क्या अमरीका की दोस्ती और दुश्मनी दोनों ही खतरनाक है????
यदि विगत दो बड़े युद्धों रूस-यूक्रेन एवं वर्तमान ईरान के साथ हो रहे युद्ध मे अमरीकी नीति का मूल्यांकन किया जाए तो यह स्पष्ट दिखता है कि अमरीकी दोस्ती और दुश्मनी दोनों ही आत्मघाती है। अमरीका का प्रत्येक कदम मात्र अमरीकी हितों की पूर्ति के लिए उठाया जाता है। इसके लिए अमरीका अनैतिकता की पराकाष्ठा तक जा कर,सभी अंतर्राष्ट्रीय कानून और संधियों की धज्जियां उड़ाने में भी संकोच नही करता। पूरी दुनिया को मानवाधिकारों पर भाषण देने वाले,अमरीकी नागरिकों के अतिरिक्त किसी को मनुष्य नहीं समझते। किसी अन्य राष्ट्र की सम्प्रभुता उनके लिए कोई मायने ही नहीं रखती। यूक्रेन को अमरीका की दोस्ती और मदद ने एक ऐसी स्थिति में फंसा दिया जहाँ पूरा देश खंडहर और मलबे में बदल गया पर न युद्ध रुका और न ही यूक्रेन की समस्याओं का कोई अंत हुआ। इससे तो बेहतर था कि यूक्रेन नाटो में जाने की जिद छोड़ रूस से ही कोई तर्क संगत संधि कर लेता। लेकिन अमरीकियों ने जेलेन्सकी का ऐसा ब्रेनवाश किया कि उन्हें लगा कि वे नाटो में शामिल होकर रूस को असहज कर सकते हैं।नाटो और अमरीका रूस को साध लेंगे। जेलेन्सकी ये नहीं समझ सके कि अमरीकी दोस्ती असल मे दोस्ती नही थी, अमेरिकन्स रूस पर निशाना साध रहे थे यूक्रेन की कीमत पर। यदि नाटो की सहायता पाकर यूक्रेन रूस को उलझाए रखे तो उसकी शक्ति को नियंत्रित किया जा सकता है। रूस जितनी भी तबाही करेगा वो यूक्रेन की ज़मीन पर होगी,मरने वाले यूक्रेन के नागरिक होंगे। यदि किसी स्थिति में रूस दबाव में आकर यूक्रेन पर परमाणु बम का प्रयोग कर देता तो ये विनाश भी अमरीका से बहुत दूर यूक्रेन की ज़मीन पर होता और इसके परिणाम खुद रूसियों को भी भुगतने पड़तें और तो और अमरीका तथा नाटो के देशों को रूस पर परमाणु बम गिराने का लाइसेंस मिल जाता।खैर रूस ने सयंम दिखाते हुए ये स्थिति उत्पन्न नहीं होने दी। अब जबकि यूक्रेन बर्बाद हो चुका है तो भी अमरीकी कंपनियों की कमाई या कहिये लूट के लिए खुली तिजोरी बन चुका है। युद्ध मे सहायता के नाम पर अमरीका ने जितना रुपिया खर्च किया होगा उसका कई गुना अमरीकी कम्पनियों के द्वारा यूक्रेन के संसाधनों और पुननिर्माण के नाम पर लूट लिया जाएगा। युद्ध मे जो भूमि यूक्रेन खो चुका वो शायद ही वापस मिले और सहायता देने वाले दोस्त अमरीकी घर मे लूट खसोट करेंगे सो अलग।अमरीका की दोस्ती यूक्रेन को ले डूबी ये कहना अतिश्योक्ति नही होगी।
अब यदि ईरान के साथ जो कुछ भी हो रहा है उसे अमरीकी दुश्मनी के शास्त्रीय उदाहरण के रूप में देखा जाए तो परिणाम आश्चर्यजनक रूप से समान ही दिखेगा। ईरान फिलहाल तो अमरीकी प्रत्याशा के विपरीत जोरदार पलटवार कर रहा है लेकिन ये पलटवार की शक्ति बहुत समय तक नहीं रहेगी। तब अमरीका और इज़राइल मिल कर युद्ध के नाम पर ईरान को राख और खंडहर में बदल देंगे। यदि ईरान किसी भी प्रकार परमाणु शक्ति का प्रयोग करने की स्थिति में आ भी गया तो ज़मीन पश्चिम एशिया या इज़राइल की ही होगी,अमरीका ईरान की मारक क्षमता से बहुत दूर है। यानी फिर दूसरो की जान, ज़मीन की कीमत पर अमरीकी नीति नाचती रहेगी। ईरान बर्बाद हो या ईरान के सबसे घातक प्रहार से (यदि ऐसा हो सके तब) इज़राइल, अमरीका तब भी सुरक्षित रहेगा। इस बार भी निशाना ईरान नहीं बल्कि रूस और चीन हैं जिनके हितों को नुकसान पहुंचाने के लिए ईरान को निशाना बनाया जा रहा है। बर्बादी के बाद ईरान को भी युद्ध समझौते और पुनर्निर्माण के नाम पर अमरीकी कम्पनियों को लूट खसोट का लाइसेंस दे दिया जाएगा। इस प्रकार अमरीकी दुश्मनी भी वैसी ही है जैसी उनकी दोस्ती। आवश्यकता पड़ने पर अमरीकी इज़राइल की कीमत पर भी अपने हितों को साधेगे इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए। एक और महत्वपूर्ण तथ्य की अमरीकी नीति की नग्नता, तानाशाही, बेखौफ अनैतिकता के प्रदर्शन पर दुनिया की सबसे बड़ी संसद,महासभा अर्थात संयुक्त राष्ट्र संघ खुद नंगा होकर खड़ा है। इस नग्नता ने संघ के औचित्य पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है। क्या सँयुक्त राष्ट्र संघ अब भी जिंदा है??
इति
05.03.26
अमेरिका कहें या कि ट्रम्प, जो भी कहें मगर काम पूरी तानाशाही के साथ कर रहे हैं. विश्व की एकमात्र शक्ति के रूप में अगले को स्वीकार्यता चाहिए है, इसके लिए चाहे किसी भी स्तर तक गिरना क्यों न हो जाए.
जवाब देंहटाएंअभी खबर मिली कि भारत से जा रहे एक ईरानी जहाज को उसने मार गिराया. ये कदन सिर्फ़ दादागीरी का प्रतीक है. पता नहीं ये अहंकार दुनिया को कहाँ ले जाकर छोड़ेगा.