड़ बैलिस्टिक मिसाइल हमलों में इज़राइली बस्तियाँ, शहर, अस्पताल आदि निशाने पर हैं. वह अपने हमलों में सैनिक, असैनिक लक्ष्यों में कोई भेद नहीं कर रहा है. उनकी यही एकमात्र सामरिकी इज़राइल को परेशानी में डाल रही है.

 

ईरान के फोर्दो परमाणु सयंत्र पर हमले की इज़राइली ज़िद और ईरान के पूर्व राष्ट्रपति खामनेई की हत्या की योजना के चलते वर्तमान युद्ध स्थिति बनी. इजराइल की इस तरह की योजना के पीछे अमेरिकी मंशा की सम्भावना जताई जा रही है. इसका बहुत बड़ा कारण इजराइल की स्थिति है. दरअसल पहले से ही गाजा में उलझे हुए इज़राइल के लिए सबसे बड़ी चुनौती ईरान की बढ़ती हुई ताकत है. ऐसे में ईरान का परमाणु बम बनाने की स्थिति तक पहुँचना इज़राइल के अस्तित्व को सीधी चुनौती है. स्पष्ट है कि यदि ईरान परमाणु बम बना लेगा तो उसका सम्भावित प्रयोग इजराइल पर ही होगा. ऐसी विषम परिस्थिति को जानने-समझने के बाद कोई भी देश अपने अस्तित्व पर आए संकट को अनदेखा नहीं कर सकता. इज़राइल की स्थिति ऐसी है कि ज़िंदा रहना है तो युद्ध के लिए तैयार रहना होगा. इसके अलावा वैश्विक महाशक्तियों में इज़राइल को अमेरिकी भूराजनीति का और ईरान को रूस की भूराजनीति का मोहरा माना जाता है. इजराइल पश्चिम एशिया और मध्य पूर्व में अमेरिका भूराजनीति का आधार है. इज़राइल को कमज़ोर करके इस क्षेत्र में अमरीकी भूराजनीति को कम किया जा सकता है. आशंका है कि अमेरिका को निशाना बनाने के लिए रूस अपनी ग्रेटर स्ट्रेटेजी के द्वारा नाटो देशों में अलगाव और पश्चिम एशिया की स्थितियों को अपने हितों के अनुरूप ढालने का प्रयास करेगा. ऐसे में सम्भव है कि इजराइल को ईरान की परमाणु शक्ति का भय दिखाकर अमेरिका ने अपने हित साधने का प्रयास किया हो.

 



ईरान की बढती ताकत के बीच अमरीका पर विश्वास करके इज़राइल बेहद असहज स्थिति में फँस चुका है. राष्ट्रपति ट्रम्प, जो एक बड़बोले नेता के रूप में जाने जाते हैं, उनके खुलकर समर्थन की आशा में इजराइल इस स्थिति में आ गया है. कुछ इसी तरह की स्थिति में दुनिया ने यूक्रेन को देखा कि कैसे नाटो ने उसे रूस के साथ आत्मघाती संघर्ष में उलझा दिया, जो आज तक जारी है. पूरा यूक्रेन राख हो गया पर युद्ध का कोई परिणाम नहीं निकला है, न ही युद्ध रुका है. संभवतः इस बार ईरान की ताकत को समझने और युद्ध करने के इजराइल के निर्णय में कुछ खामी रह गई. इज़राइल के आयरन डोम के असफल होने के बाद उसके व्यापारिक, औद्योगिक केन्द्र ईरान के निशाने पर हैं, जिसके सामरिक लाभ के साथ-साथ वृहद स्ट्रैटिजिक अर्थ भी हैं. अर्थव्यवस्था पर चोट इज़राइल की यौद्धिक क्षमता तोड़ कर रख देगी. माइक्रोसॉफ्ट ऑफिस पर हमला इसका ही उदाहरण है. विपत्ति काल में अमरीकी मित्र सबसे अविश्वसनीय है, यह एक बार फिर साबित हो गया. कल तक ट्रम्प ईरान पर समझौता करने का दबाव बनाते दिख रहे थे, आज अपनी नीति से पूरी तरह से पलट चुके हैं. अमेरिका के खुलकर युद्ध में उतरने को लेकर भी दूरी बनाते नजर आ रहे हैं. ईरान ने होरमुज की खाड़ी में अमेरिका की घेरेबंदी कर उसके मन मे डर पैदा कर दिया है. ये सारी दुनिया जानती है कि अमरीकी सेना कभी भी ज़मीनी लड़ाई में आमने-सामने लड़ कर जीत नहीं सकी है और हथियार छोड़ कर भागती रही है. वियतनाम रहा हो या फिर अफगानिस्तान, उसका यही इतिहास रहा है.

 

रूस, चीन, कोरिया और 21 अरब देशों का एकसाथ विरोध मोल लेकर इज़राइल को बचाने के लिए अमेरिका युद्ध में खड़ा होगा ये दूर की कौड़ी लग रहा है. क्लस्टर बमों की मार झेल रहे इज़राइल को जी.बी.यू. 57 और टैक्टिकल न्यूक्लियर हथियार ही बचा सकते हैं लेकिन इनका प्रयोग अमेरिका के लिए भी तबाही लाएगा. पश्चिम एशिया की वर्तमान स्थितियाँ बेहद खतरनाक हो चुकी हैं. एक ट्रिगर पर ये संघर्ष परमाणु युद्ध में बदल सकता है. यदि फोर्दो परमाणु संयंत्र पर हमला होता है तो रेडियोएक्टिव रिसाव होगा और ईरान के पास परमाणु प्रतिरोध का विकल्प खुल जायेगा. यदि ईरान के पास बम नहीं भी होगा तो रूस, चीन, पाकिस्तान आदि से उसे उपलब्ध कराया जा सकता है. यद्यपि बंकर बरस्टिंग बम के बिना फोर्दो परमाणु सयंत्र, जो ईरान की राजधानी तेहरान से 200 किमी दूर है, जहाँ 300 किमी ज़मीन के अंदर परमाणु सामग्री को रखा गया है, को आसानी से निशाना नहीं बनाया जा सकता तथापि ऐसा होता है तो यह बेहद खतरनाक कदम होगा.

 

वर्तमान सन्दर्भों में भले ही ईरान हावी दिख रहा है, मीडिया रिपोर्टिंग इज़राइल विरोधी लग रही है, अरब और जिहादी संसार में मनोबल उच्च लग रहा है, अमेरिका पीछे हटना चाह रहा है तब भी इज़राइल इन परिस्थितियों को पलटने में सक्षम है. यह किसी को भूलना नहीं चाहिए कि कोई भी जंग सिर्फ मिसाइलों और छद्म संगठनों के सहारे नहीं जीती जा सकती और ईरान के पास यही दो चीज़े हैं. आमने-सामने की जंग में  स्थितियाँ कुछ और ही होंगी. कुछ समय बाद ईरान कितने मिसाइल हमले कर पायेगा? क्या अमेरिका ऐसे ही चुप होकर बैठा रहेगा? इज़राइल किस सीमा तक जाएगा? आदि प्रश्न युद्ध का भविष्य तय करेंगे. यदि इज़राइल के सामने अस्तित्व का संकट उपस्थित होगा तो यह युद्ध पारंपरिक ही रह पाएगा इसमें संदेह है.


1 टिप्पणी:

  1. अमेरिका किसी भी रूप में भरोसे लायक तो नहीं ही कहा जा सकता. अब जबकि उसके द्वारा ईरान पर हमला बोल दिया गया है तो निश्चित ही इसमें उसकी कोई न कोई राजनीति ही होगी.
    अच्छा लेख.

    जवाब देंहटाएं