बिहार का जनादेश
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एन डी ए की प्रचंड जीत ने एक बार फिर ईवीएम, चुनाव आयोग आदि आदि सभी को विपक्षियों की कुंठा का शिकार होने के लिए प्रस्तुत कर दिया। हारे हुए कुंठित चुनावबाज मुद्दों की चर्चा और सही कारण ढूंढने के बजाए चुनाव प्रणाली पर प्रश्नचिन्ह लगाने में पूरी शक्ति लगा देंगे। ये निराशा और शर्म को छुपाने के सबसे आसान, सस्ता, सुलभ साधन है बिल्कुल सुलभ शौचालय की भांति। ये इन चुनावबाजों के लिए सबसे सहज मार्ग है हार की कटु सच्चाई जिसका कारण वो सब जानते हैं पर व्यक्त नहीं कर सकते नहीं तो उनकी जुबान खींच कर गलियारों में टांग दी जाएगी। एन डी ए का चुनाव प्रचार व रणनीति जहाँ ज़मीनी हकीकत से जुड़ी और विपक्षियों के आपराधिक कार्यकाल को न भुलाने वाली रही,वह सफल रही। लोग जंगलराज को भूले नहीं हैं, इस राज के उत्तराधिकारी के रूप में आर.जे. डी और तेजस्वी से बिहार खाल नुचवाने को तैयार नहीं था। हर घर मे नौकरी, रुपयों का लालच सब कुछ जंगलराज के खूनी ज़ख्मो को भुलाने के लिए अपर्याप्त सिद्ध हुआ। जनसुराज पार्टी की दशा ने ये जता दिया कि चुनाव प्रबंधन में माहिर होना और चुनाव जीतने की कुव्वत होना दो अलग अलग बातें है। ज़मीनी नेताओं का मुकाबला कोई नहीं कर सकता। यही वजह है कि लालू के कुलदीपक,दीपिकाएँ हो या कांग्रेस के तथाकथित युवराज इस चुनाव में एक बार फिर असफल हो गए। ऐसा लगता है कि बड़े राजनीतिक घरानों ने अपनी पार्टियों की सुपाड़ी अपनी औलादों को दे रखी है। परिणाम जो भी है खानदान की राजनीति को पिटते या कहिए बुरी तरह पिटते देखना सुखद है। बिहारी जो तुलनात्मक रूप से राजनीति में गहरा रुझान और समझ रखते हैं उन्होंने उपलब्ध विकल्पों में सर्वोत्तम चुन लिया है। अब यह बनने वाली नई सरकार की जिम्मेदारी होगी कि इस विश्वास और लोकतंत्र को वो विजेता बना दें।
इति
14.11.25
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