पिछले दिनों माननीय स्पीकर ओम प्रकाश बिड़ला जी ने प्रधानमंत्री के सदन में उपस्थित न होने के लिए जो तर्क दिया उसने न सिर्फ प्रधानमंत्री को आलोचनाओं के लिए प्रस्तुत कर दिया बल्कि यह कहने में कोई संकोच नहीं कि स्पीकर के पद की मर्यादा को भी खंडित कर दिया। प्रधानमंत्री को सदन में ऐसा कौन सा खतरा हो सकता था कि ऐसी हल्की बात स्पीकर के माध्यम से सामने आए। विपक्ष के विरोध और प्रश्नों का जवाब आज तक सभी प्रधानमंत्री देते आये हैं, स्वयं मोदी जी भी इस पक्ष विपक्ष की रस्साकसी को बखूबी सम्भालते आये हैं। लेकिन आज ऐसा क्या हो गया कि प्रधानमंत्री को उस प्रकार असहजता का सामना करना पड़ रहा है। स्पीकर पूरे सदन का होता है उसके कार्य व्यवहार से सदन में यदि उसकी पार्टी निष्ठा या पार्टी की आंतरिक रणनीति झलक जाए तो इसे लोकतंत्र के लिए शुभ नहीं माना जाता। आज तक सदन ने बहुत सख्त,अनुशासित,अलग अलग राजनीतिक विचारधाराओं के प्रतिनिधित्व करने वाले स्पीकर देखे, किंतु सदन के कार्य व्यवहार में उनकी निष्पक्ष छवि पर उंगली नहीं उठाई जा सकी। यह अत्यंत दुखद है कि प्रधानमंत्री जी अभिभाषण पर जवाब देने नहीं आये और उससे भी दुःखद यह कि स्पीकर अपने पद की मर्यादा राजनीतिक निष्ठा प्रदर्शन के चक्कर सम्भाल नहीं सके।
09.02.26
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें