विकास की तीव्रतम
गतिमान अवस्था में गति बनाये हुए समाज में आजकल कहीं भी नज़र डालिये विकास के
साथ-साथ अपराध भी अपनी गति बनाये हुए हैं. देश में कहीं भी दृष्टिपात किया जाये, किसी भी सामाजिक स्तर पर ध्यान
केन्द्रित किया जाये, सभी जगह सम्बन्धों पर जघन्य अपराध का साया दिखता है. इस
खतरनाक आपराधिक साये की चपेट में विशेष रूप से पति-पत्नी के सम्बन्ध हैं, साथ ही इनसे जुड़े हुए अन्य रिश्ते-नाते भी आपराधिक कृत्यों से घिरे नजर
आते हैं. वर्तमान परिदृश्य में इस तरह की घटनाओं की, अपराधों
की बाढ़ सी आ गई है जिनके केन्द्र में स्त्री और पुरुष हैं. इन आपराधिक कृत्यों में
दुखद पहलू ये है कि ये स्त्री-पुरुष अनजान नहीं, अजनबी नहीं
बल्कि आपस में पति-पत्नी हैं. ये स्थिति एक तरह की विद्रूपता सी नजर आती है जहाँ
पति और पत्नी आपस में ही एक-दूसरे के विरुद्ध आपराधिक कृत्यों में संलिप्त हैं.
वर्तमान सन्दर्भों
में विमर्श को आगे बढ़ाने के पहले समाज को अपनी ही उस स्थिति पर विचार करना होगा
जहाँ कि महिलाओं को हाशिए का व्यक्ति समझा जाता था. यह अत्यंत दुखद स्थिति है किन्तु
हमारे समाज की कटु सच्चाई भी है कि महिलाओं को उनके ही तथाकथित परिवारों में दरकिनार
किया जाता रहा है. पारिवारिक निर्णयों की बात हो, परिवार के सन्दर्भ में किसी गम्भीर विषय पर विचारों का
आदान-प्रदान हो अथवा अन्य कोई भी स्थिति हो, परिवार की
महिलाओं को नगण्य ही समझा जाता रहा है. यह स्थिति किसी वर्ग विशेष की नहीं, किसी जाति विशेष की नहीं बल्कि प्रत्येक सामाजिक आय-वर्ग में एवं विभिन्न
जाति समूहों में कमोबेश एक जैसी रही है.
महिलाओं के प्रति
विभेद भरे माहौल के चलते एक ऐसा जमाना भी गुजरा था जब दहेज़ के लालच में अनगिनत बहुओं
की जान उनके पतियों और परिजनों द्वारा संगठित रूप से ले ली गई. कानून भी ऐसे हत्यारों
के समक्ष बहुत लम्बे समय तक अप्रभावी रहा. नब्बे के दशक में दहेज विरोधी कानून को सख्त
बनाया गया. सख्त कानून के अमल में आने पर, सरकार द्वारा सख्त रवैया अपनाने के कारण पुलिस और प्रशासन त्वरित
रूप से इन मामलों में कार्यवाही करने लगा. शासन-प्रशासन द्वारा सक्रियता दिखाने से
अपराधियों पर कार्यवाही होने लगी, लोगों में कानून का भय पैदा हुआ लेकिन अपराध के मूल कारण, समाज की सोच में अपेक्षित
बदलाव नहीं आ सका.
सामाजिक रूप से समाज
ने जहाँ एक ही परिवार में लड़का-लड़की का भेद बनाया वहीं विवाह पश्चात् भी इस
विभेदपूर्ण स्थिति में परिवर्तन नहीं आने दिया. समाज ने विवाहित स्त्री और उसके मायके
से सम्बन्धित परिजनों और पुरुषों के परिवार की भांति कभी नहीं स्वीकारा. पारम्परिक
भारतीय परिवारों में लड़की के परिवार का हस्तक्षेप नगण्य ही बना रहा. यद्यपि प्रत्येक
परिवार बहू के शोषण और अत्याचार में लिप्त नहीं रहा तथापि इनकी संख्या चिंताजनक
बनी रही. महिलाओं के प्रति अपराधों, घरेलू हिंसा ने एक रुग्ण सोच वाले समाज को जन्म दिया है. पुरुष इस हिंसा को अपनी
सामाजिक श्रेष्ठता की विरासत समझ कर आत्ममुग्ध मनोरोगी बने घूमते रहे वहीं महिलाओं
पर होती हिंसा ने महिलाओं की सोच को बदल दिया. यह सामाजिक रुग्णता आज की स्त्री को
उस उस मोड़ पर ले आई है जहाँ वह अपने ही पति और उसके परिवार के प्रति गहरी आशंका से
ग्रसित है. इस तरह की शंका के साथ एक महिला पूर्वाग्रह से मुक्त होकर नए जीवन में प्रवेश
नहीं कर पा रही, भले ही परिवार
कैसा भी हो, पति कितना भी
सुलझा क्यों न हो.
महिलाओं की इस बदली
हुई सोच और आधुनिक जीवन शैली के मध्य हमारी सामाजिक, पारिवारिक अवधारणाओं पर गहरा आघात लगा है. एक तरफ
जहाँ परिवार का ढाँचा विकृति का शिकार हुआ है वहीं दूसरी तरफ विवाह संस्था भी
विखंडित होने वाली स्थिति में है. स्त्री एवं पुरुष, दोनों में ही मूल्य एवं समर्पण
का अभाव दिखता है. वे दोनों ही एक-दूसरे के प्रति संशय, हिंसा, असहयोग
आदि की भावना से ग्रसित हैं. एक स्वस्थ परिवार की नींव रखने के लिए पति-पत्नी दोनों
में ही आपसी समझ, आपसी समन्वय, परस्पर
सहयोग, समर्पण, विश्वास आदि का होना आवश्यक
है. आधुनिक नारी जैविक निर्धारणवाद को खारिज करते हुए फेमिनिज़्म का झण्डा बुलंद करने
को अपनी तथाकथित जीत मान बैठी है. इसका सीधा असर घरों में हो रही घटनाओं में देखा जा
सकता है. विवाह से जुड़े फैसलों में आज स्त्री-पुरुष दोनों ही परिवार की मर्जी के आगे
झुकने की सोच नहीं रखते हैं. अपने मनपसंद जीवनसाथी का चुनाव करने के बाद भी विवाह
के सफल होने की दर गिरती ही जा रही है. अनेक मामलों में विवाह के कुछ दिनों बाद ही
सम्बन्ध इस हद तक खराब हो जाते हैं कि निभाना असंभव हो जाता है. इसका दुष्परिणाम
कुछ इस रूप में सामने आ रहा है कि विवाह समाप्ति के अनेक वैध विकल्प होने के बाद भी
पति या पत्नी द्वारा अमानुषिक तरीकों से अपने जीवनसाथी की हत्या तक किये जाने की
घटनाएँ सामने आने लगी हैं. इन घटनाओं के लगातार बढ़ने ने एवं महिलाओं द्वारा भी ऐसे
आपराधिक कृत्यों में शामिल होने की प्रवृति ने विवाह संस्था के औचित्य पर ही प्रश्नचिन्ह
लगा दिया है. विवाह जो सुरक्षा और स्थिरता का पर्याय था, आज खतरे और परेशानी का कारण
बनता जा रहा है.
सोचने वाली बात है
कि किसी बीमार सोच भरे समाज से निकलने वाले स्त्री-पुरुष मिल कर एक स्वस्थ घर कैसे
बना सकते हैं? मूल्यविहीन, उपभोक्तावादी जीवनशैली और उससे उत्पन्न पीढ़ी
में धैर्य का नितांत अभाव है. आज की पीढ़ी बहुत जल्दी किसी सम्बन्ध में आना तो चाहती
है लेकिन उस सम्बन्ध के साथ आने वाली जिम्मेदारियों को निभाने का धैर्य एवं नैतिक साहस
नहीं रखती है. ऐसे में वैवाहिक सम्बन्ध जो परिवार का आधार है, उसे यूज़ एंड थ्रो मानसिकता
से कैसे चलया जा सकता है? वर्तमान पीढ़ी की ख़ुशी और उनकी जीवन-शैली की दृष्टि से यदि विवाह के औचित्य
को समाप्त ही मान लिया जाए तो क्या यह पीढ़ी जीवन भर ट्रायल और एरर थ्योरी पर चल कर
जीवन बिता पाएगी? क्या
यूज एंड थ्रो की मानसिकता के साथ वह स्थिर सामाजिक ढाँचे का निर्माण कर पाएगी? क्या वह अपने ही जीवन
में कभी स्थिरता को प्राप्त कर पाएगी? ऐसी असामान्य स्थिति के बारे में स्त्रियों को, पुरुषों को, समाजशास्त्रियों को, परिवारों को, समाज को अत्यन्त गम्भीरता से विचार
करने की आवश्यकता है. कहीं ऐसा न हो कि विद्वेष, हिंसा, अपराध के चंगुल में फँसते जा रहे परिवारों की तीव्रता, रफ़्तार देखते हुए सुधारात्मक सम्भावना हाथ से निकल जाये.

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