शुक्रवार, 27 फ़रवरी 2026

दिल्ली शराब नीति केस पर अदालत का फैसला

 आज दिल्ली शराब नीति के मामले में अदालत का फैसला आया जिसमे दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया को अदालत ने दोषी न मानते हुए बरी कर दिया। अदालत का फैसला अवश्य ही ठोस सबूतों के आधार पर ही लिया गया होगा इसमें कोई शक नहीं है। सी.बी.आई और तमाम जांच एजेंसियां अपने ही केस को अदालत में सिद्ध नहीं कर सकी और फैसला अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया के पक्ष में आया। इस पूरे घटनाक्रम ने यह सोचने को विवश कर दिया है कि क्या वास्तव में ये पूरा मामला राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी को समाप्त करने के लिए षड्यंत्र पूर्वक रचा गया और ये सारे आरोप सही हैं कि सरकार द्वारा जांच एजेंसियों को गलत तरीके से फंसाने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है? आरोप प्रत्यारोप के दौर में सत्य कहीं दब के रह जायेगा, राजनीति व्यवस्था को नियमानुसार चलाने का एक साधन  मात्र है। लोकतंत्र में सत्ता में बैठने वाली सरकार यदि सत्त्ता का प्रयोग विपक्ष को समाप्त कर एक पार्टी की तानाशाही का मार्ग बनाने में लिप्त हो जाये तो इसे लोकतांत्रिक व्यवस्था के अंत का प्रतीक मान लोगो को जागरूक और सतर्क हो जाना चाहिए। पूरा देश देख रहा है कि किस प्रकार सत्ता से मतभेद रखने वाली आवाजों, संस्थाओं और दलों को जायज,नाजायज तरीकों से कुचलने के कोशिश बदस्तूर जारी है। किसी भी सरकार को यह नहीं भूलना चाहिए कि अनैतिकता की परकाष्ठा पर भी पहुंच कर वो सत्ता पर सदा सर्वदा काबिज़ नहीं रह सकते। कितनी आवाजें दबाई जाएंगी,कितने लोगों को जेलों में ठूंस कर कानूनी अधिकारों से वंचित कर सत्ता सुरक्षित की जाएगी? केजरीवाल की राह अभी भी आसान नहीं है क्योंकि उन्हें सत्ता के अंधे दम्भ से भी लड़ना है...फिलहाल अदालत को धन्यवाद करना चाहिए कि उन्होंने अपने फैसले से लोगों के सोचने के लिए एक महत्वपूर्ण प्रश्न उछाल दिया है।


27.02.26

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