क्या भारतीय विदेश नीति दिशाहीन हो चुकी है?
एक बहुत लंबे समय से भारत खुद को क्षेत्रीय शक्ति और ग्लोबल साउथ की आवाज़ मानता आया है, भारत का भूगोल उसके इस दावे को नैसर्गिक आधार प्रदान करता रहा है। स्वतंत्रता के पश्चात हमने भूराजनीतिक समीकरणों एवं शीत युद्ध की कड़वाहट से अपने हितों की रक्षा के लिए गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाई। दोनों गुटों के साथ सहयोग एवं समन्वय की नीति। एक संतुलकारी कि भूमिका। इस नीति की कई मुद्दों पर आलोचना की जा सकती है किंतु यह भारत के सम्यक हितों को लंबे समय तक साधने में कामयाब रही। अंतर्राष्ट्रीय राजनीति में कुछ भी स्थायी नहीं होता,न दोस्त और न ही दुश्मन, स्थायी होतें हैं मात्र राष्ट्रीय हित। इसी के अनुरूप जब आवश्यक समझा गया भारत ने सोवियत संघ से संधि करने में भी गुरेज नहीं किया, कोरिया, इराक सहित तमाम मुद्दों पर अमरीका की खुली आलोचना भी की। इसी स्वतंत्र नीति पर चलते हुए रूस के साथ मैत्री में रहते हुए भी अमरीका से सन्धिया की और भारत के हितों को प्रधानता दी।
जब हम एक कमजोर, गरीब देश थे तब भी हमारी विदेश नीति स्वतंत्र पहचान रखती थी। बेशक कई मुद्दों पर भारी असफलताएं मिली लेकिन वो हमारे अपने निर्णयों का परिणाम थी, कोई और देश खुलेआम हमारे स्वभिमान और सम्प्रभुता की ऐसी धज्जियां उड़ाता रहे और हम आपत्ति के दो शब्द भी दर्ज न करा सकें तो इसे क्या कहा जाए? ताकतवर देश की डरपोक, बेशर्म नीति?
ट्रम्प और अमरीका क्या भारत के स्वाभिमान को यूँ ही लज्जित करते रहेंगे और हम चुप रहेंगे। ट्रम्प को तो राजनीतिक,राजनयिक शिष्टाचार नहीं है यह हम जेलेन्सकी से उनकी बातचीत के तरीके और अन्य कई मौकों पर देख चुके हैं पर क्या भारत की विदेश नीति में इतनी भी सामर्थ्य नहीं बची कि वह राष्ट्रीय प्रतिष्ठा की रक्षा कर सके?
ये बेशर्म मौन हमारे क्षेत्रीय शक्ति और ग्लोबल साउथ की आवाज़ होने के दावे को खत्म कर देगा और इसकी कोई भरपाई नहीं हो सकती।
ये मौन एक ऐसी जगह ले जा रहा है भारत की छवि को जहाँ सिर्फ अंधकार ही अंधकार दिख रहा है।
इति
07.03.26
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